futuredपॉजिटिव स्टोरी

भारत में आधुनिक इंजीनियरिंग की नींव रखने वाले विश्वेश्वरैया

आचार्य ललित मुनि

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का नाम भारत के इतिहास में उस व्यक्तित्व के रूप में लिया जाता है जिसने विज्ञान, तकनीक और राष्ट्र निर्माण के बीच गहरा संबंध स्थापित किया। वे केवल एक प्रतिभाशाली अभियंता नहीं थे बल्कि एक दूरदर्शी विचारक, अनुशासित कर्मयोगी और योजनाबद्ध विकास के समर्थक भी थे। जिस समय भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था और संसाधनों का विकास सीमित था, उस समय विश्वेश्वरैया ने अपने ज्ञान और परिश्रम के माध्यम से यह सिद्ध किया कि यदि इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक दृष्टि हो तो सीमित साधनों में भी बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। उनका जीवन यह बताता है कि तकनीकी ज्ञान केवल रोजगार का साधन नहीं बल्कि समाज परिवर्तन का माध्यम भी हो सकता है।

उनका जन्म 15 सितंबर 1861 को वर्तमान कर्नाटक के चिक्कबल्लापुर जिले के मुद्देनहल्ली गांव में हुआ। उनके पिता मोक्षगुंडम श्रीनिवास शास्त्री संस्कृत के विद्वान और आयुर्वेदाचार्य थे तथा माता वेंकटलक्ष्मी धार्मिक प्रवृत्ति की दृढ़ निश्चयी महिला थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति साधारण थी, किंतु शिक्षा को महत्व दिया जाता था। बाल्यावस्था में ही पिता का निधन हो गया, जिससे परिवार पर आर्थिक संकट आ गया। ऐसी परिस्थितियों में सामान्यतः बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो जाती है, किंतु विश्वेश्वरैया ने कठिनाइयों को अपनी प्रगति में बाधा नहीं बनने दिया। उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई जारी रखी। यह तथ्य उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता को दर्शाता है कि वे आत्मनिर्भरता में विश्वास करते थे।

प्रारंभिक शिक्षा चिक्कबल्लापुर में प्राप्त करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए बेंगलुरु आए और सेंट्रल कॉलेज से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने पुणे के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की। उस समय इंजीनियरिंग शिक्षा अत्यंत सीमित थी और भारतीयों के लिए अवसर कम थे, फिर भी उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने बंबई प्रेसीडेंसी के लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता के रूप में कार्य प्रारंभ किया। प्रारंभिक नियुक्तियों के दौरान उन्होंने नासिक, पुणे और खानदेश जैसे क्षेत्रों में जल प्रबंधन और सिंचाई से संबंधित कार्य किए। यही वह समय था जब उनकी प्रतिभा पहचानी जाने लगी।

यह भी पढ़ें  छत्तीसगढ़ में जनगणना की तैयारी तेज, दो चरणों में होगा सर्वे; पहली बार पूरी प्रक्रिया होगी डिजिटल

विश्वेश्वरैया की कार्यशैली का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे समस्याओं को केवल तकनीकी दृष्टि से नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी देखते थे। जल प्रबंधन उनके कार्य का प्रमुख क्षेत्र था। उन्होंने देखा कि भारत के अनेक क्षेत्रों में वर्षा का वितरण असमान है, जिसके कारण कभी सूखा तो कभी बाढ़ की समस्या उत्पन्न होती है। उन्होंने सिंचाई व्यवस्था को वैज्ञानिक रूप देने का प्रयास किया। उनके द्वारा विकसित ब्लॉक सिस्टम ऑफ इरिगेशन जल वितरण का एक व्यवस्थित मॉडल था, जिससे पानी का अधिकतम उपयोग संभव हो सका।

उनकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक स्वचालित स्लूइस गेट प्रणाली का विकास था। यह प्रणाली बांधों में जल स्तर को नियंत्रित करने के लिए उपयोगी थी। 1903 में पुणे के निकट खडकवासला बांध में इसका प्रयोग किया गया। इस तकनीक की विशेषता यह थी कि इससे जल संग्रहण की क्षमता बढ़ जाती थी और बांध की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती थी। बाद में इसी तकनीक का उपयोग ग्वालियर के तिगरा बांध तथा कावेरी नदी पर बने कृष्णराज सागर बांध में किया गया। यह नवाचार भारतीय इंजीनियरिंग इतिहास में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है।

1908 में हैदराबाद में आई भीषण बाढ़ ने व्यापक विनाश किया। मुसी नदी के जल स्तर में अचानक वृद्धि होने से शहर को भारी क्षति हुई। निजाम सरकार ने विश्वेश्वरैया को इस समस्या का समाधान खोजने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने बाढ़ नियंत्रण की वैज्ञानिक योजना तैयार की जिसमें जलाशयों का निर्माण तथा जल प्रवाह नियंत्रण की व्यवस्था शामिल थी। उनके सुझावों के आधार पर उस्मान सागर और हिमायत सागर जैसे जलाशयों का निर्माण हुआ, जिससे हैदराबाद को बाढ़ से सुरक्षा मिली। यह उदाहरण दर्शाता है कि उनकी इंजीनियरिंग दृष्टि दीर्घकालिक समाधान पर आधारित थी।

