रक्तरंजित थियानमेन और खूनी वामपंथी इतिहास

आधुनिक इतिहास की सबसे काली रातों में से एक 3 और 4 जून 1989 की वह रात है। बीजिंग के थियानमेन चौक पर सप्ताहों से डेरा डाले लाखों छात्र, मजदूर और नागरिक लोकतंत्र, पारदर्शी शासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग कर रहे थे। उनके हाथों में मोमबत्तियां थीं, होठों पर गीत थे और आंखों में एक बेहतर चीन का स्वप्न था। लेकिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व ने इस सपने को टैंकों के पहियों तले रौंद दिया।
पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिक, जिनका नाम ही “जनता की मुक्ति” का दावा करता था, उसी जनता पर गोलियां बरसाते हुए चौक में घुस आए। चीनी सरकार की आधिकारिक मृत्यु संख्या केवल 200 से 300 बताई गई, परंतु रेड क्रॉस और अन्य स्वतंत्र अनुमानों के अनुसार यह संख्या 2,600 से 10,000 तक हो सकती है। दशकों बाद भी चीन में इस घटना पर चर्चा प्रतिबंधित है। “टैंक मैन” की वह प्रतिष्ठित तस्वीर, जिसमें एक अकेला युवक थैले हाथ में लिए टैंकों के काफिले के सामने खड़ा है, प्रतिरोध और राज्य की बर्बरता दोनों का प्रतीक बन गई।
थियानमेन की यह त्रासदी अकस्मात नहीं हुई। यह उस वैचारिक परंपरा की परिणति थी जो वामपंथी अधिनायकवाद के इतिहास में बार-बार दोहराई गई है, जहां विचारधारा को मानव जीवन से ऊपर रखा जाता है और असहमति को देशद्रोह घोषित कर दिया जाता है।
वामपंथी अधिनायकवाद की जड़ें खोजने के लिए हमें 1917 की बोल्शेविक क्रांति तक जाना होगा। व्लादिमीर लेनिन ने सत्ता संभालते ही “रेड टेरर” की नीति अपनाई। चेका (गुप्त पुलिस) का गठन किया गया जिसने राजनीतिक विरोधियों, पादरियों, बुद्धिजीवियों और तथाकथित “वर्ग-शत्रुओं” का निर्मम दमन किया। लेनिन के काल में ही जबरन श्रम शिविरों की नींव पड़ी, जो बाद में स्टालिन युग में गुलाग के विशाल नेटवर्क में परिवर्तित हो गई।
जोसेफ स्टालिन के शासनकाल (1924-1953) में यह दमन अपनी चरम सीमा पर पहुंचा। 1936 से 1938 के बीच हुआ “ग्रेट पर्ज” या “येझोव्शचीना” इतिहास के सबसे भयावह राजनीतिक शुद्धिकरणों में से एक था। इस दौरान लाल सेना के अधिकारियों, पार्टी नेताओं, वैज्ञानिकों, लेखकों और सामान्य नागरिकों को “जासूस”, “ट्रॉट्स्कीवादी” या “जनता का दुश्मन” घोषित कर मार डाला गया या साइबेरिया के गुलाग में भेज दिया गया।
गुलाग शिविरों में लगभग 1.5 से 1.8 करोड़ लोगों को कैद रखा गया। इनमें से लाखों की भूख, ठंड, बीमारी और यातना से मृत्यु हुई। 1932 से 1933 के बीच हुए होलोडोमोर (यूक्रेनी अकाल) में, जिसे अनेक इतिहासकार स्टालिन की जानबूझकर अपनाई गई नीति मानते हैं, लगभग 35 से 50 लाख यूक्रेनियों की मौत हुई। सोवियत संघ में कुल राजनीतिक दमन के शिकार लोगों की संख्या एक करोड़ से अधिक मानी जाती है।
इस पूरी प्रक्रिया में एक विशेष पैटर्न दिखता है वैचारिक शुद्धता के नाम पर असहमति का दमन, न्यायिक प्रक्रिया का उपहास और राज्य की सर्वोच्चता के सामने व्यक्ति के जीवन की कोई कीमत नहीं। यदि स्टालिनवाद यूरोप में वामपंथी अधिनायकवाद का चेहरा था, तो माओत्से तुंग का चीन एशिया में इसी परंपरा का विस्तार था। माओ की दो प्रमुख नीतियां इतिहास की सबसे विनाशकारी मानव निर्मित त्रासदियों में गिनी जाती हैं।
“ग्रेट लीप फॉरवर्ड” (1958-1962) के दौरान माओ ने चीन को तीव्र गति से औद्योगिक और कृषि शक्ति बनाने का लक्ष्य रखा। किसानों को खेती छोड़कर इस्पात उत्पादन में लगाया गया, जबकि कृषि नीतियों की असफलता और सरकारी कोटा पूरा करने के दबाव में अनाज का निर्यात जारी रहा। परिणामस्वरूप जो अकाल पड़ा, उसमें अनुमानतः 1.5 से 5.5 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई। यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा अकाल था और इसका प्रमुख कारण प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता और सच बोलने वाले अधिकारियों का दमन था।
