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पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की लहर : ममता को सताने लगा हार का डर

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

पश्चिम बंगाल चुनाव दिनों-दिन बेहद दिलचस्प होता दिख रहा है। अजेय समझी जाने वाली ममता बनर्जी हैरान, परेशानी और आक्रोशित दिखाई दे रही हैं। हाल ही में एक चुनावी सभा में उनका ये बयान – ‘रहा तृणमूल तो फिर मिलेंगे’ ; ख़ूब चर्चा में है। जहां कुछ सियासी पंडित इसे ममता बनर्जी के चुनाव में सरेंडर करने से जोड़ रहे हैं। वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि- ये उनका शक्ति प्रदर्शन का अंदाज़ ए बयां है। लेकिन जिस तरह से पश्चिम बंगाल के चुनाव में दृश्य दिखाई दे रहे हैं। वो किसी भी लिहाज़ से ममता बनर्जी के पक्ष में नहीं हैं।

अपने चुनावी अभियान के बीच ममता बनर्जी उकसावे वाले बयान दे रही हैं।चुनाव कराने आए सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ लोगों को उकसा रही हैं। 25 मार्च 2026 को दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में नंदप्रसाद गर्ल्स हाई स्कूल के मैदान में आयोजित एक जनसभा में उनका उकसावे वाला बयान सामने आया। एक वीडियो में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कथित तौर पर CRPFके जवानों को ‘धमकाती’ नजर आ रही हैं। आरोप है कि जनसभा के दौरान उन्होंने सभी महिलाओं और लड़कियों से अपील की कि- वे भारी संख्या में पोलिंग बूथ पर मौजूद रहें। चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार उन्होंने कथित तौर पर यह भी कहा कि —“अगर जरूरत पड़े तो महिलाएं CRPF जवानों से ‘निपटने’ के लिए घरेलू रसोई के उपकरणों (जैसे बर्तन या अन्य सामान) का इस्तेमाल करें।”

इस खीझ, उकसावे से — ये आईने की तरह साफ़ हो रहा है कि बंगाल की सियासी पिच से ममता बाहर हो चुकी हैं। इसी के चलते वो किसी भी मुद्दे पर जनता के बीच ख़ुद को साबित नहीं कर पा रही हैं।तिस पर ऐसे बयान दे रही हैं मानो पश्चिम बंगाल — भारत से अलग कोई देश है। जहां ममता बनर्जी के बिना पत्ता नहीं हिलेगा। ममता बनर्जी को लगता है कि वो संविधान से ऊपर हैं।लेकिन ऐसा कतई नहीं है। यहां जनता से बढ़कर कोई नहीं।ममता बनर्जी जिस मुस्लिम वोटबैंक के नाम पर एक छत्र राज कर रही थीं। वो मुस्लिम समुदाय अब अपने ‘इस्लामी’ एजेंडे की ओर बढ़ चला है।

हुमायूं कबीर, असद्दुदीन ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता — मुस्लिम सत्ता और वर्चस्व की वकालत कर रहे हैं। कांग्रेस, टीएमसी की वोटकटवा वाली भूमिका में है। साफ़ है कि इसका सीधा फायदा बीजेपी के खाते में क्रेडिट होगा। कांग्रेस के दिग्गज नेता कहे जाने वाले अधीर रंजन चौधरी,ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टिकरण के ख़िलाफ़ बिगुल फूंक रहे हैं। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वर्ग भी भाजपा की रैलियों और जनसभाओं में नज़र आ रहा है। मुस्लिम महिलाएं और पुरुष ये कहते देखे गए हैं कि —“ममता बनर्जी ने भ्रष्टाचार किया है। उन्होंने कोई काम नहीं किया है। ममता मुसलमानों को बीजेपी के नाम पर केवल डराने का काम कर रही हैं। जबकि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है। वहां मुसलमानों में कोई भय नहीं है वहां विकास हो रहा है।”

