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रमतूला की गूंज में बसती है बुंदेलखंड की सांस्कृतिक आत्मा

संध्या शर्मा (फ़ीचर एडिटर)

किसी भी क्षेत्र की पहचान केवल उसकी धरती, नदियों और किलों से नहीं होती, बल्कि उसकी संस्कृति, लोकगीतों और वाद्यों की ध्वनि से भी होती है। बुंदेलखंड की मिट्टी में ऐसी ही एक अनूठी ध्वनि सदियों से गूंजती रही है रमतूला की धुन। यह धुन केवल संगीत नहीं, बल्कि इस अंचल के लोकजीवन की स्मृतियों, आस्था, उत्सव और शौर्य का जीवंत स्वर है। जब रमतूला बजता है तो मानो बुंदेलखंड की धरती अपने अतीत, अपनी परंपराओं और अपनी सांस्कृतिक आत्मा की कथा स्वयं सुनाने लगती है।

बुंदेलखंड की वीर भूमि ने अनेक लोक वाद्यों को जन्म दिया है, जिनमें रमतूला का स्थान सबसे ऊपर है। यह सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि यहाँ की आस्था, शौर्य और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है। रमतूला की मीठी धुन सुनकर बरबस ही एक लोकगीत याद आ जाता है—

ओ री बऊ कब्बे बजेगो रम तूला
देख देख दुनिया के दूल्हा, मन मोरो ललचाए।
कौन घरी बा आएगी मोरी, जब ब्याव मोरो हो जाए।
कबे बजेगो रम तूला मतारी मोरी,
कबे बजेगो रम तूला।

ओ री बऊ कब्बे बजेगो रम तूला।
द्वारे में ताक धिना धिन तबला बाजवा दे।
बैठबे को ठाकुर की घुड़िया मंगवा दे।
दरजी दद्दा से पीरो फागो सिलवा के,
संदल बना दे मोको दूल्हा।
मतारी मोरी कब्बे बजेगो रम तूला।

ढूँढ दे महतारी एक छोटी सी दुल्हैया,
मुखड़ा हो जैसे पूनम की जुन्हैया।
जल्दी से ब्याव करा दे मोरी मैया,
नई तो मर जेहों मार के बसूला।
ए री बऊ कबे बजेगो रम तूला।

द्वारे से मोरी तें निकासी करवा दे,
परिया में धरके आरती करा दे।
अब तक पियाओ है दूध तैने मैया,
अंचरा में ढांक मोहे दूध पिया दे।

नजर न लगे तोरे गोर ललन खों,
अँखियों में कारो कारो कजरा लगा दे।
दो दो लगा दे दठूला।
मतारी मोरी कब्बे बजेगो रम तूला।

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इस लोकगीत में जहाँ रमतूला की गूँज को विवाह के शुभ मुहूर्त के आगमन का आरम्भ का प्रतीक बताया गया है, वहीं बुंदेलखंडी संस्कृति और विवाह की परम्पराओं का भी वर्णन मिलता है।

रमतूला शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान इसे ‘रमत’ (रमण करना) और ‘तूला’ (तूण या नाद) से जोड़ते हैं, जिसका अर्थ है मन को रमण कराने वाला नाद। वहीं लोक-व्यवहार में यह शब्द ‘रमता’ (घूमने वाला) से भी जोड़ा जाता है, क्योंकि यह वादकों के साथ स्थान-स्थान पर घूमता है।

रमतूला के ऐतिहासिक संदर्भ बुंदेलकालीन शासकों के समय से मिलते हैं। बुंदेल राजदरबारों में यह वाद्य शौर्य-गान एवं युद्ध-घोष के रूप में प्रयुक्त होता था। ओरछा के महलों में उत्कीर्ण चित्रों में भी इस वाद्य के प्राचीन स्वरूप के दर्शन होते हैं। माना जाता है कि यह वाद्य लगभग पाँच सौ वर्षों से इस क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपरा का अभिन्न अंग रहा है।

बुंदेलखंड की धरती अपने शौर्य और संस्कृति के लिए जानी जाती है। यहाँ की लोक परंपराओं में संगीत और वाद्य यंत्रों का विशेष महत्व है। इन्हीं पारंपरिक वाद्य यंत्रों में से एक है रमतूला, जो आज भी अपनी गूंज के लिए जाना जाता है। यह केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की आस्था, शौर्य और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

