फूँकि कै स्वतंत्रता कौ मंत्र ललकारे हैं – रानी दुर्गावती

भारत की माटी ने अनगिनत वीरांगनाओं को जन्म दिया है, किन्तु रानी दुर्गावती का नाम उन सब में एक अलग ही आभा के साथ चमकता है। वे केवल एक राजमहिषी नहीं थीं, वे एक कुशल प्रशासक, अदम्य योद्धा और प्रजा की माँ थीं। उनका जीवन भारतीय इतिहास में नारी शक्ति, स्वाभिमान और बलिदान का सबसे प्रखर प्रमाण है। 24 जून का वह दिन, जब उन्होंने शत्रु के हाथों मरने की अपेक्षा अपने हाथों से अपने प्राण दे दिए, इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित है।
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर के प्रतिष्ठित चन्देल राजवंश में हुआ था। उनके पिता महाराजा शालिवाहन चन्देल बुन्देलखण्ड के अत्यन्त शक्तिशाली शासक थे। चन्देल वंश की परम्परा और गौरव उनकी रगों में बचपन से ही प्रवाहित था। कालिंजर का वह दुर्ग, जो अपनी अभेद्यता के लिए प्रसिद्ध था, उनके बाल्यकाल की क्रीड़ास्थली रही। वहीं उन्होंने शस्त्र विद्या, घुड़सवारी और तीरन्दाजी में असाधारण कौशल प्राप्त किया। उनका नाम ‘दुर्गावती’ दुर्गाष्टमी के दिन जन्म लेने के कारण रखा गया था, जो आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का सटीक प्रतिबिम्ब बन गया।
उनके बारे में यह ऐतिहासिक तथ्य उल्लेखनीय है कि बचपन से ही वे साधारण राजकुमारियों से बिल्कुल भिन्न थीं। जब अन्य कुमारियाँ आभूषणों और विलास में रुचि लेती थीं, दुर्गावती तलवार और धनुष को अपना साथी मानती थीं। इतिहासकार लिखते हैं कि वे बाघ और भालू का शिकार करने में भी निपुण थीं, जो उस युग में किसी स्त्री के लिए अकल्पनीय साहस था।
1542 में दुर्गावती का विवाह गोण्डवाना के राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से हुआ। यह विवाह केवल दो राजघरानों का मिलन नहीं था, यह दो शक्तियों का संगम था। दलपत शाह गोण्डवाना के सबसे योग्य राजकुमार माने जाते थे और दुर्गावती के साथ उनकी जोड़ी को उस युग के इतिहासकारों ने अनुपम बताया है। विवाह के पश्चात दुर्गावती ने जबलपुर के समीप गोण्डवाना साम्राज्य को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। उनकी राजधानी सिंगौरगढ़ थी, जो मध्य प्रदेश के वर्तमान डिंडोरी जिले के समीप स्थित थी।
1550 में दलपत शाह का असमय निधन हो गया और दुर्गावती के कंधों पर एक विशाल साम्राज्य का भार आ पड़ा। उस समय उनका पुत्र वीरनारायण शिशु था और राज्य चारों ओर से शत्रुओं से घिरा था। किन्तु दुर्गावती ने न तो घबराहट दिखाई, न किसी अन्य राजा की शरण ली। उन्होंने स्वयं राजकाज की बागडोर संभाली और अगले पन्द्रह वर्षों तक ऐसा शासन किया जिसे गोण्डवाना का स्वर्णकाल कहा जाता है।
रानी दुर्गावती का शासन केवल युद्धों की कहानी नहीं है। वे एक दूरदर्शी प्रशासक थीं जिन्होंने अपनी प्रजा के जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए अथक परिश्रम किया। उन्होंने गोण्डवाना में अनेक तालाब, कुएँ और बावड़ियाँ बनवाईं। जबलपुर के समीप स्थित ‘रानी दुर्गावती ताल’ आज भी उनकी स्मृति को जीवित रखे हुए है। इतिहासकार अबुल फजल ने ‘आइन-ए-अकबरी’ में लिखा है कि रानी दुर्गावती के राज्य में इतने हाथी थे जितने अकबर के पूरे मुगल साम्राज्य में भी नहीं थे।
उनके शासनकाल में व्यापार, कृषि और कला को विशेष प्रोत्साहन मिला। वे प्रतिदिन अपने दरबार में जाकर स्वयं प्रजा की समस्याएँ सुनती थीं। किसानों को लगान में रियायत देना, न्याय में विलम्ब न करना और दुर्बलों की रक्षा करना उनके शासन के मूल सिद्धान्त थे। यही कारण था कि उनकी प्रजा उन्हें माँ की दृष्टि से देखती थी। आज भी गोण्डवाना के जनजातीय समाज में उनके किस्से लोकगीतों और परम्पराओं में जीवित हैं।
रानी दुर्गावती के शासनकाल में पड़ोसी राज्यों से संघर्ष अनिवार्य हो गया था। मालवा के सुल्तान बाज बहादुर ने गोण्डवाना पर आक्रमण किया किन्तु रानी ने उसे करारी पराजय दी। इस युद्ध में रानी स्वयं हाथी पर सवार होकर सेना का नेतृत्व किया। इतिहास साक्षी है कि उन्होंने न केवल अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा की, बल्कि शत्रु को खदेड़कर उन्हें भविष्य में आक्रमण करने से भी रोका।
