हृदय की गहराइयों से निकली आवाज़ “शब्द शाश्वत हैं” रविवारीय पुस्तक -चर्चा

(ब्लॉगर एवं पत्रकार )
मनुष्य का शरीर एक न एक दिन नष्ट हो जाता है, लेकिन उसके द्वारा बोले गए या लिखे गए शब्द कभी नष्ट नहीं होते। यानी शरीर नश्वर है और शब्द शाश्वत। कई मौखिक या लिखित शब्द हमारी यादों में समा जाते हैं या फिर पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों में छपकर लम्बे समय तक हमारे बीच बने रहते हैं, जैसे रामायण और महाभारत जैसे कई कालजयी महाकाव्य। शब्दों का महत्व और उनकी महिमा अपरम्पार है। शब्द मनुष्य के हृदय में सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों तरह के भाव पैदा कर सकते हैं।
शब्दों के बिना साहित्य सृजन नहीं हो सकता। कविता हो या कहानी, लेख हो या उपन्यास, रचनाकार की कल्पना और उसकी अभिव्यक्ति शब्दों से ही आकार लेती है। साहित्यिक रचनाओं के शब्द मनुष्य को बताते हैं कि क्या बुरा है और क्या अच्छा? शब्दों को ब्रह्म भी कहा गया है। शब्दों की इसी महिमा के अनुरूप इंदौर (मध्यप्रदेश) के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अखिलेश शर्मा की तुकांत और अतुकांत कविताओं का संग्रह ‘शब्द शाश्वत हैं’ शीर्षक से वर्ष 2025 में सामने आया है।
विगत पचास वर्षों से साहित्य साधना में लगे डॉ. शर्मा का यह पहला काव्य-संग्रह है, जिसकी पहली कविता ‘शब्द और पंचतत्व’ में कवि ने शब्दों की महिमा को अपने शब्दों में कुछ इस तरह रेखांकित किया है –
शब्द जीवन हैं!
शब्द तैरते हैं हवा में
ऑक्सीजन बनकर,
शब्द प्राण वायु हैं!
शब्द बहते हैं नदी में, सागर में
अणु बनकर, परमाणु बनकर,
निर्मल जल के साथ।
शब्द ब्रह्म हैं, शब्द विचरण करते हैं,
नभ में, अंतरिक्ष में लयबद्ध।
शब्द ऊर्जा हैं!
शब्द धधकते हैं
सभी प्राणियों में
अग्नि बनकर।
शब्द गतिमान हैं!
शब्द विचरते हैं
पर्वत पर, धरा पर।
पाँचों तत्व समाए हैं शब्दों में,
जिनका अस्तित्व महसूस होता है
मेरी शिराओं में, तंतुओं में,
मेरी धड़कन में।
शब्द जीवन हैं।
कोई भी सच्चा कवि या लेखक अपने समय की सच्चाइयों से मुँह मोड़कर साहित्य सृजन नहीं कर सकता। उसके लेखन की प्रतिबद्धता अपने समाज के साथ होती है। वह अपनी रचनाओं में मनुष्य के दुःख-दर्द को अभिव्यक्ति देने के साथ ही समाज को सही दिशा में चलने की नसीहत भी देता है। डॉ. अखिलेश शर्मा की कविताओं में भी इसे महसूस किया जा सकता है। यह सामाजिक सरोकार की कविताओं का संग्रह है।
एक वरिष्ठ साहित्यकार ने कभी कहा था कि रचनाएँ दो तरह से लिखी जाती हैं – दिमाग से और दिल से। उनका कहना था कि दिमाग से लिखी जाने वाली रचनाओं में भावनात्मक स्पर्श का अभाव होता है, जबकि दिल से लिखी जाने वाली रचनाएँ सुनने या पढ़ने वाले के दिल में उतर जाती हैं। काव्य-संग्रह ‘शब्द शाश्वत हैं’ की रचनाएँ भी दिल से लिखी गई हैं। संग्रह की हर कविता में कवि के हृदय की गहराइयों से निकली आवाज है, जिसमें देश और दुनिया के लिए, मानव समाज के लिए संवेदनाओं से परिपूर्ण शाश्वत संदेश है।
संग्रह में प्रकाशित कविता ‘मौन संभाषण’ में उन्होंने मनुष्य के हृदय और मस्तिष्क के बीच काल्पनिक संवाद के जरिए सामाजिक विसंगतियों को जिस अंदाज में उजागर किया है, वह वाकई मर्मस्पर्शी है –
हृदय कहता है –
आह! आज फिर एक चोट लगी
रोटी के अभाव में।
रोती हुई आत्माओं की आवाज
सहन न कर सका मैं।
चुप करने चला था उस ओर,
रास्ते में टकरा गया
एक पूँजीपति के कठोर हृदय से।
इस पर कवि के हृदय को सम्बोधित करते हुए मस्तिष्क कहता है –
पहले भी समझाया है तुम्हें अनेक बार,
क्यों जाते हो उन अँधेरी गलियों में,
जहाँ डरती है रोशनी भी जाने में?
