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भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान शिवरीनारायण

डॉ अश्विनी केशरवानी

छत्तीसगढ़ प्रदेश का अधिकांश भाग बिहार, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा से जुड़ा है। अतः इन सीमावर्ती क्षेत्रों में उन प्रदेशों की परम्पराएं देखने को मिलती है। वहां का खानपान, रहन सहन और बोल चाल भी प्रभावित होती है। ऐसी अनेक परम्पराएं छत्तीसगढ़ की पूर्वी सीमा जो उड़ीसा से जुड़ा है, में देखने को मिलती है। रथयात्रा उनमें से एक बहु प्रचलित और बहु चर्चित परम्परा है। इसे उड़ीसा के साथ ही छत्तीसगढ़ में भी बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। उड़ीसा में प्रचलित है ‘‘..मोर गौरव जगन्नाथ’’ (जगन्नाथ जी हमारे गौरव हैं) समुद्र तट पर स्थित पुरी भागवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की के कारण ‘‘जगन्नाथ पुरी’’ कहलाती है जो चारों धाम में एक है। रथयात्रा यहां का एक प्रमुख पर्व है। इस पर्व में देश विदेश के हजारों-लाखों दर्शनार्थी और पर्यटक बड़ी श्रद्धा के साथ सम्मिलित होते हैं। यहां की मूर्ति और स्थापत्य कला और समुद्र का मनोरम किनारा पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है।

कोणार्क का अद्भूत सूर्य मंदिर, भगवान बुद्ध की अनुपम मूर्तियों से सजा धौलगिरि और उदयगिरि की गुफाएं, जैन मुनियों की तपस्थली खंडगिरि की गुफाएं, लिंगराज, साक्षी गोपाल और भगवान जगन्नाथ मंदिर दर्शनीय है। पुरी और चंद्रभागा का मनोरम समुद्री किनारा, चंदन तालाब, जनकपुर और नंदनकानन अभ्यारण्य बड़ा ही मनोरम और दर्शनीय है। रथयात्रा एक ऐसा पर्व है जिसमें भगवान जगन्नाथ चलकर जनता के बीच आते हैं और उनके सुख दुख में सहभागी होते हैं। ‘‘…सब मनिसा मोर परजा’’ (सब मनुष्य मेरी प्रजा है), ये उनके उद्गार है। भगवान जगन्नाथ तो पुरूषोत्तम हैं। उनमें श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महायान का शून्य और अद्वैत का ब्रह्म समाहित है। उनके अनेक नाम है, वे पतित पावन हैं।

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की जनकपुर यात्रा रथ में बिठा कर करायी जाती है। जगन्नाथपुरी में तीनों को अलग अलग रथ में बिठाकर यात्रा कराया जाता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘‘नंदीघोष’’ कहते हैं जो 65 फीट लंबा, 65 फीट चैड़ा और 45 फीट ऊँचा होता है। इसमें 7 फीट व्यास के 17 पहिये लगे होते हैं। इसीप्रकार बलभद्र जी के रथ को ‘‘तालध्वज’’ और सुभद्रा जी के रथ को ‘‘देवलन’’ कहा जाता है जो जगन्नाथ जी के रथ से कुछ छोटे होते हैं। इन रथों को खींचने के लिए गांव-गांव से हजारों-लाखों लोग आते हैं।

पूजा एवं रथ खींचने का प्रथम अधिकार पुरी के राजा का

पुरी में प्रथम पूजा और रथ को खींचने का प्रथम अधिकार वहां के तत्कालीन राजा को था। आज भी उनके वंशज इस परम्परा को निभाते हैं। विशाल जनसमुदाय इस रथयात्रा का आनंद और पुण्य लाभ लेते हैं। नारियल, लाई, गजामूंग और मालपुआ का प्रसाद विशेष रूप से इस दिन मिलता है। तीनों रथ गुंडिचा मंदिर (मौसी के घर, जिसे जनकपुर भी कहते हैं) में आकर रूक जाती है। यहां भगवान आठ दिन रहकर विजियादसमीं को मंदिर लौट आते हैं। जनकपुर में भगवान जगन्नाथ दसों अवतार का रूप धारण करते हैं..विभिन्न धर्मो और मतों के भक्तों को समान रूप से दर्शन देकर तृप्त करते हैं। इस समय उनका व्यवहार सामान्य मनुष्यों जैसा होता है।

