नक्सल समर्थकों से लेकर विवादित चेहरों तक: ये है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की दिशा !
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
सोशल मीडिया की दुनिया से अचानक उभरी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) खुद को देश के युवाओं की आवाज और व्यवस्था परिवर्तन का प्रतीक बताती है, परन्तु जैसे-जैसे इसके नेतृत्व, प्रवक्ताओं और समर्थकों के बारे में जानकारियां सामने आ रही हैं, वैसे-वैसे यह सवाल भी गहराता जा रहा है कि क्या यह वास्तव में युवाओं का आंदोलन है या फिर वामपंथी, नक्सल समर्थक और भारत-विरोधी विमर्श को नया चेहरा देने का एक संगठित प्रयास?
दरअसल, शनिवार छह जून को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की घोषणा के साथ CJP ने सड़क की राजनीति में उतरने का प्रयास किया, लेकिन इस आंदोलन के पीछे खड़े लोगों का रिकॉर्ड और उनके पुराने सार्वजनिक वक्तव्य यह कहने का अवसर दे रहे हैं कि यह आंदोलन बेरोजगारी या शिक्षा सुधार से अधिक एक वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का मंच है।
प्रवक्ता या विवादों का पुलिंदा?
सबसे बड़ा विवाद CJP के आधिकारिक प्रवक्ता ‘सौरभ दास’ को लेकर है। पार्टी ने उन्हें अपने प्रमुख चेहरों में शामिल किया है, लेकिन उनके अतीत के बयान और लिखे लेख लगातार सवालों के घेरे में रहे हैं। सौरभ दास ने दिल्ली में प्रदूषण विरोधी प्रदर्शनों के दौरान “माओवादी कमांडर माडवी हिडमा” के समर्थन में लगाए गए नारों का बचाव किया था। “तुम कितने हिडमा मारोगे, हर घर से हिडमा निकलेगा” जैसे नारों को लेकर जब राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस ने कार्रवाई की, तब दास ने प्रदर्शनकारियों का पक्ष लिया।
देश के सुरक्षा बल पिछले दो दशकों से ‘नक्सलवाद’ के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में एक राजनीतिक संगठन का आधिकारिक प्रवक्ता यदि ऐसे नारों के समर्थन में खड़ा दिखाई दे, तो यह स्वाभाविक है कि उसकी विचारधारा को लेकर सवाल उठेंगे, स्वभाविक है, वह एक नए रूप में सबके सामने आ रहा है! यही नहीं, दास ने जी.एन. साईबाबा की मृत्यु के बाद उन्हें “साहसी व्यक्ति” बताया था। साईबाबा को माओवादी संगठनों से संबंधों के आरोपों में दोषी ठहराया गया था। यह रुख सिर्फ मानवाधिकार की बहस कैसे भी नहीं कहलाएगी, सीधे तौर पर नक्सली विचारधारा के प्रति सहानुभूति का संकेत देता है।
दिल्ली दंगे, उमर खालिद और गुलफिशा फातिमा
सौरभ दास लगातार उन व्यक्तियों के समर्थन में भी दिखाई दिए हैं जिनके नाम दिल्ली दंगा मामलों और उससे जुड़ी जांचों में सामने आए। उन्होंने ‘उमर खालिद’ की हिरासत को लेकर बार-बार न्यायपालिका और जांच एजेंसियों की आलोचना की। इसी प्रकार उन्होंने ‘गुलफिशा फातिमा’ के मामले को भी लगातार उठाया। एक तरह से देखा जाए तो दास का पूरा सार्वजनिक रिकॉर्ड ऐसे लोगों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है जिन पर देश की सुरक्षा, सांप्रदायिक हिंसा या उग्र राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े आरोप लगे हैं।
राम मंदिर से लेकर अरुंधति रॉय तक
सौरभ दास के सार्वजनिक बयानों में केवल नक्सलवाद या दिल्ली दंगे ही नहीं हैं। राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के बाद उन्होंने अन्य विवादित धार्मिक स्थलों को लेकर हिंदू पक्ष की मांगों का विरोध किया। उन्होंने ऐतिहासिक विवादों के लिए वर्तमान पीढ़ी के कथित मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराने का विरोध किया। इसके अलावा, जब अरुंधति रॉय के खिलाफ UAPA के तहत कार्रवाई की मंजूरी दी गई, तब उन्होंने रॉय को देश के “सर्वश्रेष्ठ बुद्धिजीवियों” में से एक बताया।
यानी CJP के प्रमुख प्रवक्ता का वैचारिक रिकॉर्ड उन मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है जो लंबे समय से वामपंथी और राष्ट्रवादी विमर्श के बीच टकराव का कारण रहे हैं। जो नक्सल वाद को सही ठहराते हैं, जो कथित आतंकवाद का समर्थन करते हैं, जो कश्मीर में सुरक्षा बलों का विरोध करते हैं, आदि, आदि…!
