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स्कूलों में राष्ट्रगीत और वंदना छत्तीसगढ़ शासन का दूरदर्शी कदम

आचार्य ललित मुनि

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग ने 13 जून 2026 को जारी एक महत्वपूर्ण आदेश में नवीन शिक्षा सत्र 2026-27 से प्रदेश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राज्यगीत, सरस्वती वंदना, शांति मंत्र और भोजन मंत्र को अनिवार्य कर दिया है। यह आदेश नवा रायपुर स्थित मंत्रालय महानदी भवन से जारी हुआ है और सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को इसे तत्काल प्रभाव से लागू करने का निर्देश दिया गया है। यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, यह भारत की आत्मा को शिक्षा के केंद्र में पुनः स्थापित करने का एक सकारात्मक प्रयास है।

किसी भी राष्ट्र की सच्ची पहचान उसके नागरिकों के चरित्र से होती है, और चरित्र का निर्माण होता है बचपन में मिली शिक्षा और संस्कारों से। भारत की प्राचीन गुरुकुल परंपरा में विद्यार्थी केवल शास्त्र ही नहीं पढ़ता था, वह जीवन जीना सीखता था। वह सत्य बोलना, दूसरों का सम्मान करना, प्रकृति से प्रेम करना और समाज के प्रति अपने दायित्वों को समझना सीखता था। आज की शिक्षा व्यवस्था में जब हम केवल अंकों और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में उलझे हुए हैं, तब छत्तीसगढ़ शासन ने एक सराहनीय और दूरदर्शी निर्णय लिया है।

सा विद्या या विमुक्तये।  अर्थात वही विद्या है जो मुक्ति दिलाए अर्थात जो मनुष्य को अज्ञान, अहंकार और संकीर्णता से मुक्त करे। भारतीय दर्शन में शिक्षा का अर्थ कभी केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं रहा। विष्णु पुराण का यह सुप्रसिद्ध वचन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था। यदि शिक्षा मनुष्य को मानवीय बनाने में सफल नहीं होती, तो वह केवल एक कुशल मशीन बना देती है। नैतिक शिक्षा वह आधारशिला है जिस पर ज्ञान का महल टिका होता है।

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आधुनिक मनोविज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि बच्चे के व्यक्तित्व का आधारभूत निर्माण पाँच से पंद्रह वर्ष की आयु में होता है। इसी उम्र में यदि उसे सत्य, करुणा, अनुशासन और सेवाभाव के संस्कार दिए जाएँ, तो वे जीवनभर उसके साथ रहते हैं। छत्तीसगढ़ शासन का यह निर्णय ठीक इसी मनोवैज्ञानिक सत्य पर आधारित है।

प्रतिदिन प्रातःकाल सरस्वती वंदना और शांति मंत्र का पाठ अनिवार्य किया गया है। विद्यार्थी भोजन ग्रहण करने से पूर्व भोजन मंत्र का उच्चारण करेंगे। विद्यालय में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और राज्यगीत का नियमित संचालन होगा। इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह केवल सरकारी विद्यालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश के समस्त निजी विद्यालयों पर भी समान रूप से लागू होता है। इससे प्रदेश के लाखों विद्यार्थियों को इस नैतिक और सांस्कृतिक शिक्षा का लाभ मिलेगा।

हम जानते हैं कि नैतिक शिक्षा का प्रभाव केवल बचपन तक सीमित नहीं रहता। जिन बच्चों को नैतिक और सांस्कृतिक शिक्षा मिलती है, वे बड़े होकर बेहतर नागरिक और बेहतर इंसान बनते हैं।  व्यक्तिगत जीवन में नैतिक शिक्षा से प्राप्त अनुशासन, समय की पाबंदी, बड़ों का सम्मान और सत्य बोलने की आदत उसे हर क्षेत्र में सफल बनाती है। सामाजिक जीवन में नैतिक रूप से शिक्षित व्यक्ति सहयोग, सहानुभूति और सेवाभाव के साथ समाज में योगदान देता है। राष्ट्रीय जीवन में जब करोड़ों नागरिक नैतिक मूल्यों से युक्त होते हैं, तो भ्रष्टाचार, हिंसा और असमानता स्वयं कम होने लगती है।

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छत्तीसगढ़ के विद्यालयों में प्रतिदिन जब लाखों बच्चे राष्ट्रगान गाएंगे, शांति मंत्र पढ़ेंगे और कृतज्ञता के साथ भोजन ग्रहण करेंगे, तो इसका संचयी प्रभाव दस-बीस वर्षों में एक ऐसी पीढ़ी के रूप में सामने आएगा जो न केवल शिक्षित होगी, बल्कि संवेदनशील, जिम्मेदार और देशप्रेमी भी होगी।

इस नवीन व्यवस्था की सफलता केवल शासन के आदेश पर निर्भर नहीं है। इसके लिए शिक्षकों की समझ और प्रतिबद्धता आवश्यक है। शिक्षक को स्वयं इन मूल्यों का जीवंत उदाहरण बनना होगा। जब बच्चा देखता है कि उसका शिक्षक भी उतनी ही श्रद्धा से मंत्रपाठ करता है, तो वह उसे रटने की बजाय हृदय से ग्रहण करता है।

परिवार की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि घर में माता-पिता भी इन्हीं मूल्यों को जीते हैं, तो विद्यालय में मिली शिक्षा और अधिक गहरी जड़ें जमाती है। छत्तीसगढ़ शासन का यह प्रयास तभी पूर्ण फल देगा जब विद्यालय और परिवार मिलकर इस दिशा में काम करें।

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छत्तीसगढ़ शासन का यह नवीन आदेश उस पुरानी बात को फिर से स्थापित करता है जो हम जानते तो थे पर भूल रहे थे कि पुस्तकीय ज्ञान और नैतिक संस्कार अलग नहीं हैं, बल्कि दोनों मिलकर ही एक संपूर्ण शिक्षा का निर्माण करते हैं। एक ऐसे समय में जब शिक्षा व्यवस्था पर व्यावसायीकरण और रटंत प्रणाली का आरोप लगाया जाता है, यह आदेश एक ताजी हवा की तरह है।

जब छत्तीसगढ़ के लाखों विद्यार्थी प्रतिदिन शांति मंत्र गाएंगे, तो वे अनजाने में ही सही, यह सीखेंगे कि उनकी सुख-समृद्धि की कामना केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि समस्त जीवों के लिए है। यही भावना एक समरस, न्यायप्रिय और करुणामय समाज की नींव है। यत्र विद्या तत्र धर्मः, यत्र धर्मः तत्र सुखम्।