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पश्चिम बंगाल के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले मेरे कई परिचित लोग जिनका राजनीति से कोई विशेष सरोकार नहीं है। उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। 2021 के चुनाव में जहां वो बीजेपी की राह कठिन बता रहे थे। वहीं इस बार पश्चिम बंगाल में बड़े परिवर्तन को भांप रहे हैं। उनका कहना है कि — इस बार पश्चिम बंगाल, कुछ अलग तरह के चुनावी माहौल में है। जहां पिछले चुनावों में ममता समर्थकों की गुंडागर्दी, हिंसा और उत्पात से लोग डरे-सहमे रहते थे। वहीं अब लोग ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आ रहे हैं। उन्हें अब किसी चीज़ का भय नहीं लग रहा है। जिन पोलिंग बूथों में टीएमसी के गुंडों का खौफ़ रहता था। वहां अब लोग ममता बनर्जी का खुला विरोध जता रहे हैं । साथ ही साइलेंटली भी बीजेपी के पक्ष में वहां हवा चल पड़ी है। ममता के मुस्लिम तुष्टिकरण से बंगाल की जनता मुक्ति चाहती है। डेमोग्राफिक बदलाव को लेकर स्थानीय लोग ख़ासे चिंतित हैं। पश्चिम बंगाल में खुलेआम होती गौहत्याएं, जनसांख्यिकी बदलाव, गुंडागर्दी, हिंसा, अराजकता और अपराधियों को मिलते संरक्षण से वहां की जनता त्रस्त हो चुकी है।

ये संकेत बता रहे हैं कि वंदेमातरम् की राष्ट्रीय चेतना वाली बंगभूमि जागृत हो चुकी है। वहां का जन-मानस ऐतिहासिक परिवर्तन करने वाला है। बंगाली भद्रोलोक में इस बार गहन चिंतन मंथन चला है।उनका मानना है कि अगर ममता बनर्जी, अपने मज़हबी तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठियों को संरक्षण न देतीं। दुर्गा पूजा, रामनवमी, हिन्दू त्योहारों पर लगातार अंकुश लगाने का प्रयास न करती तो उनके प्रति सहानुभूति बनी रहती।लेकिन ममता बनर्जी ने जिस ढंग से हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ हुई हिंसाओं में मौन साधे रखा। मज़हबी कट्टरपंथियों को संरक्षण देती रहीं। उससे बंगाली समुदाय के स्वाभिमान को धक्का लगा। संदेशखाली, आर जी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, दुर्गापुर लॉ कॉलेज, साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज में महिलाओं के साथ हुए दुराचार, अत्याचार की — वीभत्स घटनाओं ने, उनके महिला सुरक्षा के तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक महिला होने के नाते भी ममता बनर्जी का असंवेदनशील रूप पश्चिम बंगाल की जनता ने देखा है। जो ये बताता है कि वो सिर्फ़ अपने वोटबैंक की राजनीति करती हैं। उनके लिए महिला सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती है।

वहीं ममता बनर्जी का खुलकर मुस्लिम पक्षकार के तौर पर आना। लगातार केंद्र की जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू न करना। केंद्र से हर मुद्दे पर टकराव लेना। SIR— के विरोध में उतरना। मालदा में ममता राज में,
एसआइआर के काम में लगे 3 महिला सहित 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की झकझोर देने वाली घटना ने एक गंभीर ख़तरे की ओर संकेत किया है। जब एक भीड़ ने 9 घंटे तक उन्हें बंधक बनाए रखा। उकसावे के बयान दिए जाते रहे। अधिकारी अपनी जान बचाने की गुहार लगाते रहे। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद केंद्रीय सुरक्षाबलों ने उन्हें रेस्क्यू किया।

स्थिति की भयावहता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्वत: संज्ञान लिया। देर रात 2बजे तक सुनवाई की और NIA को जांच सौंपी। मामले में सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि —“कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल ने उन्हें देर रात और फिर सुबह इस स्थिति के बारे में सूचित किया था। सूचना मिलने के बावजूद मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और स्थानीय एसपी की भूमिका को ‘बेहद निराशाजनक’ है।”

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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि — “न्यायाधीशों को डराने-धमकाने या उनके काम में बाधा डालने के प्रयासों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और न्यायपालिका अपने अधिकारियों की सुरक्षा और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्पित है। पीठ ने आगे कहा कि राज्य सरकार की निष्क्रियता ‘बेहद निंदनीय’ है। यह घटना न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराने और चल रही चुनावी प्रक्रिया को रोकने के लिए सोची-समझी साजिश प्रतीत होती है।”

