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प्रकृति संरक्षण की प्राचीन पाठशाला है हमारा कुटुम्ब

आचार्य ललित मुनि

गाँव की माटी में एक अनोखी विशेषता है कि यहाँ ज्ञान कभी केवल किताबों तक सीमित नहीं रहा। यहाँ का हर त्योहार एक पाठ था, हर लोकगीत एक संदेश था, हर परंपरा एक विज्ञान था। जब एक दादी अपने पोते को तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाने को कहती है, तो वह न केवल धर्म सिखा रही है, बल्कि उस बच्चे के मन में एक वनस्पति के प्रति आदर का बीज बो रही होती है। जब एक माँ नदी किनारे खड़े होकर जल को नमन करती थी, तो बच्चा समझता था कि जल केवल पीने की चीज़ नहीं, वह पूजनीय है। भारतीय लोक संस्कृति और कुटुम्ब परिवार की यही वह पाठशाला है जो किसी स्कूल से पहले और किसी पाठ्यपुस्तक से गहरी शिक्षा एवं समझ देती आई है।

प्रकृति पूजा है भारतीय परंपरा की आत्मा
भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ नदियों को माँ कहा जाता है, पहाड़ों को देव माना जाता है, वृक्षों की परिक्रमा की जाती है और पशुओं को देवताओं का वाहन बताकर उनके प्रति सम्मान जगाया जाता है। गंगा, यमुना, नर्मदा, कावेरी ये केवल नदियाँ नहीं हैं, ये माताएँ हैं। पीपल, बरगद, तुलसी, नीम, आंवला ये केवल पेड़ पौधे नहीं हैं, ये देवत्व के प्रतीक हैं। इस सांस्कृतिक ढाँचे ने सदियों तक पर्यावरण की रक्षा उस तरह की जैसी कोई कानून नहीं कर सकता। जब कोई चीज़ पवित्र मानी जाती है तो उसे नुकसान पहुँचाने से पहले मनुष्य का मन स्वयं रुक जाता है।

लोक परंपराओं में पर्यावरण चेतना के अनगिनत उदाहरण मिलते हैं। छत्तीसगढ़ की लोक परम्परा में गोत्र से संबंधित वृक्ष को काटा नहीं जाता, उसे देवता माना जाता है। छत्तीसगढ़ और झारखंड के जनजातीय समाज में वनों को केवल संसाधन नहीं बल्कि पूर्वजों का वास माना जाता है। इसीलिए वे जंगल से उतना ही लेते हैं जितनी जरूरत हो। राजस्थान का बिश्नोई समुदाय पेड़ों की रक्षा के लिए प्राण तक न्योछावर करने की परंपरा रखता है। 1730 में अमृता देवी बिश्नोई ने अपनी तीन बेटियों समेत जीवन देकर खेजड़ी के पेड़ बचाए। यह घटना चिपको आंदोलन से भी ढाई सौ साल पुरानी है।

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लोकगीत और कथाएँ द्वारा अनजाने में पर्यावरण शिक्षा
भारत के गाँवों में सदियों से ऐसी लोककथाएँ और लोकगीत प्रचलित हैं जिनमें प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश गुँथा हुआ है। लोककथाओं में नदियाँ बोलती हैं, पेड़ रोते हैं और जब मनुष्य उनसे अनुचित व्यवहार करता है तो प्रकृति रूष्ट होती है। दादी कहती कि शाम हो गई है, पेड़ों से पत्ते नहीं तोड़ते, पेड़ भी सोते हैं, उन्हें जगाने से पाप लगता है। बच्चे ये कहानियाँ सुनते हुए बड़े होते थे और उनके मन में यह धारणा गहरी हो जाती थी कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना पाप है। इस तरह प्रकृति के साथ एक भावनात्मक रिश्ता बनता है। “जहाँ विज्ञान की पाठ्यपुस्तक बच्चे को बताती है कि पेड़ ऑक्सीजन देते हैं, वहीं दादी की कहानी उसे महसूस कराती है कि पेड़ जीवित हैं, उनका दर्द होता है। यही भावनात्मक शिक्षा असली पर्यावरण चेतना की जड़ है।”

त्योहारों में छुपी है पारिस्थितिक समझ
भारत के त्योहारों को ध्यान से देखें तो हर पर्व में पर्यावरण के प्रति चेतना साफ नज़र आती है। छठ पूजा में नदी और सूर्य की आराधना मनुष्य को जल स्रोतों और सौर ऊर्जा की अहमियत से परिचित कराती है। वट सावित्री व्रत में बरगद की पूजा इस विशाल वृक्ष को संरक्षण देती है। हरियाली तीज और अक्षय तृतीया वर्षा ऋतु के आगमन और धरती की उर्वरता से जुड़े हैं। मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का उत्सव है। गोवर्धन पूजा में पहाड़ और पशुधन की पूजा होती है। ये सब केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, ये पारिस्थितिकी को समझने और उसका सम्मान करने की सामूहिक शिक्षा हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार के माध्यम से बच्चों तक पहुँचती रही है।

