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भारतीय चिंतन परंपरा के सजग साधक एच वी शेषाद्रि

आचार्य ललित मुनि

भारत की सभ्यता केवल राजाओं और साम्राज्यों के इतिहास से निर्मित नहीं हुई है, बल्कि उन मनीषियों और विचार साधकों से भी आकार ग्रहण करती रही है जिन्होंने समाज को दिशा देने का कार्य किया। भारतीय परंपरा में ऐसे व्यक्तित्व सदैव सम्मानित रहे हैं जो स्वयं प्रकाश में आने के बजाय समाज और राष्ट्र के भीतर चेतना का दीप जलाने का कार्य करते हैं। आधुनिक भारत में भी कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए जिन्होंने संगठन, साहित्य, चिंतन और राष्ट्रसेवा को साधना का माध्यम बनाया। एच. वी. शेषाद्रि ऐसे ही युगदृष्टा व्यक्तित्वों में एक थे।

एच. वी. शेषाद्रि केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी नहीं थे, बल्कि वे भारतीय सांस्कृतिक चेतना के गंभीर अध्येता, कुशल संगठनकर्ता और प्रभावशाली लेखक भी थे। उन्होंने अपने चिंतन के माध्यम से भारतीय समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण था कि विचार तभी सार्थक होते हैं जब वे व्यवहार और कर्म में उतरें। उन्होंने राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक अवधारणा के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे सांस्कृतिक, नैतिक और मानवीय मूल्यों से जुड़ी जीवन दृष्टि के रूप में प्रस्तुत किया।

होंगासंद्रा वेंकटरमैया शेषाद्रि का जन्म 26 मई 1926 को बंगलौर में हुआ। बचपन से ही उनका झुकाव अध्ययन और भारतीय संस्कृति की ओर था। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्रथम श्रेणी और स्वर्ण पदक के साथ प्राप्त की। उनके सामने वैज्ञानिक जीवन और उज्ज्वल करियर के अनेक अवसर थे, लेकिन उन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के स्थान पर राष्ट्रकार्य को चुना। 1943 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और 1946 में पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। यह निर्णय केवल संगठन से जुड़ने का नहीं था, बल्कि राष्ट्र जीवन को समर्पित करने का संकल्प था।

शेषाद्रि जी का मानना था कि भारत की शक्ति उसकी सांस्कृतिक चेतना में निहित है। यदि समाज अपनी परंपराओं, मूल्यों और राष्ट्रीय अस्मिता से कट जाएगा तो विकास केवल भौतिक उपलब्धि बनकर रह जाएगा। यही कारण था कि उन्होंने संगठन कार्य के साथ-साथ वैचारिक जागरण को विशेष महत्व दिया।

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संघ कार्य में उन्होंने कर्नाटक से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अनेक महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। प्रांत प्रचारक, क्षेत्र प्रचारक और बाद में 1987 में अखिल भारतीय सरकार्यवाह के रूप में उन्होंने संगठन को नई दिशा प्रदान की। वर्ष 2000 तक इस दायित्व का निर्वहन करने के बाद भी वे सक्रिय रहे और अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख के रूप में स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन करते रहे। 2005 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनके विचार और कार्य आज भी प्रेरणा देते हैं।

एच. वी. शेषाद्रि की सबसे बड़ी विशेषता उनका वैचारिक लेखन था। उन्होंने जटिल विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया। उनकी लेखनी में तथ्यात्मक दृढ़ता के साथ संवेदनात्मक गहराई भी दिखाई देती थी। वे मानते थे कि इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि भविष्य के लिए दिशा देने वाला शिक्षक है। उनकी चर्चित कृति The Tragic Story of Partition विभाजन की त्रासदी का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इस पुस्तक में उन्होंने बताया कि भारत का विभाजन केवल राजनीतिक घटना नहीं था, बल्कि वह सांस्कृतिक और सभ्यतागत विघटन भी था, जिसके प्रभाव आज तक दिखाई देते हैं। इस पुस्तक की प्रशंसा अनेक विद्वानों और चिंतकों ने की।

उनकी दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक RSS: A Vision in Action राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति और राष्ट्र निर्माण की दृष्टि को स्पष्ट करती है। इसमें उन्होंने बताया कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके चरित्रवान नागरिक होते हैं। उनका मानना था कि यदि समाज में अनुशासन, सेवा और नैतिकता का विकास हो जाए तो राष्ट्र स्वतः सशक्त बन जाता है।

