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छत्तीसगढ़ की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत : परंपराएँ, लोककला और लोकजीवन

आचार्य ललित मुनि

छत्तीसगढ़ की सीमाएं जंगलों, नदियों और पहाड़ों से घिरी हुई है जहां हर गांव, हर बस्ती और हर त्योहार अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का जीवंत रूप धारण करता है। अमूर्त सांस्कृतिक विरासत वह है, जो छूने में नहीं आती पर दिल को छू जाती है। यह परंपराओं में बसती है, लोककला में सांस लेती है और लोकजीवन को अर्थ देती है। यूनेस्को की परिभाषा के अनुसार यह मौखिक परंपराएं, कलाएं, सामाजिक रीतिरिवाज, त्योहार और ज्ञान की वह धरोहर है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती है। छत्तीसगढ़ के जनजीवन में यह विरासत जीवन शैली के रुप में अभिन्नता से जुड़ी हुई है। यहां की संस्कृति में बसी यह विरासत केवल सांस्कृतिक नहीं बल्कि भावनात्मक भी है। जब कोई गांव की दादी, नाती को कहानी सुनाती है या बस्तर के जंगलों में ढोल, मांदर की थाप गूंजती है तो लगता है कि धरती खुद बोल रही है। यही हमारी अमूर्त विरासत है।

परंपराएं छत्तीसगढ़ की अमूर्त विरासत की रीढ़ हैं। सबसे प्रमुख है बस्तर दशहरा जो दुनिया के सबसे लंबे त्योहारों में से एक है। यह पचहत्तर दिनों तक चलता है और यह रावण दहन से नहीं बल्कि मां दंतेश्वरी देवी और स्थानीय देवताओं की पूजा से जुड़ा है। काकतीय वंश के समय से छह सौ वर्ष पुरानी यह परंपरा प्रजा और राजपरिवार को एक सूत्र में बांधती है। पाट यात्रा से शुरू होकर कांछनगादी पूजा, रथ परिचालन,  मुरिया दरबार तक यह उत्सव जातीय एवं जनजातीय एकता का प्रतीक है।

बस्तर के गांवों से हजारों वनवासी पैदल चलकर जगदलपुर पहुंचते हैं। वे अपने लोक देवताओं को साथ लेकर आते हैं। कोई ढोल बजाता है, कोई गीत गाता है और कोई नाचता है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक विरासत का मेला है, जहां पुरानी कहानियां दोहराई जाती हैं और नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ती है। इसी तरह नवाखनी त्योहार नई फसल की खुशी मनाता है। किसान खेतों में जाकर देवी को अर्पित करते हैं और सामूहिक भोजन करते हैं। तीजा-पोला और हरेली अमावस्या जैसे त्योहार महिलाओं और बच्चों में उत्साह बनाये रखते हैं। ये परंपराएं केवल उत्सव नहीं बल्कि जीवन के चक्र को याद दिलाती हैं। जब सूखा पड़ता है या फसल अच्छी होती है तब भी लोग इन्हीं रीतियों से आशा बांधते हैं।

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लोककला छत्तीसगढ़ की अमूर्त विरासत का सबसे अहम रूप है। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण पंडवानी है। यह महाभारत की कथाओं का गायन नाट्य और संगीत का अनोखा मिश्रण है जिसमें भीम को नायक बनाया जाता है। वेदमती शैली में कलाकार भूमि पर बैठकर सरलता से कहानी सुनाता है, जबकि कपालिक शैली में वह नाट्य करता है नाचता है और दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। एकतारा या तंबूरा हाथ में लेकर कलाकार प्रसंग गाता है और कभी तंबूरा को भीम की गदा बना लेता है। पंडवानी की सबसे प्रसिद्ध कलाकार तीजन बाई हैं,  सन् 1956 में दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई ने मात्र तेरह वर्ष की उम्र में पंडवानी गाना शुरू किया।  उन्होंने महाभारत की कहानियों को छत्तीसगढ़ी भाषा में जीवंत किया। आज वे पद्म विभूषण प्राप्त कर चुकी हैं और दुनिया के मंचों पर छत्तीसगढ़ की संस्कृति का परिचय दे चुकी हैं। उनकी कहानी सुनकर युवा कलाकार प्रेरित होते हैं। रितु वर्मा, शांति बाई चेलक और उषा बारले जैसी कलाकार आज इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