1909 में उन्हें मैसूर राज्य का मुख्य अभियंता नियुक्त किया गया। बाद में 1912 से 1918 तक वे मैसूर राज्य के दीवान रहे। दीवान के रूप में उन्होंने प्रशासन, उद्योग, शिक्षा और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार किए। महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ के सहयोग से उन्होंने राज्य को आधुनिक बनाने का कार्य प्रारंभ किया। उनके नेतृत्व में मैसूर साबुन कारखाना, भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्क्स तथा मैसूर सैंडल ऑयल फैक्ट्री की स्थापना हुई। इन उद्योगों ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया और रोजगार के अवसर बढ़ाए।

यह भी पढ़ें  डॉ. भीमराव आंबेडकर जयंती पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने किया नमन, सामाजिक न्याय के संकल्प को दोहराया

कृष्णराज सागर बांध उनकी सबसे प्रसिद्ध परियोजना है। कावेरी नदी पर निर्मित यह बांध उस समय एशिया की महत्वपूर्ण जल परियोजनाओं में से एक था। इस परियोजना ने सिंचाई, पेयजल और विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किया। मांड्या क्षेत्र की कृषि को स्थिरता मिली और बेंगलुरु शहर को जल आपूर्ति सुनिश्चित हुई। यह परियोजना इस बात का उदाहरण है कि वैज्ञानिक योजना और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के मेल से समाज की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सकता है।

विश्वेश्वरैया शिक्षा के महत्व को भली भांति समझते थे। उनका विश्वास था कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति शिक्षा और तकनीकी ज्ञान पर निर्भर करती है। उनके प्रयासों से इंजीनियरिंग शिक्षा को प्रोत्साहन मिला। बेंगलुरु में स्थापित इंजीनियरिंग संस्थान बाद में उनके नाम पर विश्वेश्वरैया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के रूप में प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने व्यावसायिक शिक्षा को भी महत्व दिया और पॉलिटेक्निक संस्थानों की स्थापना को बढ़ावा दिया। उनका मानना था कि केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यावहारिक कौशल भी आवश्यक है।

वे योजनाबद्ध आर्थिक विकास के समर्थक थे। उनकी पुस्तक Reconstructing India में उन्होंने औद्योगिक विकास और आत्मनिर्भरता पर बल दिया। Planned Economy for India में उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि देश को संसाधनों का उपयोग सुनियोजित ढंग से करना चाहिए। उनके विचारों में आत्मनिर्भरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने समय प्रबंधन, अनुशासन और कार्य संस्कृति को राष्ट्रीय विकास से जोड़ा।

मानवीय दृष्टि से उनका जीवन अत्यंत प्रेरणादायक था। वे सादगीपूर्ण जीवन जीते थे और व्यक्तिगत ईमानदारी को सर्वोच्च महत्व देते थे। समय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी प्रसिद्ध थी कि लोग उनके अनुशासन को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते थे। वे मानते थे कि व्यक्ति का चरित्र ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। उन्होंने युवाओं को परिश्रम, आत्मविश्वास और शिक्षा के महत्व का संदेश दिया।

यह भी पढ़ें  करोड़ों की परियोजनाओं से बदलेगा पुसौर का स्वरूप: वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी

उनके योगदान को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नाइट की उपाधि प्रदान की। स्वतंत्र भारत ने 1955 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति को नहीं बल्कि उस विचारधारा को दिया गया जिसमें ज्ञान और परिश्रम के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की कल्पना की गई थी। 15 सितंबर को भारत में अभियंता दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो उनके प्रति सम्मान का प्रतीक है।

विश्वेश्वरैया का जीवन यह दर्शाता है कि तकनीकी ज्ञान का उपयोग समाज के कल्याण के लिए किया जा सकता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि योजनाबद्ध विकास से आर्थिक प्रगति संभव है। उनका दृष्टिकोण केवल वर्तमान तक सीमित नहीं था बल्कि भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। आज जब भारत आधारभूत संरचना, जल प्रबंधन और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, तब उनके विचार और अधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं।

वे इस बात के प्रतीक हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षा और परिश्रम के माध्यम से उच्च स्थान प्राप्त किया जा सकता है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनेताओं का कार्य नहीं बल्कि वैज्ञानिकों, शिक्षकों और अभियंताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने अपने ज्ञान को समाज के हित में उपयोग किया और यही उन्हें महान बनाता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी उनके जीवन से प्रेरणा ले और तकनीकी ज्ञान को सामाजिक विकास से जोड़े। जल प्रबंधन, सतत विकास और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में उनकी सोच आज भी मार्गदर्शक है। उनका जीवन संदेश देता है कि अनुशासन, ईमानदारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से राष्ट्र को मजबूत बनाया जा सकता है।

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया केवल एक अभियंता नहीं थे बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण की आधारशिला रखने वाले महान व्यक्तित्व थे। उनका जीवन यह प्रमाणित करता है कि जब ज्ञान और सेवा का भाव एक साथ जुड़ता है तब इतिहास बनता है।