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होली का त्योहार वसंत ऋतु में मनाया जाता है जब पेड़ पौधों पर नई कोंपलें आती हैं। होली में बसंत की गेहूं, चने की फ़सलों को भून कर उसका प्रसाद ग्रहण किया जाता, नवा खाई की परम्परा का निर्वहन होता है। पारंपरिक होली में जड़ी बूटियों और प्राकृतिक रंगों का उपयोग होता था। दीवाली में मिट्टी के दीये जलाए जाते थे जो पर्यावरण की दृष्टि से पूरी तरह सुरक्षित थे। इन परंपराओं में छुपा पर्यावरणीय ज्ञान किसी विश्वविद्यालय के शोध से कम नहीं था, बस उसे अलग भाषा में कहा गया था।

परिवार दिनचर्या है जीवंत पाठशाला
पर्यावरण शिक्षा के लिए किसी विशेष कार्यक्रम की जरूरत नहीं थी। भारतीय परिवारों की दिनचर्या में यह शिक्षा स्वाभाविक रूप से घुली हुई थी। खाना बनाने के बाद बचे अन्न को जानवरों के लिए रखना, बासी पानी से पौधों को सींचना, पुराने कपड़ों को पोंछे के रूप में दोबारा उपयोग करना, पत्तल और दोने में खाना खाना, कच्चे घड़े का पानी पीना। ये सब छोटी छोटी आदतें थीं जो बच्चों को यह सिखाती थीं कि प्रकृति के संसाधनों का सम्मान करना और उन्हें बर्बाद न करना एक जिम्मेदार जीवन की पहचान है।

खेत, जंगल और नदी हैं बचपन के स्कूल
भारत के ग्रामीण बचपन में खेत, जंगल और नदी ये तीन सबसे बड़े शिक्षक थे। जो बच्चा खेत में बाप के साथ काम करता था, वह जानता था कि बीज किस मिट्टी में पनपता है, पानी कितनी मात्रा में चाहिए, धूप कितनी जरूरी है। जो बच्चा जंगल में लकड़ी बीनने जाता था, वह पहचानता था कि कौन सा पत्ता खाने योग्य है, कौन सा जहरीला, कौन से पौधे से बुखार उतरता है। जो बच्चा नदी में नहाता था, वह नदी की धाराओं को, उसकी मछलियों को, उसके किनारे के पक्षियों को अपने परिवार के सदस्यों की तरह जानता था। इस जीवंत शिक्षा की तुलना किसी पाठ्यक्रम से नहीं हो सकती।

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आज की चुनौती और लोक संस्कृति की आवश्यकता
आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में यह पाठशाला कमज़ोर पड़ रही है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, दादा दादी शहरों में अकेले रह रहे हैं, बच्चे स्क्रीन के सामने घंटों बिता रहे हैं और लोकगीतों की जगह वीडियो गेम ने ले ली है। इस बदलाव का सीधा असर बच्चों की प्रकृति से दूरी पर पड़ रहा है। एक अध्ययन के अनुसार आज के शहरी बच्चे औसतन रोज़ाना केवल 30 मिनट बाहर खुले में बिताते हैं। जो बच्चा घास पर नहीं खेला, जिसने कभी मिट्टी नहीं छुई, जिसने नदी की आवाज़ नहीं सुनी, वह प्रकृति को बचाने की प्रेरणा कहाँ से पाएगा?

इसीलिए आज सबसे बड़ी जरूरत यह है कि हम अपनी लोक संस्कृति को न केवल संरक्षित करें बल्कि उसे अपने घरों में फिर से जीवंत करें। बच्चों को त्योहारों का अर्थ समझाएँ, लोककथाएँ सुनाएँ, बगीचे में हाथ गंदे करने दें, बारिश में भीगने दें, पक्षियों की आवाज़ें पहचानना सिखाएँ। यह सब छोटी छोटी बातें हैं, लेकिन इन्हीं से एक पीढ़ी तैयार होती है जो अपनी धरती से प्यार करती है और उसे बचाने के लिए खड़ी होती है। भारतीय लोक संस्कृति और परिवार की यह पाठशाला किसी सरकारी योजना की मोहताज नहीं, यह हमारे अपने हाथों में है। बस जरूरत है इसे पहचानने और अपनाने की।

 

आचार्य ललित मुनि

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।