मौसी के घर अच्छे अच्छे पकवान खाकर भगवान जगन्नाथ बीमार हो जाते हैं। तब यहां पथ्य का भोग लगाया जाता है जिससे भगवान शीघ्र ठीक हो जाते हैं। रथयात्रा के तीसरे दिन पंचमी को लक्ष्मी जी भगवान जगन्नाथ को ढुढ़ते यहां आती हैं। तब द्वैतापति दरवाजा बंद कर देते हैं जिससे लक्ष्मी जी नाराज होकर रथ का पहिया तोड़ देती है और ‘‘हेरा गोहिरी साही’’ पुरी का एक मुहल्ला जहां लक्ष्मी जी का मंदिर है, में लक्ष्मी जी लौट आती हैं। बाद में भगवान जगन्नाथ लक्ष्मी जी को मनाने जाते हैं। उनसे क्षमा मांगकर और अनेक प्रकार के उपहार देकर उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं।

इस आयोजन में एक ओर द्वैतापति भगवान जगन्नाथ की भूमिका में संवाद बोलते हैं तो दूसरी ओर देवदासी लक्ष्मी जी की भूमिका में संवाद करती है। लोगों की अपार भीड़ इस रूठन और मनौव्वल के संवाद को सुनकर खुशी से झूम उठते हैं। सारा आकाश जै श्री जगन्नाथ… के नारों से गंूज उठता है। लक्ष्मी जी को भगवान जगन्नाथ के द्वारा मना लिए जाने को विजय का प्रतीक मानकर इस दिन को ‘‘विजयादशमी’’ और वापसी को ‘‘बोहतड़ी गोंचा’’ कहा जाता है। रथयात्रा में पारम्परिक सद्भाव, सांस्कृतिक एकता और धार्मिक सहिष्णुता का अद्भूत समन्वय देखने को मिलता है।

कल्पना और किंवदंतियों में जगन्नाथ पुरी का इतिहास अनूठा है। आज भी रथयात्रा में जगन्नाथ जी को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है..उनमें विष्णु, कृष्ण और वामन भी हैं और बुद्ध भी। अनेक कथाओं और विश्वासों और अनुमानों से यह सिद्ध होता है कि भगवान जगन्नाथ विभिन्न धर्मो, मतों और विश्वासों का अद्भूत समन्वय है। जगन्नाथ मंदिर में पूजा पाठ, दैनिक आचार-व्यवहार, रीति-नीति और व्यवस्थाओं को शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन यहां तक तांत्रिकों ने भी प्रभावित किया है। भुवनेश्वर के भास्करेश्वर मंदिर में अशोक स्तम्भ को शिव लिंग का रूप देने की कोशिश की गयी है। इसी प्रकार भुवनेश्वर के ही मुक्तेश्वर और सिद्धेश्वर मंदिर की दीवारों में शिव मूर्तियों के साथ राम, कृष्ण और अन्य देवताओं की र्मूिर्तयां हैं। यहां जैन और बुद्ध की भी मूर्तियां हैं पुरी का जगन्नाथ मंदिर तो धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय का अद्भूत उदाहरण है। मंदिर कि पीछे विमला देवी की मूर्ति है जहां पशुओं की बलि दी जाती है, वहीं मंदिर की दीवारों में मिथुन मूर्तियों चैंकाने वाली है। यहां तांत्रिकों के प्रभाव के जीवंत साक्ष्य भी हैं।

सांख्य दर्शन के अनुसार शरीर के 24 तत्वों के उपर आत्मा होती है। ये तत्व हैं- पंच महातत्व, पांच तंत्र माताएं, दस इंद्रियों और मन के प्रतीक हैं। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। वह चलते समय शब्द करता है। उसमें धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है। इसे भक्तजनों का पवित्र स्पर्श प्राप्त होता है। रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और अहंकार से होती है। ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत करता है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करती है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। यद्यपि शरीर में आत्मा होती है तो भी वह स्वयं संचालित नहीं होती, बल्कि उस माया संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता बल्कि उसे खींचने के लिए लोकशक्ति की आवश्यकता होती है। उड़ीसा प्रदेश से जुड़े छत्तीसगढ़ के अनेक गांवों, कस्बों और शहरों में रथयात्रा बड़े धूमधाम, श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। जिस प्रकार राजा-महाराजा, जमींदार, मालगुजार रत्नपुर की महामाया देवी और सम्बलपुर की

