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इतिहास को स्वर देता डॉ. संजय शर्मा का एक अद्भुत प्रयास : मल्हार के विष्णु

आचार्य ललित मुनि

छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित न्यूरोफिजिशियन डॉ. संजय शर्मा द्वारा निर्मित यह शोधपरक वीडियो केवल एक डॉक्यूमेंट्री नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की उपेक्षित ऐतिहासिक चेतना को पुनर्जीवित करने का एक गंभीर और सराहनीय प्रयास है। इस शोध की अवधि में मेरा उनके साथ मल्हार जाने का अवसर मिला तब मुझे ज्ञात हुआ कि पुरातत्व को लेकर उनकी दीवानगी असीमित है तथा जिज्ञासु प्रवृत्ति होने के कारण अनेक महीनों के गहन अध्ययन, पुरातात्विक संदर्भों, ऐतिहासिक तथ्यों और विशेषज्ञों के विचारों को समेटते हुए उन्होंने जिस संवेदनशीलता और शोध-दृष्टि से मल्हार की प्राचीन विष्णु प्रतिमा और दक्षिण कौशल की विरासत को प्रस्तुत किया है, वह वास्तव में अभिनंदनीय है।

आज जब समाज का बड़ा वर्ग इतिहास को केवल पुस्तकों या सोशल मीडिया की सतही सूचनाओं तक सीमित कर चुका है, ऐसे समय में डॉ. शर्मा ने यह याद दिलाया है कि इतिहास मिट्टी में सांस लेता है, खंडहरों में जीवित रहता है और हमारी सांस्कृतिक स्मृति का आधार होता है। मल्हार की उस उपेक्षित विष्णु प्रतिमा को केंद्र में रखकर उन्होंने केवल एक मूर्ति की कहानी नहीं कही, बल्कि उस संपूर्ण सभ्यता, व्यापारिक समृद्धि, सांस्कृतिक संवाद और आध्यात्मिक प्रवाह को सामने लाने का प्रयास किया है जिसने कभी दक्षिण कौशल को भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया था।

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विशेष रूप से यह तथ्य अत्यंत विचारणीय है कि भारत की सबसे प्राचीन अभिलेखित विष्णु प्रतिमा, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाने की पात्र है, आज भी एक बंद संग्रहालय कक्ष में उपेक्षित पड़ी है। डॉ. शर्मा ने इस पीड़ा को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि शोध, दृश्यांकन और ऐतिहासिक तर्कों के माध्यम से जीवंत कर दिया। उन्होंने यह प्रश्न पूरे समाज और शासन व्यवस्था के सामने रखा है कि आखिर हमारी धरोहरों को वह सम्मान क्यों नहीं मिलता जिसकी वे अधिकारी हैं।

इस वीडियो की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें इतिहास को नीरस तथ्यों की तरह नहीं, बल्कि एक जीवित अनुभूति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अनेक विद्वानों के विचारों, पुरातत्वविदों के विश्लेषण और मल्हार की सांस्कृतिक यात्रा को जोड़ते हुए यह कार्य दर्शक को अतीत से भावनात्मक रूप से जोड़ देता है। यह केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि गर्व, संवेदना और संरक्षण की चेतना भी उत्पन्न करता है।

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डॉ. संजय शर्मा इस कार्य के लिए विशेष बधाई और सम्मान के पात्र हैं कि उन्होंने अपने व्यस्त चिकित्सकीय जीवन के बीच इतिहास और पुरातत्व जैसे विषय पर इतना गंभीर श्रम किया। यह बताता है कि संवेदनशील मनुष्य केवल अपने पेशे तक सीमित नहीं रहता, वह समाज और सभ्यता के प्रति भी उत्तरदायी होता है। उनका यह प्रयास युवा पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा है कि अपनी मिट्टी, अपने इतिहास और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को जानना और बचाना उतना ही आवश्यक है जितना आधुनिक विकास।

ऐसे शोधपरक कार्य निरंतर होते रहने चाहिए। डॉ. शर्मा का यह प्रयास निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ की पुरातात्विक धरोहरों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। आशा है कि वे भविष्य में भी इसी गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ हमारी ऐतिहासिक विरासत पर कार्य करते रहेंगे और समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का यह महत्त्वपूर्ण अभियान निरंतर आगे बढ़ाते रहेंगे।

लेखक इण्डोलॉजिस्ट एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

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