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां ममता बनर्जी सरकार का असल चरित्र पेश करती हैं। आप सोचिए कि सीमावर्ती राज्य में ऐसे दृश्य कितने ख़तरनाक हैं। जहां एक संगठित भीड़ न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लेती हो। खुलेआम देश के संविधान और कानून को चुनौती दी जाती हो। हिंसा, उत्पात के दृश्य दिखाई देते हों। क्या ये देश की एकता और अखंडता को चुनौती नहीं है? आख़िर ये दुस्साहस कहां से आया? स्पष्ट है राज्य की ममता बनर्जी सरकार की उस तानाशाही और तुष्टिकरण की नीति से, जो केवल सत्ता चाहती है। उनके लिए राष्ट्रीयता जैसे मूल्य कोई मायने नहीं रखते हैं। कोई आम नागरिक भी सोचे कि — अगर सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप ना करता, केंद्रीय बल रेस्क्यू न करते— तो क्या न्याय अधिकारी सुरक्षित रहते? अगर वहां न्याय अधिकारी सुरक्षित नहीं हैं तो क्या आम नागरिक सुरक्षित हो सकता है? क्या ये दृश्य अलगाव, आतंक को स्पष्ट बयां नहीं करते हैं? क्या किसी भी नेता, राजनीतिक दल को, देश की एकता और अखंडता को चुनौती देने की छूट दी जा सकती है?

पहले कम्युनिस्ट शासन उसके बाद ममता बनर्जी सरकार के लंबे समय के अराजक शासन से बंगाल त्रस्त हो गया है। वो अब इन सबसे मुक्ति चाहता है। इसी के दृश्य पश्चिम बंगाल में सर्वत्र दिखाई देते हैं। कोलकाता के रहने वाले एक युवा ने कहा कि— “पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाक़ों में अचानक बदलती डेमोग्राफी। पश्चिम बंगाल के संसाधनों पर डाका डालते, बांग्लादेशी घुसपैठियों, रोहिंग्याओं से लोगों में भय का वातावरण बना है।” लेकिन ममता सरकार में उनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई। ये सारी बातें ममता बनर्जी को ख़ासा डैमेज कर रही हैं।

सुवेंदु अधिकारी के नामांकन रोड शो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी , केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सभाओं में लगातार उमड़ता विशाल जनसमूह—बड़े परिवर्तन का संकेत दे रहा है। बीजेपी को‌ लेकर जनता में जैसा उत्साह 2026 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिल रहा है। वो परिवर्तन की बड़ी आहट के तौर पर दिखाई दे रहा है। महिलाओं, युवा, बुजुर्ग — सभी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के केन्द्रीय नेतृत्व, भाजपा की नीतियों को लेकर विश्वास की लहर दौड़ रही है। छोटे-छोटे बच्चे तक अपने माता-पिता के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैलियों में, सभाओं में पहुंच रहे हैं।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र के इंतज़ार में बच्चों के निश्छल, भावुक कर देने वाले वीडियो देखने को मिल रहे हैं। जहां तक नज़र जाती है वहां विशाल जनसमूह दिखाई देता है। जबकि दूसरी ओर ममता बनर्जी की संभाएं खाली दिख रही हैं। इसी के चलते प्रेशर से बचने के लिए उन्होंने जनसभाओं के आकार को छोटा कर दिया। ममता बनर्जी की सभाओं में लोग उनका बॉयकॉट करते नज़र आ रहे हैं। ये सब स्पष्ट संकेत हैं कि — पश्चिम बंगाल की भूमि इस बार अपने मूल स्वरूप में लौट आई है। संन्यासी क्रांति, वंदेमातरम् की भूमि- हिंसा, अत्याचार, अराजकता से मुक्ति चाहती है।

वहीं पश्चिम बंगाल के अतिसंवेदनशील और संवदेनशील इलाक़ों में सेना ने जिस तरह से भयमुक्त निर्वाचन के लिए मोर्चा संभाला है। उससे जनता में उत्साह की लहर देखने को मिली है। लोग भयमुक्त होकर अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं। नए परिवर्तन के लिए आगे आ रहे हैं। स्पष्ट है कि हाल-फिलहाल पूरा गेम ममता के हाथों से फिसलता जा रहा है। पश्चिम बंगाल भाजपा की ओर रुख कर रहा है।‌ये आश्चर्य की कोई बात नहीं होगी कि — 4 मई को रिजल्ट के दिन हरियाणा और महाराष्ट्र जैसा मैजिक देखने को मिले। टीएमसी दो अंकों में सिमट जाए और बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ विजय तिलक करे।

— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
( साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)