क्यों जाते हो उन गंदी बस्तियों में,
जहाँ सड़ांध है ज़िंदा लाशों की?
जाओ वहाँ, जहाँ रंग-बिरंगे कृत्रिम सितारे
बिखेर रहे हैं सतरंगी किरणें।
जाओ उन भव्य इमारतों में,
जहाँ कीमती फर्श पर
गरीबों के कफन बेचकर खरीदे गए
मखमली कालीन बिछे हैं।
भाई हृदय! कुछ संकीर्ण बनो,
विशाल हृदय को इस रंगीन दुनिया
के लोग शरीर के लिए खतरनाक कहते हैं।
हृदय का जवाब होता है –
मित्र मस्तिष्क!
मैं अपने ही रक्त से विद्रोह नहीं कर सकता।
मैं विशाल था, विशाल हूँ और विशाल ही रहूँगा।
वैसे तो संग्रह की सभी कविताएँ पठनीय हैं, लेकिन युद्ध के इस निर्मम दौर में लिखी गई उनकी कविता ‘युद्ध! युद्ध!’ मनुष्य की सोई हुई चेतना को झकझोरती है। दुनिया में आज कहीं न कहीं युद्ध का माहौल है, जिसमें पीड़ित मानवता कराह रही है। किसी भी संवेदनशील मनुष्य की तरह एक संवेदनशील कवि के हृदय को भी यह हिंसक माहौल चोट पहुँचाता है। इस अराजक और हिंसक वातावरण से व्यथित होकर कवि डॉ. अखिलेश शर्मा अपने इस संग्रह की कविता ‘युद्ध! युद्ध!’ में लिखते हैं –
मानवता का करे संहार
युद्ध! युद्ध!
रुदन, क्रंदन,
चीख, पुकारें,
बारूदी सांसें, सिसकारें,
निर्दोषों पर अत्याचार,
युद्ध! युद्ध!
गाँव, शहर पूरे बर्बाद,
कैसे फिर होंगे आबाद?
ज़हर उगलते हैं हथियार,
युद्ध! युद्ध!
स्वार्थ, ज़िद, ताकत, सीमाएँ,
झूठ, फरेब से
दुनिया को भरमाएँ,
कौन हैं इसके ज़िम्मेदार?
युद्ध! युद्ध!
बहुत हो गया,
बंद करो अब तांडव मौत का,
खत्म करो सब।
विश्व हो रहा है बीमार,
युद्ध! युद्ध!
संग्रह की एक अन्य कविता ‘ज़िंदगी पूछ रही’ में भी कवि ने युद्ध के घातक चक्रव्यूह में फँसी मानवता की पीड़ा को अपने शब्द दिए हैं –
ज़िंदगी पूछ रही मौत से सवाल।
मानवता टिकी हुई रेत के ढेर पर,
मानव इतराता बारूद को देखकर।
शस्त्रों के ज़खीरे मचा रहे बवाल,
ज़िंदगी पूछ रही मौत से सवाल।
भूखे जिस्मों पर मुद्रा के पहरे,
मृत्यु को देखकर मुस्कुराते चेहरे।
भरी हुई तिजोरियाँ, कैसा अकाल?
