हे राज्य व्हावे ही श्रींची इच्छा : शिवाजी का राज्याभिषेक

इतिहास की कुछ तारीखें केवल कैलेंडर पर दर्ज नहीं होतीं, वे मानव चेतना में अंकित हो जाती हैं। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, शक संवत 1596 अर्थात 6 जून 1674 का दिन ऐसा ही एक दिन था। रायगढ़ के दुर्ग पर जब शिवाजी महाराज सिंहासन पर विराजमान हुए, तब केवल एक व्यक्ति का राज्याभिषेक नहीं हो रहा था। उस दिन सदियों से पराजित, अपमानित और टूटे हुए हिन्दू मानस का पुनर्जन्म हो रहा था। उस दिन एक ऐसी चेतना जाग रही थी जो भूल चुकी थी कि स्वाभिमान के साथ जीना क्या होता है।
इस राज्याभिषेक को समझने के लिए पहले उस पृष्ठभूमि को समझना होगा जिसमें यह घटना घटी। भारत में इस्लामी आक्रमणों का सिलसिला सातवीं शताब्दी से आरम्भ हुआ था। महमूद गजनवी से लेकर औरंगजेब तक, लगभग एक हजार वर्षों की यात्रा में हिन्दू समाज ने असंख्य आघात सहे। मन्दिर तोड़े गए, मूर्तियाँ खण्डित की गईं, जबरन धर्म परिवर्तन हुए, जजिया कर की यातना झेली गई और सबसे बड़ी क्षति यह हुई कि हिन्दू मानस के भीतर से यह विश्वास ही समाप्त होने लगा कि वह अपनी नियति का स्वयं निर्माता हो सकता है।
मध्यकालीन इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक “शिवाजी एण्ड हिज टाइम्स” में लिखा है कि शिवाजी के जन्म के समय तक दक्कन में हिन्दू राजनीतिक सत्ता लगभग समाप्त हो चुकी थी। बीजापुर, गोलकुण्डा और दिल्ली के मुगल सल्तनत ने मिलकर इस क्षेत्र पर ऐसी पकड़ बनाई थी कि हिन्दू नेतृत्व की कल्पना भी असम्भव लगती थी। ऐसे में 1627 में शिवनेरी दुर्ग पर एक बालक का जन्म हुआ जो आगे चलकर इस पराजय की कहानी को पलटने वाला था।
शिवाजी का व्यक्तित्व समझने के लिए उनकी माता जीजाबाई को समझना अनिवार्य है। जीजाबाई एक ऐसी माँ थीं जो स्वयं एक टूटे हुए समाज की संतान थीं, किन्तु उनके भीतर एक अखण्ड आग जलती थी। उन्होंने शिशु शिवाजी को रामायण और महाभारत की कहानियाँ सुनाईं, किन्तु वे केवल कहानियाँ नहीं थीं, वे एक स्मृति थीं, एक अनुस्मारक थीं कि हम कभी विजेता रहे हैं और पुनः विजेता हो सकते हैं।
इतिहासकार गोविन्द सखाराम सरदेसाई ने अपने ग्रन्थ “न्यू हिस्ट्री ऑफ द मराठाज” में लिखा है कि जीजाबाई का प्रभाव शिवाजी के चरित्र निर्माण में किसी भी अन्य तत्त्व से अधिक महत्त्वपूर्ण था। उनकी माता ने उन्हें यह सिखाया कि धर्म की रक्षा केवल प्रार्थना से नहीं होती, उसके लिए शस्त्र भी उठाने पड़ते हैं। यही संस्कार आगे चलकर मावल के युवाओं को एक संगठित शक्ति के रूप में एकत्रित करने में सहायक हुआ।
1645 में जब सोलह वर्षीय शिवाजी ने तोरणा का किला फतह किया, तब यह केवल एक सैन्य विजय नहीं थी। यह एक मनोवैज्ञानिक घोषणा थी कि हिन्दू युवक भी तलवार चला सकता है और जीत सकता है। इसके बाद कोंडाणा, राजगढ़, प्रतापगढ़ और अनेक किले उनके नाम होते चले गए।
1659 में अफजल खान के वध ने सम्पूर्ण दक्कन में एक सन्देश भेजा। अफजल खान बीजापुर सल्तनत का सबसे शक्तिशाली सेनापति था और यह विश्वास प्रचलित था कि शिवाजी उसके सामने टिक नहीं पाएँगे। प्रतापगढ़ की उस भेंट में जब शिवाजी ने बाघनखे से अफजल खान का वध किया, तब यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं थी, यह उस भय की मृत्यु थी जो दशकों से हिन्दू मानस पर छाई हुई थी।
