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आस्था और संयम का पर्व निर्जला एकादशी

आचार्य ललित मुनि

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक का दिवस एवं त्योहारों का अपना अलग महत्व और विशेषता है। इन्हीं पवित्र अवसरों में निर्जला एकादशी एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कठिन व्रत माना जाता है। यह वह दिन है जब भक्त न केवल भोजन का त्याग करते हैं बल्कि जल भी ग्रहण नहीं करते। निर्जला एकादशी को ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी भी कहा जाता है। भारतीय पंचांग में ज्येष्ठ मास ग्रीष्म ऋतु का सबसे कठोर महीना माना जाता है। इस मास में सूर्य अपनी सर्वोच्च शक्ति के साथ पृथ्वी पर किरणें बरसाता है और तापमान अपने चरम पर होता है। ऐसे समय में जल से संबंधित किसी भी त्याग को अत्यंत कठिन माना जाता है। मानव शरीर की सबसे बुनियादी आवश्यकताओं में जल प्रमुख है और इसी कारण निर्जला व्रत को अन्य सभी एकादशियों से ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है।

पचीस जून दो हजार छब्बीस को भारत में ग्रीष्मकाल अपने अंत की ओर होगा। इसी समय बारिश के मौसम की शुरुआत होने लगती है। वैदिक ऋतु चक्र के अनुसार यह काल मानव शरीर में पित्त दोष की वृद्धि का समय होता है। ऐसे समय में जल का त्याग करना शारीरिक और मानसिक संयम का परम उदाहरण है। पहली बार जब कोई व्यक्ति निर्जला एकादशी का व्रत करने का निर्णय लेता है तो वह स्वयं को एक बहुत बड़ी चुनौती देता है।

इस व्रत की कथा का संदर्भ महाभारत काल से जुड़ा है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने भीमसेन को इस विशेष एकादशी के बारे में बताया था। भीम जो पांडव भाइयों में सबसे अधिक बलशाली थे अपनी तीव्र भूख की वजह से मासिक दोनों एकादशियों का व्रत करने में असमर्थ थे। उन्होंने अपनी यह समस्या महर्षि व्यास को समझाई। व्यास जी ने भीम को बताया कि ज्येष्ठ की शुक्ल एकादशी को यदि कोई मनुष्य पूरे दिन और रात जल ग्रहण किए बिना व्रत रखे तो उसे पूरे साल की चौबीस एकादशियों का संयुक्त फल प्राप्त होता है। इसलिए इसे भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी कहा जाता है। भीम ने इस कठिन व्रत को स्वीकार किया और तब से यह परंपरा चली आ रही है।

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धार्मिक दृष्टिकोण से निर्जला एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है। विष्णु पुराण और स्कंद पुराण में इस व्रत का विस्तृत वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु को सत्य, धर्म और सत्य के रक्षक के रूप में माना जाता है। उन्हें समर्पित यह व्रत मनुष्य को नैतिकता और ईमानदारी के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। पच्चीस जून दो हजार छब्बीस के दिन जो लोग इस व्रत का पालन करेंगे वे सूर्योदय से अगले दिन के सूर्योदय तक किसी भी प्रकार का खाद्य पदार्थ या जल नहीं लेंगे।

इस व्रत को करने की विधि अत्यंत सरल परंतु कठोर है। व्रत का दिन शुरू होता है संकल्प से। व्रतकारी प्रातःकाल स्नान कर सफेद या पीले वस्त्र धारण करते हैं। घर के पूजा स्थल पर भगवान विष्णु का ध्यान और आह्वान किया जाता है। कुछ घरों में घंटे भर की पूजा का विधान होता है जिसमें फूल, दीप और धूप का उपयोग किया जाता है। भगवान को तुलसी के पत्ते अर्पित किए जाते हैं। संपूर्ण दिन भक्त भगवान के नाम का जाप करते हैं, भजन गाते हैं या धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं। रात भर जागरण करने की परंपरा भी इस व्रत में विशेष महत्व रखती है।