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पंडवानी के अलावा लोक नृत्य छत्तीसगढ़ की अमूर्त विरासत को सजाते हैं। पंथी नृत्य सतनामी समुदाय का भक्ति नृत्य है जो गुरु घासीदास जयंती पर किया जाता है। सफेद धोती और कमरबंद पहने नर्तक तेज ताल पर नाचते हैं। यह नृत्य आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा होता है और समुदाय को जोड़ता है। राउत नाचा यादव समुदाय का नृत्य है जो कृष्ण की रासलीला को याद दिलाता है। देव उठनी एकादशी पर यह नृत्य किया जाता है। दीपावली के समय सुवा नृत्य किया जाता है।इसमें स्त्रियां एवं बालिकाएं गोल घेरा बनाकर नाचती हैं। कर्मा नृत्य फसल बोने और कटने के मौसम में किया जाता है। सैला नृत्य पुरुषों द्वारा तलवार और ढाल लेकर किया जाता है जो वीरता का प्रतीक है। गौर माड़िया नृत्य बस्तर के माड़िया जनजाति का है।  इन नृत्यों में ढोल, मांदर और मोहरी जैसे वाद्य यंत्र साथ देते हैं। हर नृत्य की अपनी कहानी है।

छत्तीसगढ़ की अमूर्त परम्परा में नाटयकला का उल्लेख तो अवश्य होना चाहिए, मध्य छत्तीसगढ़ में नाचा बहुत ही प्रसिद्ध है, इस नाटक में सामाजिक संदेश देने वाले विभिन्न तरह के विषयों का मंचन होता है, इसके साथ ही रामलीलाओं का आयोजन भी कुंवार नवरात्रि के समय गांव गांव में किया जाता है। बस्तर में भतरा नाट प्रचलित हैं, इसमें रामायण, महाभारत से लेकर अन्य विभिन्न पौराणिक कथानकों का मंचन होता है।

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लोकगीत छत्तीसगढ़ के लोकजीवन का अंग हैं। सोहर गीत जन्म पर गाए जाते हैं, जबकि विवाह और फसल कटाई के गीत भी हैं। ये गीत इतिहास सिखाते हैं, परम्पराओं से परिचित कराते हैं और स्थानीय भाषा को जीवित रखते हैं।लोकजीवन में यह विरासत रोजमर्रा की जिंदगी में घुली हुई है। गांवों में त्योहारों पर लोकगीत गूंजते हैं। खेतों में काम करते हुए महिलाएं गाती हैं। विवाह में गीतों से रिश्ते बंधते हैं। जब कोई बच्चा पैदा होता है तो परिवार में सोहर गाया जाता है। यह जीवन शैली प्रकृति से जुड़ी हुई है। जंगल देवता और नदी देवी यहां के गीतों में जीवित हैं।

इन परम्पराओं को सुरक्षित एवं संरक्षित रखने आज चुनौतियां भी हैं। आधुनिकीकरण, गांव से नगर प्रवास और टेलीविजन और मोबाईल ने युवाओं को परंपराओं से दूर किया है। लेकिन फ़िर कुछ लोग हैं, जो इस विरासत को संभाले हुए हैं और अपना तन-मन-धन लगाकर परम्पराओं को सहेज रहे हैं। अमूर्त विरासत हम छत्तीसगढ़ के लोगों की आत्मा है। यह विरासत हमें सिखाती है कि सच्ची समृद्धि धन में नहीं बल्कि सांस्कृतिक जड़ों में है। छत्तीसगढ़ की लोक सांस्कृतिक धरोहर पूरे भारत को प्रेरित करती है कि हम अपनी अमूर्त विरासत को बचाएं और आगे बढ़ाएं।

आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।