1664 में सूरत की छापामारी और 1670 में पुनः सूरत पर धावे ने मुगल साम्राज्य की आर्थिक नस पर प्रहार किया। किन्तु इससे भी महत्त्वपूर्ण था 1666 में आगरा से शिवाजी का अद्भुत पलायन। औरंगजेब की कैद से जिस चातुर्य के साथ वे निकले, उसने उन्हें एक किंवदन्ती बना दिया।
शत्रुपक्ष शिवाजी को छत्रपति के रूप में मान्यता नहीं देना चाहता था। मुगल उन्हें केवल एक “पहाड़ी चूहा” कहते थे। बीजापुर दरबार उन्हें एक विद्रोही सामन्त मानता था। इस स्थिति में एक विधिसम्मत, धर्मशास्त्र सम्मत राज्याभिषेक की अत्यन्त आवश्यकता थी।
शिवाजी ने काशी से गागाभट्ट को आमन्त्रित किया। गागाभट्ट उस काल के सर्वश्रेष्ठ विद्वानों में से एक थे। उन्होंने शास्त्रों का गहन अध्ययन करके यह सिद्ध किया कि शिवाजी का वंश मेवाड़ के सिसोदिया राजपूतों से है और इसलिए वे क्षत्रिय हैं। उन्होंने शिवाजी का वैदिक मन्त्रोच्चार के साथ राज्याभिषेक सम्पन्न कराने की घोषणा की।
6 जून 1674, ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी का वह दिन रायगढ़ के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित हो गया। समकालीन साक्ष्य बताते हैं कि उस दिन के उत्सव में लाखों लोग सम्मिलित हुए। दूर दूर से विद्वान, सन्त, व्यापारी और साधारण जन रायगढ़ की ओर उमड़ पड़े थे।
समकालीन पुर्तगाली और अंग्रेज़ व्यापारियों के विवरण इस उत्सव की विशालता का अनुमान देते हैं। अंग्रेज व्यापारी हेनरी ऑक्सेन्डेन जो उस समय सूरत में था, उसने लिखा है कि यह राज्याभिषेक अत्यन्त भव्य था और इसमें एक विशेष प्रकार की उर्जा थी जो सामान्य राजाओं के राज्याभिषेक में नहीं होती।
राज्याभिषेक की विधि के बारे में “शिवभारत” और “सभासद बखर” जैसे समकालीन ग्रन्थ विस्तृत विवरण देते हैं। शिवाजी को सोलह प्रकार के स्नान कराए गए। उनके मस्तक पर अभिषेक जल ढाला गया। सोने के सिंहासन पर विराजमान होने के बाद उन्हें “छत्रपति” की उपाधि प्रदान की गई। कहा जाता है कि उस दिन सात हजार ब्राह्मणों ने वैदिक मन्त्रों का पाठ किया।
शिवाजी की माता जीजाबाई इस उत्सव की साक्षी बनीं। एक माँ ने अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठते देखा, किन्तु यह क्षण व्यक्तिगत नहीं था। यह सम्पूर्ण हिन्दू समाज की माँ का अपने पुत्र को राजा के रूप में देखना था। दुर्भाग्यवश राज्याभिषेक के केवल बारह दिन बाद जीजाबाई का देहान्त हो गया, मानो उनके जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो गया था।
राज्याभिषेक केवल एक राजनीतिक घटना नहीं था। इसके साथ शिवाजी ने जो कुछ किया, वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। उन्होंने अपने राज्य में मराठी को राजभाषा घोषित किया। फारसी शब्दों के स्थान पर संस्कृत निष्ठ मराठी शब्दावली के प्रयोग के लिए “राज्यव्यवहार कोश” की रचना कराई। यह भाषायी स्वाभिमान उस मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का अंग था जो शिवाजी लाना चाहते थे।