“सांस्कृतिक क्रांति” (1966-1976) में माओ ने “पुरानी संस्कृति, पुराने विचार, पुरानी परंपराओं और पुराने रीति-रिवाजों” को नष्ट करने का आह्वान किया। रेड गार्ड्स ने विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, मंदिरों और सांस्कृतिक धरोहरों को ध्वस्त किया। शिक्षकों, डॉक्टरों, बुद्धिजीवियों और कलाकारों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया, यातनाएं दी गईं और हत्याएं की गईं। अनुमानतः 5 से 20 लाख लोगों की मृत्यु हुई और करोड़ों लोगों का जीवन बर्बाद किया गया।
इसी वैचारिक परिप्रेक्ष्य में थियानमेन 1989 को समझा जाना चाहिए। जब छात्रों ने उसी बीजिंग की सड़कों पर लोकतंत्र की मांग की, तो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने उसे “प्रति-क्रांतिकारी अशांति” घोषित कर दिया। देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में मार्शल लॉ लागू किया गया और टैंक भेजे गए। माओ की परंपरा में पली-बढ़ी वह पार्टी यह नहीं जानती थी कि असहमति के साथ कैसे संवाद किया जाए।
अप्रैल 1989 में सुधारवादी नेता हू याओबांग की मृत्यु के बाद छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ। धीरे-धीरे यह आंदोलन व्यापक होता गया और इसमें मजदूर, पत्रकार और आम नागरिक भी शामिल होते गए। मांगें स्पष्ट थीं: प्रेस की स्वतंत्रता, भ्रष्टाचार का अंत, लोकतांत्रिक संवाद और नागरिक अधिकार। थियानमेन चौक पर बनाई गई “लोकतंत्र की देवी” की मूर्ति उस आकांक्षा का प्रतीक थी जो हर मनुष्य के भीतर स्वाभाविक रूप से होती है।
20 मई को मार्शल लॉ की घोषणा के बाद भी लाखों लोग चौक पर डटे रहे। 3 जून की आधी रात के बाद सेना ने हमला शुरू किया। सैनिकों ने निहत्थे नागरिकों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। अस्पताल घायलों से भर गए। जो बचे वे गिरफ्तार किए गए। दुनिया ने टेलीविजन पर यह सब देखा, लेकिन चीन के नागरिकों को आज भी इस घटना की सच्ची जानकारी से वंचित रखा जाता है।
इस नरसंहार की सबसे बड़ी त्रासदी केवल उन हजारों मृत्युओं में नहीं है, बल्कि उस सच को दबाने की कोशिश में भी है जो आज तक जारी है। चीन में इंटरनेट पर “थियानमेन” की खोज अवरुद्ध है। स्कूली पाठ्यपुस्तकों में इसका कोई उल्लेख नहीं है। जो माताएं अपने बच्चों की मृत्यु की सच्चाई जानना चाहती हैं, उन्हें आज भी प्रताड़ित किया जाता है। यह स्मृति का हत्याकांड है, जो शरीरों के हत्याकांड जितना ही क्रूर है।
स्टालिन का सोवियत संघ, माओ का चीन और देंग के बाद का चीन, इन सबमें एक साझा वैचारिक ढांचा दिखता है। पहला सिद्धांत यह है कि पार्टी हमेशा सही होती है। दूसरा यह कि असहमति देशद्रोह के समान है। तीसरा यह कि इतिहास को पुनर्लेखित किया जा सकता है। चौथा यह कि व्यक्ति का जीवन विचारधारा की सेवा में है, विचारधारा व्यक्ति की सेवा में नहीं।
इस ढांचे में लोकतंत्र एक खतरा है क्योंकि लोकतंत्र नागरिक को पार्टी से ऊपर रखता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक खतरा है क्योंकि वह झूठ को चुनौती देती है। स्वतंत्र न्यायपालिका एक खतरा है क्योंकि वह सत्ता को जवाबदेह बनाती है। इसीलिए इन सब संस्थाओं को कुचलना वामपंथी अधिनायकवाद की प्राथमिकता रही है।
थियानमेन के बाद के दशकों में भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने इसी नीति को जारी रखा है। उइगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार, हांगकांग में लोकतांत्रिक आंदोलन का दमन, तिब्बत में सांस्कृतिक मिटाव और सोशल क्रेडिट सिस्टम के जरिए नागरिकों की निगरानी, ये सब उसी परंपरा की निरंतरता हैं जो थियानमेन चौक पर टैंकों के साथ दुनिया के सामने आई थी।
पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 तक चली वामपंथी सरकार के दौर में राजनीतिक हिंसा एक स्थायी वास्तविकता रही। विशेष रूप से 1970 के दशक में नक्सलवादी आंदोलन और उसके दमन के दौरान हजारों लोग मारे गए। माकपा के शासनकाल में भी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा की घटनाएं दर्ज की जाती रहीं। नंदीग्राम (2007) में किसानों पर हुई गोलीबारी वामपंथी सरकार की उस मानसिकता का उदाहरण बनी, जहां “विकास” के नाम पर जनता के प्रतिरोध को दबाया जाता है। केरल में भी भाजपा और कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हमलों और राजनीतिक हत्याओं की घटनाएं दस्तावेजित हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टें इस राजनीतिक हिंसा की गवाह हैं।
नक्सलवाद भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक रहा है। माओवादी विचारधारा से प्रेरित नक्सल आंदोलन वास्तविक सामाजिक-आर्थिक शिकायतों की जमीन पर खड़ा हुआ, लेकिन इसका रास्ता हिंसा का रहा। पुलिसकर्मियों, सुरक्षाबलों, स्थानीय नेताओं और आम नागरिकों की हत्याएं, रेलवे पटरियों और पुलों को उड़ाना, और छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के जंगलों में दशकों तक चली सशस्त्र लड़ाई ने लाखों आदिवासियों के जीवन को प्रभावित किया।
भारत में वामपंथी राजनीति का इतिहास समझा जाना आवश्यक है। यहां संसदीय वामपंथ और क्रांतिकारी वामपंथ दोनों की अलग-अलग धाराएं रही हैं, लेकिन दोनों में कुछ साझा प्रवृत्तियां भी दिखती हैं। इनके बीच की कड़ी अर्बन नक्सल हैं। अर्बन नक्सल शहरी शिक्षित वर्ग में ऐसे लोग हैं जो माओवादी संगठनों को वैचारिक और लॉजिस्टिक सहयोग देते हैं। शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों में वामपंथी वैचारिक प्रभाव की चर्चा भी आवश्यक है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जाधवपुर विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों में वामपंथी विचारधारा का दबदबा रहा है।
भारत और दुनिया के कई हिस्सों में वामपंथी समूहों द्वारा लेनिन, माओ और स्टालिन को वैचारिक नायकों के रूप में प्रस्तुत करना एक गंभीर नैतिक प्रश्न खड़ा करता है। त्रिपुरा में लेनिन की मूर्तियों को लेकर हुए विवाद से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों में लगे माओ के पोस्टरों तक, यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या उन व्यक्तियों को आदर्श माना जा सकता है जिनके शासनकाल में करोड़ों लोगों की हत्याएं हुईं।
स्टालिन के आतंक में मरने वालों की संख्या 60 से 80 लाख से ऊपर मानी जाती है। माओ के शासनकाल में मरने वालों की संख्या सबसे अधिक अनुमानित है, कुछ विद्वान इसे छह से सात करोड़ तक बताते हैं। इन आंकड़ों के सामने विचारधारा की उपलब्धियों का कोई भी बचाव नैतिक रूप से खोखला लगता है।
थियानमेन के छात्र जो मांग कर रहे थे, वह कोई पश्चिमी आयात नहीं था। लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकार सार्वभौमिक मानवीय आकांक्षाएं हैं। 1948 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकृत मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, जिसमें चीन भी शामिल था, इन अधिकारों को किसी एक संस्कृति या सभ्यता की देन नहीं बल्कि मानवता की साझी विरासत घोषित करती है।
थियानमेन के 36 से अधिक वर्ष बाद भी वह “टैंक मैन” की तस्वीर प्रासंगिक है। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना का दस्तावेज नहीं है, यह एक सवाल है जो चीन की हर पीढ़ी से पूछा जाता है, क्या तुम उस अकेले व्यक्ति की तरह खड़े होने का साहस रखते हो जो टैंक के सामने नहीं हटा?
लेनिन, स्टालिन और माओ ने शोषण के विरुद्ध क्रांति का नारा दिया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद वे स्वयं सबसे बड़े शोषक बन गए। थियानमेन के उन छात्रों को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम लोकतंत्र की कीमत को समझें, उसे बनाए रखने के लिए सतर्क रहें और यह कभी न भूलें कि स्वतंत्रता एक ऐसी संपदा है जिसे हर पीढ़ी को नए सिरे से अर्जित करना पड़ता है। हमें गर्व है कि हम भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र के नागरिक हैं, जहां लोक ने वामपंथ को नकार दिया गया।

