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पृथ्वी सूक्त में निहित पर्यावरण संतुलन का शाश्वत विज्ञान : पृथ्वी दिवस विशेष

आचार्य ललित मुनि

भारतीय दर्शन की नींव पर खड़ी हमारी सनातन परंपरा में प्रकृति को कभी अलग या बाहरी तत्व के रूप में नहीं देखा गया। उसे जीवन का आधार, शरीर का अंग और ब्रह्मांड की चेतना का विस्तार माना गया है। पंचमहाभूत अर्थात भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश इस दृष्टि के केंद्र में हैं। यही पाँच तत्व सृष्टि की रचना के मूल आधार हैं और मानव जीवन के प्रत्येक स्तर को प्रभावित करते हैं। पृथ्वी पर विद्यमान समस्त जैवविविधता, वन, वनस्पतियाँ, पशु पक्षी, सूक्ष्म जीव और सम्पूर्ण जीवन जगत आदि इन्हीं पंच तत्वों के संतुलन पर आधारित है।

जब भूमि उर्वर रहती है, जल शुद्ध रहता है, वायु स्वच्छ रहती है, अग्नि संतुलित रहती है और आकाश निर्मल रहता है, तब जैवविविधता सुरक्षित रहती है और जीवन की निरंतरता बनी रहती है। जब इन तत्वों का संतुलन बना रहता है, तब जीवन में स्वास्थ्य, समृद्धि और शांति का अनुभव होता है, परंतु असंतुलन की स्थिति में रोग, प्रदूषण, जल संकट, सूखा और अनेक प्राकृतिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। वर्तमान समय में जब जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संकट और जैवविविधता के क्षरण की चिंता बढ़ रही है, तब पंचमहाभूत का यह प्राचीन ज्ञान अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है।

भारतीय चिंतन परंपरा ने प्रकृति को जड़ नहीं, बल्कि चेतन और जीवनदायिनी शक्ति के रूप में स्वीकार किया है। हमारे ऋषियों ने यह अनुभव किया कि मनुष्य और प्रकृति परस्पर जुड़े हुए हैं और एक का संतुलन दूसरे को प्रभावित करता है। उपनिषदों का सिद्धांत यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे इसी सत्य को व्यक्त करता है कि जो कुछ इस ब्रह्मांड में विद्यमान है, वही मनुष्य के भीतर भी उपस्थित है। तैत्तिरीय उपनिषद में वर्णित सृष्टि क्रम के अनुसार आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। आयुर्वेद भी मानव शरीर को पंचमहाभूतों से निर्मित मानते हुए बताता है कि इन्हीं तत्वों से वात, पित्त और कफ का संतुलन बनता है, जो स्वास्थ्य का आधार है। इस प्रकार प्रकृति, जैवविविधता और मानव जीवन का संबंध केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि अनुभव और विज्ञान दोनों का विषय है।

पृथ्वी: माता और अस्तित्व का आधार

भारतीय परंपरा में पृथ्वी को केवल भूमि नहीं माना गया, बल्कि उसे माता के रूप में सम्मान दिया गया है। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में यह भाव अत्यंत स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ है-

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। (अथर्ववेद 12.1.12)

अर्थात् पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। यह मंत्र मनुष्य और प्रकृति के संबंध को अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य के रूप में प्रस्तुत करता है। जब हम पृथ्वी को माता मानते हैं, तो उसका शोषण नहीं, संरक्षण करते हैं। पृथ्वी सूक्त का एक अन्य मंत्र हमें यह बताता है कि पृथ्वी किन मूल्यों पर टिकी है-

सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। (अथर्ववेद 12.1.1)

अर्थात सत्य, प्राकृतिक नियम (ऋत), तप, ज्ञान और त्याग ही पृथ्वी को धारण करते हैं। यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल अग्निहोत्र नहीं, बल्कि त्याग और संतुलित उपयोग से है। आधुनिक भाषा में यही सतत विकास (Sustainable Development) है। ऋषियों ने पृथ्वी से संसाधन लेने के साथ उसके पुनर्भरण का भी संदेश दिया-

यत्ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु।
मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम्॥
(अथर्ववेद 12.1.35)

अर्थात हे पृथ्वी माता! मैं जो कुछ भी तुझसे प्राप्त करूँ, वह पुनः भर जाए और तेरे हृदय को आघात न पहुँचे। यह मंत्र हमें चेतावनी देता है कि विकास ऐसा हो जो प्रकृति को क्षति न पहुँचाए। प्रकृति की सुंदरता के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त की गई है-

गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तोऽरण्यं ते पृथिवि स्योनमस्तु। (अथर्ववेद 12.1.11)

अर्थात पर्वत, हिमालय और वन हमारे लिए सुखदायक हों। यह जैव विविधता संरक्षण का स्पष्ट संदेश है।