समलेश्वरी देवी को अपने नगरों में ‘‘कुलदेवी’’ के रूप में प्रतिष्ठित किये हैं, वैसे ही जगन्नाथ धाम की यात्रा करके भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की विग्रह मूर्तियों को अपने नगरों में स्थापित कर पुण्य लाभ प्राप्त करते रहें हैं। यहां के हर गांवों में और घरों में जगन्नाथ जी का मंदिर अवश्य मिलेगा।

भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान शिवरीनारायण:-
स्कंद पुराण में शबरीनारायण (वर्तमान शिवरीनारायण) को ‘‘श्रीसिंदूरगिरिक्षेत्र’’ कहा गया है। प्राचीन काल में यहां शबरों का शासन था। द्वापरयुग के अंतिम चरण में श्रापवश जरा नाम के शबर के तीर से श्रीकृष्ण घायल होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन उनका मृत शरीर नहीं जलता। तब उस मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित कर दिया जाता है। आज भी बहुत जगह मृत शरीर के मुख को औपचारिक रूप से जलाकर समुद्र अथवा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इधर जरा को बहुत पश्चाताप होता है और जब उसे श्रीकृष्ण के मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित किये जाने का समाचार मिलता है तब वह तत्काल उस मृत शरीर को ले आता है और इसी श्रीसिंदूरगिरि क्षेत्र में एक जलस्रोत के किनारे बांस के पेड़ के नीचे रखकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगा। आगे चलकर वह उसके सामने बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करने लगा। इसी मृत शरीर को आगे चलकर ‘‘नीलमाधव’’ कहा गया।

इसी नीलमाधव को 14 वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने पुरी में ले जाकर स्थापित करने की बात कही है। डाॅ. जे. पी. सिंहदेव और डाॅ. एल. पी. साहू ने ‘‘कल्ट आॅफ जगन्नाथ’’ और ‘‘कल्चरल प्रोफाइल ऑफ साउथ कोसला’’ में लिखते हैं-‘‘भगवान नीलमाधव की मूर्ति को शबरीनारायण से पुरी लाने वाला पुरी के राजपुरोहित विद्यापति नहीं थे बल्कि उन्हें तांत्रिक इंद्रभूति ने संभल पहाड़ी की एक गुफा में ले जाकर उसके सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना किया करता था। यहीं उन्होंने ‘‘वज्रयान बुद्धिज्म’’ की स्थापना की। उन्होंने तिब्बत जाकर लामा सम्प्रदाय की भी स्थापना की थी। बंगाल की राजकुमारी लक्ष्मींकरा जो बाद में पटना के राजा जैलेन्द्रनाथ से विवाह की, वह इंद्रभूति की बहन थी। इंद्रभूति के वंशज तीन पीढ़ी तक नीलमाधव के सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करते रहे बाद में उस मूर्ति को पुरी में ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। पहले जगन्नाथ पुरी के इस मंदिर में तांत्रिकों का कब्जा था जिसे आदि

गुरू शंकराचार्य ने उनसे शास्त्रार्थ करके उनके प्रभाव से मुक्त कराया।
इधर जरा अपने नीलमाधव को न पाकर खूब विलाप करने लगा और अन्न जल त्याग कर मृत्यु का वरण करने के लिए उद्यत हो गया तभी भगवान नीलमाधव अपने नारायणी रूप का उन्हें दर्शन कराया और यहां गुप्त रूप से विराजित होने का वरदान दिये। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि प्रतिवर्ष माघपूर्णिमा को जो कोई मेरा दर्शन करेगा वह मोक्ष को प्राप्त कर सीधे बैकंुठधाम को जाएगा। तब से यह गुप्तधाम कहलाया। आज भी यहां भगवान नारायण का मोक्षदायी स्वरूप विद्यमान है और उनके चरण को स्पर्श करता ‘‘रोहिणी कुंड’’ विद्यमान है जिसकी महिमा अपार है। प्राचीन कवि श्री बटुकसिंह ने रोहिणी कुंड को एक धाम माना है-‘‘रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर’’ जबकि सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने शबरीनारायण माहात्म्य में मुक्ति पाने का एक साधन बताया है:-