ज़िंदगी पूछ रही मौत से सवाल।
संग्रह में प्रकाशित ‘बारूद का धुआँ’ शीर्षक अपनी एक छोटी-सी कविता में भी कवि ने युद्ध से उपजती विडंबना पर लिखा है –
ईमान बिक रहा है।
इंसान गिर रहा है।
आँखें मूंदी हुई हैं,
होंठ सिल रहा है।
बारूद का धुआँ फिर
मृत्यु से मिल रहा है।
मिट्टी के दीपक को प्रतीक बनाकर मेहनतकश कुम्हारों के प्रति कवि की संवेदना इन शब्दों में प्रकट होती है –
माटी के ये दीप सलौने,
करें उजाला कोने-कोने।
मेहनत तो ज्यादा है लेकिन,
दाम मिल रहे औने-पौने।
दहशत में है मूक अँधेरा,
देख दीप लगता है रोने।
प्रकाश पर्व दीपावली के संदर्भ में लिखी गई इस रचना की अंतिम चार पंक्तियों में आशावादी स्वर भी गूँजते हैं –
प्रकाश-पुंज की शक्ति समेटे,
किंतु दिखने में लगते बौने,
दीपशिखा और तेल साथ में
चल पड़े हैं अँधियारा धोने।
संग्रह की कविताओं में कवि ने अपने शाश्वत शब्दों के माध्यम से देश और समाज की वर्तमान दशा का यथार्थ चित्रण किया है। उनकी एक रचना में उम्मीदों के साथ सही दिशा में चलने का आह्वान भी है –
संभावनाओं को तलाशें, हर्ज क्या है?
गिर रहे, उनको उठाएँ, हर्ज क्या है?
हैं विषैली सब तरफ बहती हवाएँ,
पेड़ चंदन के लगाएँ, हर्ज क्या है?
कर रहे जो चिथड़े इंसानियत के,
उन पिशाचों को भगाएँ, हर्ज क्या है?
डॉ. शर्मा के संग्रह की कविताओं के कथ्य और शिल्प के साथ उनके शीर्षक भी पाठकों के दिलों को छू जाते हैं, जैसे – थके हुए शख्स, बहा दो प्रेम की नदियाँ, किस तरह की बेबसी है, ज़िंदगी पूछ रही, सत्य क्यों लाचार, वह नदी ही तो है आदि।
अपने प्रथम संग्रह में ‘आत्मकथन’ के अंतर्गत कवि ने लिखा है – मैंने अपनी कविताओं में जिस जीवन को अभिव्यक्त करने की कोशिश की है, वह हमारे आसपास के प्रत्येक व्यक्ति का जीवन है – उनकी हँसी, उनके आँसू, उनके संघर्ष और उनकी उम्मीदें। यह संग्रह उन सभी अदृश्य नायकों को समर्पित है, जिन्होंने मेरी लेखनी को ऊर्जा और ताकत प्रदान की।
डॉ. अखिलेश शर्मा ‘हाइकू’ भी लिखते हैं। क्षणिकाओं की तरह छोटी-छोटी आधुनिक कविता लिखने की यह जापानी विधा है। डॉ. शर्मा के कविता संग्रह ‘शब्द शाश्वत हैं’ में श्रीहनुमान चालीसा पर आधारित उनके 42 हाइकू भी शामिल हैं। इन्हें मिलाकर 140 पेज के इस संग्रह की कविताएँ 143 तक पहुँच जाती हैं। आवरण चित्र संदीप राशिनकर द्वारा बनाए गए हैं। दिल्ली और इंदौर के संस्मय प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है। मूल्य है 375 रुपये।
उल्लेखनीय है कि एम.बी.बी.एस. और डी.सी.एच. तक शिक्षा प्राप्त डॉ. अखिलेश शर्मा शिशु रोग विशेषज्ञ हैं। वे मध्यप्रदेश सरकार के चिकित्सा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। कोई साहित्यकार अगर चिकित्सक भी हो, तो वह अपनी रचनाओं में समाज की नब्ज पर भी पकड़ बनाए रखता है। डॉ. अखिलेश शर्मा की रचनाओं में भी हम इसे महसूस कर सकते हैं। इंदौर (मध्यप्रदेश) में 9 अप्रैल 1956 को उनका जन्म हुआ था, जो उनका गृहनगर है। कविताओं के साथ-साथ वे लघु कथाएँ भी लिखते हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।
डॉ. अखिलेश शर्मा के इस प्रथम काव्य-संग्रह की भूमिका लिखी है इंदौर की वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. पद्मा सिंह ने। संग्रह में दैनिक ‘नवभारत’ मध्यप्रदेश के समूह सम्पादक डॉ. क्रांति चतुर्वेदी, लखनऊ (उत्तरप्रदेश) के वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. विश्वम्भर शुक्ल और मातृ भाषा उन्नयन संस्थान, भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ के महत्वपूर्ण और मूल्यवान विचार भी प्रकाशित हुए हैं। प्रथम कविता-संग्रह के प्रकाशन पर डॉ. अखिलेश शर्मा को हार्दिक बधाई और बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे अपना काव्य-सृजन जारी रखेंगे और आगामी वर्षों में उनके और भी कई संग्रह हमें पढ़ने को मिलेंगे।
आलेख – स्वराज्य करुण