कन्नड़ भाषा में लिखी उनकी पुस्तक तोरबेरालू के लिए उन्हें 1982 में कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं था, बल्कि इस बात का प्रमाण था कि वे भारतीय चिंतन को समाज की भाषा में व्यक्त करने में सफल रहे। उनकी अन्य कृतियाँ जैसे चिंतन गंगा, अम्म बगिलू तेगे और भुगीलू सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विषयों पर उनके गहन अध्ययन को दर्शाती हैं।

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शेषाद्रि जी का चिंतन सामाजिक समरसता पर आधारित था। वे मानते थे कि भारत की विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है। जाति, भाषा और क्षेत्रीय भेदों से ऊपर उठकर समाज को एक राष्ट्रीय चेतना में जोड़ना आवश्यक है। उनका यह दृष्टिकोण भारतीय दर्शन की उस मूल भावना से जुड़ा था जिसमें “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “एकात्म मानव” की अवधारणा निहित है।

वे आधुनिकता के विरोधी नहीं थे, लेकिन पश्चिमी अनुकरण के समर्थक भी नहीं थे। विज्ञान की पृष्ठभूमि होने के कारण वे तार्किक दृष्टिकोण रखते थे। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिकता पर बल दिया और योग, भारतीय जीवन पद्धति तथा मूल्य आधारित शिक्षा को आधुनिक समाज की आवश्यकता बताया। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण होना चाहिए। यही कारण है कि वे युवाओं को राष्ट्र जीवन से जोड़ने पर विशेष बल देते थे।

आपातकाल के दौर में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संकट आया, तब भी शेषाद्रि जी ने लोकतांत्रिक मूल्यों और वैचारिक स्वतंत्रता के पक्ष में दृढ़ता दिखाई। उनकी रचना भुगीलू उस संघर्ष का सशक्त दस्तावेज मानी जाती है। वे मानते थे कि राष्ट्र की शक्ति केवल शासन व्यवस्था से नहीं, बल्कि जागरूक समाज से निर्मित होती है।

उनका व्यक्तित्व अत्यंत सरल और विनम्र था। वे लोकप्रियता से दूर रहकर कार्य करने में विश्वास रखते थे। स्वयं को केंद्र में रखने के बजाय वे सदैव संगठन और समाज को आगे बढ़ाने की बात करते थे। यही कारण है कि अनेक स्वयंसेवक उन्हें आधुनिक काल का तपस्वी कार्यकर्ता मानते थे।

शेषाद्रि जी का राष्ट्रवाद किसी विरोध या घृणा पर आधारित नहीं था। वह सकारात्मक राष्ट्र निर्माण की भावना से प्रेरित था। वे कहते थे कि राष्ट्र प्रेम का अर्थ केवल नारों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान, पर्यावरण संरक्षण, महिला सम्मान और सांस्कृतिक संरक्षण के रूप में व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।

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वैश्वीकरण और सांस्कृतिक संक्रमण के इस दौर में एच. वी. शेषाद्रि का चिंतन और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। आज जब युवा पीढ़ी पहचान के संकट से गुजर रही है, तब उनका जीवन यह संदेश देता है कि आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाकर ही स्थायी विकास संभव है। उन्होंने बताया कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक नेतृत्व का कार्य नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।

उनका पूरा जीवन यह सिद्ध करता है कि विचार तभी प्रभावी होते हैं जब वे आचरण में उतरते हैं। उन्होंने राष्ट्रभक्ति को भाषणों का विषय नहीं, बल्कि जीवन साधना बनाया। यही कारण है कि वे आज भी हजारों कार्यकर्ताओं और युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि एच. वी. शेषाद्रि जैसे विचारकों के जीवन और साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए। उनका चिंतन भारतीय समाज को आत्मविश्वास, सांस्कृतिक गौरव और संगठन की शक्ति का बोध कराता है। वे हमें यह सिखाते हैं कि राष्ट्र निर्माण का कार्य केवल सरकारों से नहीं होता, बल्कि समाज के भीतर जाग्रत चरित्रवान व्यक्तियों से होता है।

भारतीय चिंतन परंपरा में एच. वी. शेषाद्रि का स्थान एक ऐसे साधक के रूप में सदैव स्मरण किया जाएगा, जिसने ज्ञान, संगठन और राष्ट्रसेवा को एक सूत्र में पिरोया। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि सच्चा विचारक वही होता है जो अपने समय की चुनौतियों को समझकर समाज को नई दिशा दे। उनकी वैचारिक ज्योति आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेगी।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।