रमतूला तीन अलग-अलग हिस्सों से मिलकर बनता है। पहला मुख-भाग, जिसे ब्यौरा कहा जाता है, जहाँ फूंक मारी जाती है। दूसरा मध्य-भाग, जिसे नली कहा जाता है, जो धीरे-धीरे चौड़ी होती जाती है। तीसरा प्रसार-भाग, जिसे तूण कहा जाता है, अंतिम भाग होता है जो हाथी की सूंड के समान मुड़ा हुआ होता है। इन तीनों भागों को जोड़ने पर यह वाद्य लगभग तीन से चार फीट लंबा हो जाता है। इसका आकार हाथी की सूंड जैसा होने के कारण यह दृश्यात्मक रूप से अत्यंत आकर्षक लगता है।

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बुंदेलखंड के लोकजीवन में रमतूला को शंख की तरह पवित्र और पूज्य माना जाता है। इसकी पवित्रता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे बजाने वाला वादक इसके बदले में पैसे को पारिश्रमिक के रूप में नहीं, बल्कि प्रसाद के तौर पर ग्रहण करता है। ऐसा माना जाता है कि रमतूला बजाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इसके पीछे तांत्रिक एवं वैज्ञानिक कारण भी बताए जाते हैं।

रमतूला का प्रयोग विभिन्न अवसरों पर किया जाता रहा है। पारंपरिक रूप से शादी-विवाह जैसे मांगलिक कार्यों में इसे बजाने की परंपरा रही है। किसी घर में शादी हो और माता पूजन के दौरान मृदंग के साथ रमतूला न बजे, तो वह विवाह समारोह अधूरा माना जाता था। शुभ और धार्मिक कार्यों की शुरुआत भी रमतूला बजाकर की जाती है। वीर बुंदेलों की धरती पर यह वाद्य युद्ध के समय रणभेरी के रूप में भी बजाया जाता था और शौर्य तथा पराक्रम का प्रतीक माना जाता था।

बुंदेलखंड के प्रसिद्ध दुलदुल घोड़ी नृत्य में भी रमतूला का विशेष महत्व है। इस नृत्य में कलाकार घोड़ी के आकार का पहनावा धारण करता है और रमतूला, तासे तथा ढपला की थाप पर नृत्य करता है। रमतूला की धुन इस नृत्य की शोभा बढ़ाती है और उसे जीवंत बना देती है।

आधुनिकता के दौर में बैंड-बाजे और डीजे के बढ़ते चलन के कारण रमतूला जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र कुछ समय के लिए विलुप्ति की कगार पर पहुँच गए थे और इनके कलाकार भी कम होने लगे थे। लेकिन अब धीरे-धीरे लोग अपनी पुरानी संस्कृति और परंपराओं की ओर लौट रहे हैं। डीजे के शोरगुल से ऊबकर लोग फिर से रमतूला और ढपली जैसे वाद्य यंत्रों को अपनाने लगे हैं। युवा पीढ़ी में भी इनके प्रति रुचि बढ़ रही है, जो इन वाद्य यंत्रों के साथ सेल्फी लेते और इसकी थाप पर थिरकते दिखाई देते हैं।

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छतरपुर जिले में जनपद सदस्य दुलीचंद्र बंशकार ऐसे उदाहरण हैं, जो बतौर जनप्रतिनिधि होने के बावजूद तीन पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को निभा रहे हैं। वे शादियों और सामाजिक कार्यक्रमों में रमतूला बजाकर न केवल अपनी संस्कृति को सहेज रहे हैं, बल्कि इससे होने वाली आय से अपने परिवार का भरण-पोषण भी कर रहे हैं। उनके परिवार का लगभग तीन सौ वर्षों से इस वाद्य यंत्र को बजाने का इतिहास रहा है।

लोक कलाएँ संस्कृति की अभिव्यक्ति हैं। कभी यह चित्रों और मूर्तियों में जीवंत होती हैं और कभी गीत-संगीत में मुखर होती हैं। बुंदेलखंड की निर्गुण लोक कलाएँ और पारम्परिक वाद्य यंत्र हमारी अमूल्य धरोहर हैं। यदि हम लोक कलाकारों और लोक कलाओं को एक मंच दे सकें और इनकी पौध बच्चों के मन में रोप सकें, तो कल यही पौधे विशाल वृक्ष बनेंगे।

लोकगीतों में न तो विषय की कमी है और न ही उनके कथ्य की। एक गीत की व्याख्या करने चलो तो हजारों पन्ने भी कम पड़ जाएंगे। लोक कला, लोक संगीत और लोकगीत अपनी माटी से माटी का मिलन करवाते हैं।

रमतूला केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की जीवंत संस्कृति और परंपरा की ध्वनि है। इसे संरक्षित करना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना इस अंचल की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने के समान है। यह वाद्य यंत्र आज भी बुंदेलखंड की मिट्टी की गंध और यहाँ के लोगों की आस्था को अपने स्वर में समेटे हुए है।