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छत्तीसगढ़ की कृषि परंपरा और सामाजिक समरसता का उत्सव : अक्ति तिहार

आचार्य ललित मुनि

भारतीय समाज की मूल चेतना ग्राम्य जीवन में निहित है। गाँव केवल निवास का स्थान नहीं, बल्कि परम्पराओं, मान्यताओं, आचार व्यवहार और सामुदायिक अनुभवों की जीवित धरोहर हैं। लोक जीवन की संरचना प्रकृति, श्रम और सामूहिक सहयोग पर आधारित होती है, इसलिए यहाँ के पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामाजिक ऊर्जा के स्रोत होते हैं। पीढ़ियों से संचित अनुभव, लोक विश्वास और प्रकृति के साथ सामंजस्य ने ग्रामीण संस्कृति को विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों की लोक परंपराएं उनकी ऐतिहासिक यात्रा और सामाजिक संरचना का दर्पण हैं।

छत्तीसगढ़ की धरती भी इसी समृद्ध परंपरा की प्रतिनिधि है, जहाँ तीज त्यौहार जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करते हैं। यहाँ पर्वों के माध्यम से समाज में सहयोग, सहानुभूति, प्रकृति प्रेम और श्रम के सम्मान की भावना सुदृढ़ होती है। ग्रामीण परिवेश में मनाए जाने वाले उत्सव सामूहिक सहभागिता के कारण विशेष महत्व रखते हैं, क्योंकि वे व्यक्ति को समाज से जोड़ते हैं और सामाजिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ का लोक जीवन आज भी अपनी परंपराओं के माध्यम से सांस्कृतिक निरंतरता बनाए हुए है और अक्ति का पर्व इसी निरंतरता का सशक्त उदाहरण है।

अक्षय तृतीया का पर्व पूरे भारत में श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है, परन्तु छत्तीसगढ़ में इसका रूप अधिक लोकाभिमुख दिखाई देता है। यहाँ यह पर्व अक्ति के नाम से प्रसिद्ध है और इसका स्वरूप केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह पर्व कृषि, प्रकृति और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। लोक जीवन में अक्ति को नए आरंभ, समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। यह विश्वास किया जाता है कि इस दिन किया गया कार्य शुभ फल प्रदान करता है और निरंतर वृद्धि का कारण बनता है।

ग्रामीण समाज में अक्ति को उत्साह, उल्लास और आशा के साथ मनाया जाता है, क्योंकि यह आगामी कृषि वर्ष के लिए मंगलकामना का अवसर होता है। यह पर्व बताता है कि लोक संस्कृति में समय का निर्धारण केवल पंचांग से नहीं बल्कि जीवन की आवश्यकताओं और प्रकृति के चक्र से भी होता है। अक्ति के माध्यम से लोक समाज अपनी परंपराओं को पुनः स्मरण करता है और सामूहिक रूप से भविष्य के लिए शुभकामनाएँ करता है।

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अक्ति का संबंध कृषक जीवन से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है। यह वह समय होता है जब किसान नए कृषि चक्र की तैयारी आरंभ करते हैं। बैसाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह पर्व कृषि कार्यों के प्रारंभ का संकेत माना जाता है। किसान इस दिन भूमि, बीज और जल के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। कृषि भारतीय ग्रामीण जीवन का आधार है, इसलिए उससे संबंधित प्रत्येक परंपरा का विशेष महत्व होता है।

अक्ति को कृषक जीवन का नव आरंभ माना जाता है, क्योंकि इसी दिन से खेतों की तैयारी, बीज चयन और वर्षा के प्रति आशा का क्रम प्रारंभ होता है। यह पर्व प्रकृति और मानव के संबंध को भी स्पष्ट करता है, क्योंकि किसान अपनी जीविका के लिए धरती और जल पर निर्भर रहता है। इस दिन की जाने वाली परंपराएं किसान के मन में उत्साह और आत्मविश्वास का संचार करती हैं, जिससे वह पूरे वर्ष परिश्रम करने के लिए प्रेरित होता है।

अक्ति के दिन जल अर्पण की परंपरा विशेष महत्व रखती है। प्रातःकाल स्नान के बाद लोग मिट्टी के पात्रों में जल भरकर देव स्थलों में अर्पित करते हैं। मिट्टी के पात्रों का प्रयोग प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है, क्योंकि यह पर्यावरण के अनुकूल होते हैं। जल में नीम की पत्तियां डालने की परंपरा स्वास्थ्य और शुद्धता से जुड़ी है। नीम को औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है और यह वातावरण को शुद्ध करने में सहायक होता है। लोग अपने ग्राम देवताओं को जल अर्पित कर परिवार और समाज की सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

इस अवसर पर पूर्वजों की स्मृति भी की जाती है और उनके सम्मान में जल अर्पित किया जाता है। यह परंपरा बताती है कि लोक जीवन में पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव महत्वपूर्ण स्थान रखता है। सार्वजनिक स्थलों पर प्याऊ की व्यवस्था कर राहगीरों और जरूरतमंदों को शीतल जल उपलब्ध कराया जाता है, जो परोपकार और मानवता की भावना को दर्शाता है। पक्षियों के लिए जल और अन्न की व्यवस्था भी की जाती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लोक संस्कृति में प्रकृति के सभी जीवों के प्रति संवेदनशीलता विद्यमान है।