रोहिणि कुंडहि स्पर्श कर चित्रोत्पल जल न्हाय।
योग भ्रष्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय।।

तथ्य चाहे जो हो, पुरी के जगन्नाथ मंदिर और शबरीनारायण मंदिर में बहुत कुछ समानता है। दोनों मंदिर तांत्रिकों के कब्जे में था जिसे क्रमशः आदि गुरू शंकराचार्य और स्वामी दयाराम दास ने शास्त्रार्थ करके तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त कराया। शबरीनारायण में नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों का कब्जा था। चूंकि शबरीनारायण से होकर जगन्नाथपुरी जाने का मार्ग था। पथिकों को यहां के तांत्रिक शेर बनकर डराते और अपने प्रभाव से मारकर खा जाते थे। इसलिए इस मार्ग में जाने में यात्री गण भय खाते थे। एक बार स्वामी दयाराम दास ग्वालियर से तीर्थाटन के लिए घुमते हुए रत्नपुर पहुंचे। उनकी विद्वता और पांडित्य से रत्नपुर के राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें शबरीनारायण के मंदिर और मठ की व्यवस्था करने का दायित्व सौंपा।

स्वामी दयाराम दास जब शबरीनारायण पहुंचे तब वहां के तांत्रिक उन्हें भी डराने के लिए शेर बनकर झपटे लेकिन ऐसा चमत्कार हुआ कि शेर के रूप में तांत्रिक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके। बाद में तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ जिसमें कनफड़ा बाबा को पराजय का सामना करना पड़ा और डर के मारे वे जमीन के भीतर प्रवेश कर गये। इस प्रकार शबरीनारायण के मठ और मंदिर नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त हुआ, जगन्नाथ पुरी जाने वाले यात्रियों को तांत्रिकों के भय से मुक्ति मिली और यहां रामानंदी सम्प्रदाय के वैष्णवों का बीजारोपण हुआ।

यहां के मठ के स्वामी दयाराम दास पहले महंत हुए और तब से आज तक इस वैष्णव मठ में 14 महंत हो चुके हैं जो एक से बढ़कर एक धार्मिक, अध्यात्मिक और ईश्वर भक्त हुए। उनकी प्रेरणा से अनेक मंदिर, महानदी के किनारे घाट और मंदिर की व्यवस्था के लिए जमीन दान में देकर कृतार्थ ही नहीं हुए बल्कि इस क्षेत्र में भक्ति भाव की लहर फैलाने में मद्द भी की। जिस स्थान पर कनफड़ा बाबा जमीन के भीतर प्रवेश किये थे उस स्थान पर स्वामी दयाराम दास ने एक ‘‘गाधी चैरा’’ का निर्माण कराया। प्रतिवर्ष माघ शुक्ल तेरस और आश्विन शुक्ल दसमी (दशहरा) को शिवरीनारायण के महंत इस गाधी चैरा में बैठकर पूजा-अर्चना करते हैं और प्रतीकात्मक रूप से यह प्रदर्शित करते हैं कि वैष्णव सम्प्रदाय तांत्रिकों के प्रभाव से बहुत उपर है। शिवरीनारायण के दक्षिणी द्वार के एक छोटे से मंदिर के भीतर तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा की पगड़ीधारी मूर्ति है और बस्ती के बाहर एक ‘‘नाथ गुफा‘‘ के नाम से एक मंदिर है जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है।