रायगढ़ के राज्याभिषेक का समाचार जब औरंगजेब तक पहुँचा, तो उसकी प्रतिक्रिया अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कहा जाता है कि उसने क्रोध में एक दरबारी को कड़ी फटकार लगाई। यह क्रोध समझ में आता है। औरंगजेब जानता था कि यह केवल एक राज्याभिषेक नहीं था। यह उसकी नीतियों के विरुद्ध एक सैद्धान्तिक चुनौती थी।
औरंगजेब ने 1679 में जजिया कर पुनः लागू किया था। उसने असंख्य मन्दिर तोड़े थे। उसकी नीति स्पष्ट थी कि हिन्दू समाज को राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से इतना दुर्बल कर दिया जाए कि वह कभी सिर न उठा सके। रायगढ़ का राज्याभिषेक इस नीति के विरुद्ध एक खुली घोषणा थी।
शिवाजी के राज्याभिषेक का एक और पक्ष है जिसकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। समर्थ रामदास स्वामी ने शिवाजी को वह आध्यात्मिक आधार प्रदान किया जिसके बिना यह यात्रा अधूरी रहती। “दासबोध” में जो विचार हैं, वे केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना को जगाने वाले हैं।
रामदास स्वामी ने अपने मठों के माध्यम से सम्पूर्ण महाराष्ट्र में एक सांस्कृतिक जागृति उत्पन्न की थी। उन्होंने हनुमान के रूप में शक्ति और भक्ति का समन्वय प्रस्तुत किया। “निश्चयाचा महामेरू, बहुत जनांसी आधारू” जैसी उनकी पंक्तियाँ उस मनोबल को दर्शाती हैं जो उन्होंने मराठी समाज में भरा था।
यह कहा जाता है कि जब समर्थ रामदास ने शिवाजी से पूछा कि तुम्हारा गुरु कौन है, तो शिवाजी ने उत्तर दिया “माँ जीजाबाई और तुलजाभवानी।” यह उत्तर शिवाजी के चरित्र की गहराई को दर्शाता है। उनके लिए राज्य केवल भूखण्ड नहीं था, वह एक धार्मिक और सांस्कृतिक दायित्व था।
ब्रिटिश इतिहासकार डेनिस किन्केड ने अपनी पुस्तक “द ग्रैंड रिबेल” में लिखा है कि शिवाजी के बाद भारत पहले जैसा नहीं रहा। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि संगठित और उद्देश्यपूर्ण प्रतिरोध से बड़ी से बड़ी शक्ति को भी चुनौती दी जा सकती है।
हम सोचते हैं कि क्या रायगढ़ का राज्याभिषेक सचमुच पराजित हिन्दू मानस से विजयी हिन्दू मानस की यात्रा का प्रतीक था?
इसका उत्तर समझने के लिए उस मनोवैज्ञानिक अवस्था को समझना होगा जिसमें हिन्दू समाज पहुँच चुका था। सदियों की पराजय ने एक ऐसी मानसिकता उत्पन्न कर दी थी जिसमें लोग मान चुके थे कि विदेशी आधिपत्य ही उनकी नियति है। जब कोई समाज इस स्तर पर पहुँच जाता है तो उसके लिए सबसे आवश्यक होता है एक सफलता का अनुभव, एक ऐसा प्रतीक जो यह सिद्ध करे कि हम भी कर सकते हैं।
शिवाजी ने यही किया। उनकी प्रत्येक विजय ने उस पराजित मानस को थोड़ा थोड़ा उठाया। और रायगढ़ का राज्याभिषेक उस प्रक्रिया का चरम बिन्दु था। जब हजारों लोगों ने एक हिन्दू राजा को सिंहासन पर विराजमान होते देखा, जब उन्होंने “छत्रपति शिवाजी महाराज की जय” की ध्वनि सुनी, तब उनके भीतर जो परिवर्तन आया, वह शब्दों में वर्णनीय नहीं है।
रायगढ़ का किला आज भी खड़ा है। उस सिंहासन की नींव आज भी वहाँ देखी जा सकती है जहाँ कभी शिवाजी विराजे थे। लाखों लोग प्रतिवर्ष वहाँ जाते हैं और उस स्थान पर खड़े होकर एक अनिर्वचनीय भाव का अनुभव करते हैं। यह हिन्दुत्व के उत्कर्ष का जीवंत समारक है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के जानकार हैं।