यह उल्लेखनीय है कि एक विधवा रानी द्वारा इतने बड़े साम्राज्य का संचालन और शत्रुओं से उसकी रक्षा करना उस काल में एक असाधारण उपलब्धि थी। जब पूरे हिन्दुस्तान में मुगल साम्राज्य का विस्तार हो रहा था, जब एक के बाद एक राज्य मुगल आधिपत्य स्वीकार कर रहे थे, तब दुर्गावती अपने छोटे से गोण्डवाना साम्राज्य को न केवल सुरक्षित रख रही थीं बल्कि उसे पुष्पित-पल्लवित भी कर रही थीं।
मुगल सम्राट अकबर का साम्राज्य-विस्तार का महत्त्वाकांक्षी अभियान जब मध्य भारत की ओर बढ़ा तो गोण्डवाना उसके निशाने पर आ गया। अकबर ने अपने सेनापति खानदेश के सूबेदार आसफ खाँ को 1564 में गोण्डवाना जीतने के आदेश के साथ भेजा। आसफ खाँ एक अनुभवी और क्रूर सेनापति था जिसके पास विशाल मुगल सेना, तोपखाना और असीम साधन थे।
रानी दुर्गावती को जब इस आक्रमण का समाचार मिला तो उनके कुछ अमात्यों ने सन्धि का परामर्श दिया। किन्तु रानी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे स्वाभिमान के साथ मरना जानती हैं, पराधीनता में जीना नहीं। उनका यह वाक्य भारतीय इतिहास की सबसे प्रेरणादायी उक्तियों में से एक है। उन्होंने अपनी सीमित किन्तु स्वामिभक्त सेना को युद्ध के लिए तैयार किया।
पहला संघर्ष नर्रई नाला के पास हुआ। रानी हाथी ‘सरमन’ पर सवार होकर स्वयं युद्धभूमि में उतरीं। उनकी सेना संख्या में छोटी थी किन्तु मनोबल में अजेय। पहले दिन के संघर्ष में गोण्डवाना की सेना ने मुगलों को पीछे धकेल दिया। रानी के युद्धकौशल और उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति ने सैनिकों में असाधारण उत्साह भर दिया।
दूसरे दिन की लड़ाई बेहद निर्णायक थी। मुगल सेना ने अपनी तोपों के साथ पूरी शक्ति से आक्रमण किया। रानी का पुत्र वीरनारायण भी युद्धभूमि में था। घमासान युद्ध के बीच रानी के कान के पास एक तीर आकर लगा और फिर दूसरा। वे घायल हो गईं किन्तु उन्होंने हार नहीं मानी। उनके महावत ने उनसे युद्धभूमि छोड़ने का आग्रह किया किन्तु रानी ने इसे अस्वीकार कर दिया।
जब उन्होंने देखा कि युद्ध में विजय असम्भव हो गई है और शत्रु उन्हें जीवित पकड़ना चाहता है, तो उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया जो उन्हें इतिहास में अमर कर गया। रानी दुर्गावती ने अपनी कटार निकाली और उसे अपने वक्ष में भोंक लिया। 24 जून 1564 को गोण्डवाना की वह वीरांगना शहीद हो गई जिसने पन्द्रह वर्षों तक एक विशाल साम्राज्य की रक्षा की थी। उनका यह बलिदान भारतीय इतिहास में स्वाभिमान और स्वातन्त्र्य की सबसे प्रखर अभिव्यक्ति बन गया।
“मरना हो तो आजाद मरो, शत्रु के बंधन में नहीं।” — रानी दुर्गावती का जीवन-सन्देश
आसफ खाँ ने इस युद्ध में जो पाशविक व्यवहार किया वह भी इतिहास में दर्ज है। गोण्डवाना की सम्पत्ति को लूटा गया और प्रजा पर अत्याचार किये गये। आसफ खाँ ने रानी के पुत्र वीरनारायण को भी बाद में पकड़कर मार डाला। किन्तु इतिहास का सत्य यह है कि जीत आसफ खाँ की नहीं हुई। जो रानी जीते जी नहीं झुकी, वह मरकर भी लोगों के हृदय में अजेय रही।
अबुल फजल ने ‘अकबरनामा’ में रानी दुर्गावती का उल्लेख किया है जो इस बात का प्रमाण है कि मुगल इतिहासकारों ने भी उनकी वीरता को स्वीकार किया। वे लिखते हैं कि रानी एक असाधारण शासक थीं और उनका राज्य सम्पन्न और सुव्यवस्थित था। शत्रु के लेखन में भी उनकी प्रशंसा इस बात की साक्षी है कि उनका व्यक्तित्व किस स्तर का था।
रानी दुर्गावती की स्मृति आज भी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की माटी में जीवित है। जबलपुर में उनका भव्य स्मारक और समाधि स्थल है जहाँ प्रतिवर्ष 24 जून को बलिदान दिवस के रूप में श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। 1983 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया। जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम ‘रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय’ उनकी स्मृति को शैक्षणिक जगत में अमर रखे हुए है।
मध्य प्रदेश सरकार ने उनके नाम पर ‘रानी दुर्गावती सम्मान’ स्थापित किया है जो महिलाओं की असाधारण उपलब्धियों को पुरस्कृत करता है। गोण्डवाना के जनजातीय समाज में आज भी उन्हें देवी की तरह पूजा जाता है। लोकगीतों में उनकी वीरगाथाएँ गाई जाती हैं और बच्चों को उनकी कहानियाँ सुनाकर प्रेरणा दी जाती है।
जब तक इस धरती पर माँ की ममता और वीर की तलवार का सम्मान होगा, रानी दुर्गावती का नाम अमर रहेगा।