ध्रुव राठी कनेक्शन और वैचारिक नेटवर्क
पार्टी की दूसरी प्रवक्ता विजेता दहिया को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल दावों के अनुसार वे लंबे समय तक यूट्यूबर ध्रुव राठी के साथ रिसर्च और स्क्रिप्ट लेखन से जुड़े रहे। विशेष रूप से भगवान राम को मांसाहारी बताने वाले विवादित वीडियो की स्क्रिप्ट से उनका नाम जोड़ा गया है।
आश्चर्य है, भारतीय ज्ञान परंपरा में, संपूर्ण साहित्य में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलता है जोकि सीधे भगवान राम को मांसाहारी सिद्ध करे, किंतु ध्रुव राठी के साथ वे एक नैरेटिव भगवान श्रीराम के विरोध, कहना चाहिए कि एक तरह से हिन्दू धर्म एवं समाज के बीच पैदा करते हैं। कहना यही है कि ये जो ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) है, उसका नेतृत्व ऐसे लोगों को आगे ला रहा है जो लंबे समय से हिंदुत्व विरोधी विमर्श से जुड़े रहे हैं या जुड़े हुए हैं।
समर्थन करने वालों की सूची भी उठाती है सवाल
कॉकरोच जनता पार्टी को समर्थन देने वालों में प्रकाश राज, प्रशांत भूषण, सोनम वांगचुक और कांग्रेस से जुड़े कुछ छात्र नेता शामिल हैं। इनमें से कई चेहरे पहले भी केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना के लिए जाने जाते रहे हैं। प्रशांत भूषण ने खुले तौर पर CJP को “असली Gen-Z आंदोलन” बताया। वहीं प्रकाश राज ने युवाओं से आंदोलन में शामिल होने की अपील की।
अब यहां स्वभाविक प्रश्न बनता है कि यदि यह पूरी तरह स्वतःस्फूर्त युवा आंदोलन है, तो फिर इसके पीछे वही परिचित राजनीतिक और वैचारिक चेहरे क्यों दिखाई दे रहे हैं जो वर्षों से मोदी विरोधी, भाजपा विरोधी, संघ विरोधी अभियानों का हिस्सा रहे हैं?
क्या यह आंदोलन वास्तव में राजनीतिक नहीं है?
यह भी विचार करें; CJP खुद को गैर-पारंपरिक और गैर-दलीय आंदोलन बताती है, लेकिन संविधान क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। क्योंकि इसके लिए एक विपक्षी सांसद की सिफारिश का उपयोग किया गया। सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया गया कि आंदोलन का वास्तविक उद्देश्य कुछ राज्यों में भाजपा विरोधी राजनीति को लाभ पहुंचाना है और अप्रत्यक्ष रूप से पर्दे के पीछे रहकर आम आदमी पार्टी (आप) को समर्थन देना है। अब स्वभाविक है कि इससे आंदोलन की राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल जरूर खड़े हुए हैं।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया की असामान्य दिलचस्पी
एक और दिलचस्प पहलू अंतरराष्ट्रीय मीडिया का समर्थन है। तुर्की के सरकारी मीडिया TRT World ने CJP को भारत में उभरती युवा क्रांति के रूप में प्रस्तुत किया। यह वही तुर्की है जिसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया था और अक्सर भारत विरोधी रुख अपनाता रहा है। वहीं, ब्लूमबर्ग ने भी CJP को बेरोजगार और असंतुष्ट युवाओं की आवाज के रूप में पेश किया। इसी तरह से युरोप एवं यूएस के भी कई मीडिया संस्थान है, जो इसे भारत के संदर्भ में युवाओं की असंतुष्ट आवाज करार दे रहे हैं। ऐसे में स्वभाविक तौर पर लगता है कि जब भारत विरोधी रुख रखने वाले विदेशी मंच किसी आंदोलन को असाधारण महत्व देने लगें, तो उसके पीछे के राजनीतिक निहितार्थों की जांच होनी चाहिए।
आंदोलन या प्रायोजित नैरेटिव?
इन सभी घटनाक्रम के कारण से यहां सीधे तौर पर स्पष्ट होता है कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) कि यह कोई स्वाभाविक जनआंदोलन नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक नैरेटिव है।पूरे अभियान में सोशल मीडिया ब्रांडिंग, विवादित चेहरे, मीडिया मैनेजमेंट और गिरफ्तारी की संभावित राजनीति का मिश्रण दिखाई देता है।
यदि उद्देश्य वास्तव में युवाओं की समस्याओं का समाधान होता, तो संगठन अब तक शिक्षा, रोजगार, आर्थिक सुधार और प्रशासनिक जवाबदेही पर ठोस नीति दस्तावेज सामने रखता, लेकिन अभी तक उसका सबसे बड़ा परिचय उसके विवादित चेहरे और विवादित बयान ही बने हुए हैं।
ऐसे में सोशल मीडिया की कोख से हाल में जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रवर्तक अभिजीत दिपके एवं उनके सभी साथियों को लेकर यही कहना होगा कि भले ही कॉकरोच जनता पार्टी खुद को युवाओं की क्रांति बताए, लेकिन उसके चेहरे, समर्थक और वैचारिक झुकाव एक अलग कहानी कहते हैं। वस्तुत: नक्सल समर्थक नारों के बचाव से लेकर दिल्ली दंगा आरोपियों के पक्ष में खड़े होने तक, विवादित लेखकों और कार्यकर्ताओं के समर्थन से लेकर विदेशी मीडिया की असामान्य रुचि तक, कई ऐसे तथ्य हैं जिन्होंने इस संगठन को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है।
यही कारण है कि आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि CJP कितने कम समय में कितनी अधिक लोकप्रिय हो गई है, बल्कि यह है कि क्या यह वास्तव में युवाओं की आवाज है या फिर भारत में एक नए वैचारिक मोर्चे के निर्माण का प्रयास? जिसका मूल उद्देश्य भारत में चारो ओर से अलगाव का वातावरण बनाना है, ताकि राज्य व्यवस्था को कमजोर किया जा सके और फिर कमजोर राज्य व्यवस्था में अपना हित साधा जा सके!