शबरीनारायण में मठ के भीतर संवत् 1927 में महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार श्री राजसिंह ने जगन्नाथ मंदिर की नींव डाली जिसे उनके पुत्र श्री चंदनसिंह ने पूरा कराया और उसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की विग्रह मूर्तियों की स्थापना करायी। संवत् 1927 में ही उन्होंने महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से महानदी के तट पर योगियों के निवासार्थ एक भवन का निर्माण कराया। इसे ‘‘जोगीडीपा’’ कहते हैं। सुप्रसिद्ध साहित्यकार और तत्कालीन शबरीनारायण तहसील के तहसीलदार ठाकुर जगमोहनसिंह ने अपनी पुस्तक ‘‘प्रलय’’ में लिखा हैः-‘‘जोगीडिफा श्री मान् बाबा गौतमदास जी का सुंदर बगीचा एक ऊँची भूमि पर जो किसी समय में एक पहाड़ी थी, है। बाबा जी यहां के महंत और प्रतिष्ठित हैं।’’ रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी यहां एक सप्ताह विश्राम करते हैं। इस कारण इसे ‘‘जनकपुर’’ भी कहा जाता है। पहले रथयात्रा में पंडित कौशलप्रसाद द्विवेदी के घर की मूर्तियों को रथ में निकाला जाता था। बाद में जब मठ की मूर्तियों को निकाला जाने लगा तब दो रथ में दोनों जगहों की मूर्तियां निकाली जाने लगी। आज केवल मठ की मूर्तियां ही रथ में निकाले जाते हैं।

रथयात्रा यहां का एक प्रमुख त्योहार है। प्राचीन काल से यहां रथयात्रा का आयोजन मठ के द्वारा किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महंत गौतमदास ने यहां रथयात्रा की शुरूवात की और महंत लालदास ने उसे सुव्यवस्थित किया। मठ के मुख्तियार पंडित कौशलप्रसाद तिवारी को हमेशा स्मरण किया जायेगा। उन्होंने ही यहां रामलीला, रासलीला, नाटक, रथयात्रा, और माघी मेला को सुव्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। रथयात्रा के लिए जगन्नाथ पुरी की तरह यहां भी प्रतिवर्ष लकड़ी का रथ निर्माण कराया जाता था जिसे बाद में बंद कर दिया गया और एक लोहे का रथ बनवाया गया है जिसमें आज रथयात्रा निकलती है। शिवरीनारायण और आसपास के हजारों-लाखों श्रद्धालु यहां आकर रथयात्रा में शामिल होकर और रथ खींचकर पुण्यलाभ के भागीदार होते हैं। जगह जगह रथ को रोककर पूजा-अर्चना की जाती है। प्रसाद के रूप में नारियल, लाई और गजामूंग दिया जाता है। मेला जैसा दृश्य होता है।

रथदूज छत्तीसगढ़ में सबसे पवित्र दिन 

इस दिन को सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में बड़ा पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन बेटी को बिदा करने, बहू को लिवा लाने, नये दुकानों की शुरूवात और गृह प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न कराये जाते हैं। इस दिन अपने स्वजनों, परिजनों और मित्रों के घर मेवा-मिष्ठान भिजवाने की परम्परा है। बच्चे नये कपड़े पहनते हैं और उन्हें खर्च करने के लिए पैसा दिया जाता है। उनके लिए यह एक विशेष दिन होता है। सद्भाव के प्रतीक रथयात्रा आज भी यहो श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। शिवरीनारायण को ‘‘छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरी’’ कहा जाता है। राजिम में भगवान साक्षी गोपाल विराजमान हैं और ऐसी मान्यता है कि शिवरीनारायण के बाद राजिम की यात्रा और भगवान साक्षी गोपाल का दर्शन करना आवश्यक है अन्यथा उनकी यात्रा निरर्थक होता है। जिस प्रकार जगन्नाथ पुरी को ‘‘स्वर्गद्वार‘‘ कहा जाता है और कोढ़ियों का उद्धार होता है। उसी प्रकार शिवरीनारायण की भी महत्ता है। कवि बटुकसिंह श्रीशिवरीनारायण-सिंदूरगिरि माहात्म्य में लिखते हैं:-

क्वांर कृष्णों सुदि नौमि के होत तहां स्नान।
कोढ़िन को काया मिले निर्धन को धनवान।।