निर्जला एकादशी का सामाजिक पहलू भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज्येष्ठ की तपती दोपहर में जब सूर्य अपनी पूरी शक्ति के साथ प्रज्वलित होता है तब भारतीय समाज में प्याऊ लगाने की परंपरा देखी जाती है। घरों से लेकर चौराहों तक मिट्टी के बर्तनों में ठंडा जल रखा जाता है। शरबत, नींबू पानी और विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्यकर पेय का वितरण किया जाता है। गरीबों को कपड़े और भोजन दान किया जाता है। बहुत सारे लोग इस दिन को पशु पक्षियों को जल देने के लिए भी महत्वपूर्ण मानते हैं।

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स्वास्थ्य के विज्ञान की बात करें तो निर्जला एकादशी का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। आयुर्वेद के अनुसार वर्ष में कभी कभी पूर्ण उपवास करना शरीर के विषैले तत्वों को बाहर निकालता है। यह प्रक्रिया अग्नि तत्व को संतुलित करती है। हालांकि निर्जला व्रत बहुत कठिन है इसलिए बीमार, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और बच्चों के लिए धार्मिक ग्रंथों में इसमें छूट देने का प्रावधान है। आंशिक व्रत या फल और दूध पर रहना भी स्वीकार्य माना गया है। धर्म का उद्देश्य किसी को कष्ट देना नहीं है बल्कि आत्मा को शुद्ध करना और मन को अनुशासित करना है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है। जब मनुष्य अपनी बुनियादी जैविक आवश्यकताओं का त्याग करता है तब उसे यह अनुभूति होती है कि मानव का शरीर क्षणभंगुर है और वास्तविक अस्तित्व आत्मा में निहित है। यह व्रत आत्म संयम का एक माध्यम है। जो व्यक्ति अपनी भूख और प्यास पर नियंत्रण कर सकता है वह जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है। यह व्रत आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति को जागृत करता है।

पर्यावरणीय दृष्टि से भी इस व्रत का एक महत्वपूर्ण पहलू है। जल संकट आजकल विश्व की एक गंभीर समस्या बन गई है। निर्जला एकादशी हमें जल के प्रति सजग करती है। जब कोई व्यक्ति दिनभर प्यासा रहता है तब उसे उन करोड़ों लोगों की पीड़ा का अनुमान हो जाता है जो दुनिया भर में शुद्ध जल के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस व्रत के दिन बावड़ियों, तालाबों और जल स्रोतों की सफाई का कार्य भी पारंपरिक रूप से किया जाता है। यह संदेश देता है कि जल हमारी सामूहिक संपदा है और इसे संरक्षित करना हम सभी की जिम्मेदारी है।

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निर्जला एकादशी की रात को जागरण की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। पूरी रात भगवान की आरती, भजन और कथा सुनने की परंपरा है। इसमें परिवार के सभी सदस्य एकत्रित होते हैं। बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को धार्मिक कथाएं सुनाती हैं। यह परंपरा संस्कृति को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने का माध्यम है। भारतीय समाज की सामूहिक चेतना इसी तरह बनी और बनी रहती है।

व्रत के समापन अर्थात पारण की भी एक विशेष परंपरा है। अगले दिन जब दोपहर में पारण किया जाता है तो सबसे पहले घी और मठरी या खीर का सेवन किया जाता है। इसके बाद धीरे धीरे सामान्य भोजन शुरू किया जाता है। पारण के समय ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान दक्षिणा देना परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है। कुछ परिवार इस अवसर पर जरूरतमंदों को कपड़े और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान भी देते हैं।

निर्जला एकादशी का व्रत न केवल व्यक्तिगत शुद्धि का साधन है बल्कि सामाजिक कल्याण का भी प्रतीक है। भारतीय दर्शन में यह माना गया है कि जब हम अपने भीतर की कमजोरियों पर विजय प्राप्त करते हैं तब हम समाज के लिए बेहतर सदस्य बन जाते हैं। निर्जला एकादशी हमें यही संदेश देती है कि सच्ची भक्ति न केवल मंदिरों में होती है बल्कि वह हमारे आचरण, हमारे संयम और हमारी दूसरों के प्रति सहानुभूति में प्रतिफलित होती है।