अक्ति के अवसर पर छाहुर बंधान की परंपरा निभाई जाती है, जो कृषि कार्य के प्रतीकात्मक आरंभ का संकेत देती है। ग्राम समुदाय के लोग एकत्र होकर बीजों को भूमि पर अर्पित करते हैं और हल के फाल से धरती को स्पर्श कराया जाता है। इसके बाद जल छिड़ककर धरती माता से समृद्धि की कामना की जाती है। यह प्रक्रिया कृषि के प्रत्येक चरण का प्रतीकात्मक रूप है। इस परंपरा के माध्यम से किसान अपनी भूमि के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है और भरपूर उत्पादन की आशा करता है। यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि कृषि विज्ञान की समझ को भी दर्शाती है, क्योंकि इसमें बीज, जल और भूमि के महत्व को स्वीकार किया गया है। सामूहिक रूप से इस प्रक्रिया में भाग लेने से किसानों के बीच सहयोग और एकता की भावना मजबूत होती है।

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ग्रामीण समाज में श्रम संबंधों की परंपरा भी अक्ति से जुड़ी हुई है। जिन किसानों के पास अधिक भूमि होती है, वे कृषि कार्य में सहयोग के लिए श्रमिक रखते हैं। अक्ति के दिन इन श्रमिकों को सम्मानपूर्वक उपहार देकर कार्य संबंधों को पुनः स्थापित किया जाता है। यह परंपरा केवल आर्थिक लेन देन का माध्यम नहीं बल्कि विश्वास और सामाजिक संबंधों का प्रतीक है। श्रमिक और किसान के बीच पारस्परिक सहयोग का संबंध विकसित होता है, जो पूरे वर्ष कृषि कार्य को सुचारु रूप से चलाने में सहायक होता है। यह व्यवस्था बताती है कि ग्रामीण समाज में संबंध केवल स्वार्थ पर आधारित नहीं होते, बल्कि उनमें मानवीय संवेदना और सहयोग की भावना भी निहित होती है।

अक्ति के दिन पुतरी पुतरा विवाह की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। बच्चों द्वारा मिट्टी से बने गुड्डे गुड़ियों का विवाह किया जाता है, जो लोक संस्कृति का प्रतीकात्मक रूप है। इस आयोजन में विवाह के सभी संस्कार निभाए जाते हैं, जिससे बच्चों को सामाजिक परंपराओं का ज्ञान प्राप्त होता है। कुम्हार द्वारा बनाए गए खिलौने, स्थानीय वस्त्र और पारंपरिक सजावट इस आयोजन को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाते हैं। विवाह गीतों और वाद्य ध्वनियों से वातावरण आनंदमय हो उठता है। यह आयोजन केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि सांस्कृतिक शिक्षा का माध्यम भी है, जिससे नई पीढ़ी अपनी परंपराओं से परिचित होती है।

इस आयोजन का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक समरसता है। गांव के लोग मिलकर विवाह की व्यवस्था करते हैं और सभी वर्गों के लोग इसमें सहभागी बनते हैं। सामूहिक सहयोग से भोजन और अन्य व्यवस्थाएं की जाती हैं। इससे समाज में समानता और भाईचारे की भावना को बल मिलता है। इस प्रकार यह परंपरा सामाजिक एकता को मजबूत करती है और सामुदायिक जीवन के महत्व को रेखांकित करती है।

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अक्ति से जुड़ी अनेक लोक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। एक प्राचीन कथा के अनुसार पुतरी पुतरा विवाह से संतान प्राप्ति की कामना पूर्ण होती है। लोक विश्वास पीढ़ियों से समाज को प्रभावित करते रहे हैं और सामाजिक व्यवहार को दिशा देते हैं। ऐसी मान्यताएं लोगों को आशा और विश्वास प्रदान करती हैं, जिससे वे जीवन की कठिनाइयों का सामना करने में सक्षम होते हैं।

अक्ति को विवाह के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं मानी जाती और अनेक स्थानों पर विवाह संपन्न होते हैं। यह विश्वास इस पर्व की धार्मिक महत्ता को दर्शाता है। लोक जीवन में शुभ मुहूर्त का निर्धारण केवल ज्योतिषीय गणना से नहीं बल्कि परंपरागत अनुभव से भी किया जाता है।

ग्रामीण समाज में मौसम संबंधी अनुभवों का विशेष महत्व होता है। अक्ति के दिन वर्षा के संकेत जानने के लिए विशेष विधि अपनाई जाती है। मिट्टी के ढेलों और जल पात्र के माध्यम से वर्षा की दिशा का अनुमान लगाया जाता है। यह लोक ज्ञान पीढ़ियों के अनुभव पर आधारित है। कृषि आधारित जीवन में वर्षा का महत्व अत्यधिक होता है, इसलिए मौसम के संकेत जानने के लिए लोक पद्धतियों का उपयोग किया जाता है।

इस प्रकार अक्ति लोक जीवन की संवेदना, आस्था और श्रम का समन्वित रूप है। यह पर्व समाज को एकता, सहयोग और आशा का संदेश देता है। इसमें प्रकृति के प्रति सम्मान, श्रम का महत्व और सामाजिक समरसता का भाव स्पष्ट दिखाई देता है। अक्ति की परंपराएं बताती हैं कि लोक संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा भी है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ का लोक जीवन इस पर्व को आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाता है और इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण अंग मानता है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के जानकार हैं।