शिवरीनारायण में बिलासपुर रोड में एक पुराना कोढ़ि खाना है और यहां एक लेप्रोसी विशेषज्ञ के रूप में डाॅ. एम. एम. गौर की नियुक्ति भी हुई थी। बाद में उन्हीं के सलाह पर प्रयागप्रसाद केशरवानी चिकित्सालय की स्थापना की गयी थी। शिवरीनारायण से पांच कि. मी. की दूरी पर स्थित दुरपा गांव को अंग्रेज सरकार द्वारा ‘‘लेप्रोसी गांव‘‘ घोषित किया गया था। इस गांव में आना-जाना पूर्णतः प्रतिबंधित था। शिवरीनारायण से 70 कि.मी. पर चांपा में सोंठी कुष्ठ आश्रम है। इसी प्रकार बिलासपुर रायपुर रोड में बैतलपुर में भी एक कुष्ठ आश्रम है, जहां कोढ़ियों का ईलाज होता है और अनेक प्रकार के उद्योग उनके द्वारा चलाये जाते हैं। उनके बच्चों के रहने और पढ़ने आदि का पूरा इंतजाम किया जाता है। सरकार इस संस्था को हर प्रकार का सहयोग प्रदान करती है। ऐसे मुक्तिधाम को पुरी क्षेत्र कहा गया है:-

शिवरीनारायण पुरी क्षेत्र शिरोमणि जान।
याज्ञवल्क्य व्यासादि ऋषि निजमुख करत बखान।।

यहां भगवान नारायण के चरण को स्पर्श करती रोहिणीकुंड की महिमा अपार है। कवियों ने उसे साक्षात् मोक्ष देने वाला बताया है। उस कुंड के कारण इसे बैकुंठ द्वार माना गया है। देखिये कवि की एक बानगी:-

नारायण के कलाश्रित जानिय धामहि एक
प्रथम विष्णुपुरि नाम पुनि रामपुरि हंू नेक
चित्रोत्पल नदि तीर महि मंडित अति आराम
बस्यो यहां बैकुंठपुर नारायणपुर धाम
भासति तहं सिंदूरगिरि श्रीहरि कीन्ह निवास
कुंड रोहिणी चरण तल भक्त अभीष्ट प्रकास।

छत्तीसगढ़ के अन्यान्य नगरों-सारंगढ़, रायगढ़, सक्ती, चाम्पा, नरियरा, रायपुर, राजिम, बिलासपुर, रतनपुर बस्तर, जशपुर, धरमजयगढ़, और सरगुजा में भी जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की रथयात्रा निकलती है। रायपुर में रथयात्रा दूधाधारी मठ से, बिलासपुर में वेंकटेश मंदिर से और अन्य स्थानों में जगन्नाथ मंदिर से रथयात्रा निकलती है। चाम्पा में जमींदार रूद्रशरणसिंह ने जगन्नाथ मंदिर बनवाया। इसी प्रकार सारागांव में श्री काशीप्रसाद राठौर के पूर्वज हटरी चैंक में और रगजा में श्री घासीराम चैधरी ने सन 1926 में जगन्नाथ मंदिर बनवाया था। रथ को खींचकर नारियल, लाई और गजामूंग का प्रसाद ग्रहण करते हैं। जगन्नाथपुरी और चांपा में विशेष रूप से मालपुआ बनाया जाता है। सुदूर बस्तर में तो इसे ‘‘गोन्चा परब’’ के रूप में विशेष रूप से मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में रथयात्रा की तिथि को बड़ा शुभ दिन माना जाता है। इस दिन कोई भी शुभ कार्य किया जाता है। बेटी बिदा और बहू को लिवा लाने की विशेष परम्परा है। बच्चे, बूढ़े सब नये कपड़े पहनकर रथयात्रा में सम्मिलित होते हैं। इस दिन नाते-रिश्तेदारों के घर मेवा-मिष्ठान भिजवाने की प्रथा है। यह लोक भावना से जुड़ी परंपरा है। इससे सद्भावना का विकास होता है। इसमें जात-पात का भेद नहीं होता। इसीलिए कवि गाता है:-

मास आषाढ़ रथ दुतीया, रथ के किया बयान।
दर्शन रथ को जो करे, पावे पद निर्वान।।

 

लेखक छत्तीसगढ़ की संस्कृति एवं इतिहास के अध्येता हैं।

One thought on “भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान शिवरीनारायण

  • July 7, 2024 at 07:36
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    Cult of Jagannath शीर्षक से जुड़ी जानकारियां काफी रोचक और जिज्ञासा शमन करने वाली है. इसी तरह शिवरीनारायण क्षेत्र पर भी महत्वपूर्ण जानकारियां हैं.
    लेखक संपादक बधाई के पात्र हैं

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