जल: जीवन का प्रवाह, संतुलन और संवेदनशीलता

जल को भारतीय परंपरा में अमृत कहा गया है, क्योंकि यह केवल जीवन को बनाए रखने वाला पदार्थ नहीं, बल्कि जीवन को पोषित करने वाली शक्ति है। जल केवल प्यास बुझाने का माध्यम नहीं, बल्कि सृष्टि की निरंतरता का आधार है। जब हम जल को देखते हैं, चाहे वह नदी के रूप में बह रहा हो, वर्षा की बूंदों के रूप में गिर रहा हो या समुद्र की लहरों में विस्तार पा रहा हो, तब यह अनुभव होता है कि जल में जीवन की धड़कन विद्यमान है। पृथ्वी पर जहाँ भी जल है, वहाँ जीवन की संभावना है। यही कारण है कि वैज्ञानिक भी अन्य ग्रहों पर जीवन की खोज करते समय सबसे पहले जल की उपस्थिति का संकेत खोजते हैं।

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मानव शरीर भी जल पर आधारित है। हमारे शरीर का लगभग दो तिहाई भाग जल से निर्मित है। रक्त, लसीका, कोशिकाओं का द्रव, पसीना और आँसू आदि सब जल के ही विभिन्न रूप हैं। आयुर्वेद में जल को शीतलता, स्निग्धता और संतुलन का प्रतीक माना गया है। जल शरीर के तापमान को संतुलित रखता है, पाचन प्रक्रिया को सहयोग देता है और विषैले तत्वों को बाहर निकालने में सहायक होता है। जब शरीर में जल संतुलित रहता है तो ऊर्जा बनी रहती है, त्वचा स्वस्थ रहती है और मन में स्थिरता अनुभव होती है।

भारतीय दर्शन में जल को शुद्धि का माध्यम माना गया है। स्नान, आचमन और जल अर्पण जैसी परंपराएँ केवल धार्मिक क्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि यह संकेत देती हैं कि जल बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार की शुद्धि का आधार है। जल मन को शांत करता है, शरीर को शीतलता देता है और चेतना को निर्मल बनाता है। किसी नदी के तट पर बैठकर जो शांति अनुभव होती है, वह केवल दृश्य सौंदर्य का प्रभाव नहीं, बल्कि जल तत्व की सूक्ष्म उपस्थिति का अनुभव भी है।

गणपति अथर्वशीर्ष में पंचमहाभूतों की एकता को इस प्रकार व्यक्त किया गया है-

त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः।

अर्थात हे परम तत्व! तुम ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। यह मंत्र हमें बताता है कि जल सहित सभी तत्व एक ही चेतना के विविध रूप हैं। जल केवल भौतिक तत्व नहीं, बल्कि जीवन की एकात्मता का प्रतीक है।

जल का स्वभाव प्रवाह है। वह रुकता नहीं, ठहरता नहीं, बल्कि निरंतर गतिशील रहता है। यही प्रवाह जीवन का भी संदेश है। जब जल बहता है, तो वह स्वच्छ बना रहता है; जब वह रुक जाता है, तो उसमें अशुद्धियाँ बढ़ने लगती हैं। यह सिद्धांत केवल प्रकृति पर ही नहीं, बल्कि मानव जीवन पर भी लागू होता है। जीवन में संतुलित गति और लचीलापन आवश्यक है।

प्रकृति में जल चक्र सृष्टि के संतुलन का अद्भुत उदाहरण है। समुद्र से वाष्प बनकर उठने वाला जल बादलों में परिवर्तित होता है, वर्षा के रूप में धरती पर गिरता है और नदियों के माध्यम से पुनः समुद्र तक पहुँच जाता है। यह चक्र हमें सिखाता है कि प्रकृति में प्रत्येक प्रक्रिया परस्पर जुड़ी हुई है। यदि इस चक्र में असंतुलन उत्पन्न हो, तो सूखा, बाढ़ और जल संकट जैसी समस्याएँ सामने आती हैं।

आज नदियों का प्रदूषण, भूजल का अत्यधिक दोहन और जलवायु परिवर्तन हमें यह चेतावनी दे रहे हैं कि जल तत्व का संतुलन बिगड़ रहा है। औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक और रासायनिक पदार्थ जल स्रोतों को प्रभावित कर रहे हैं। अनेक नदियाँ, जो कभी सभ्यता की धुरी थीं, अब संरक्षण की प्रतीक्षा कर रही हैं। यदि जल का संतुलन नहीं रहेगा, तो जीवन का संतुलन भी प्रभावित होगा।

भारतीय परंपरा में जल संरक्षण के अनेक वैज्ञानिक उपाय विकसित किए गए थे। कुएँ, बावड़ियाँ, तालाब और सरोवर केवल जल संचयन के साधन नहीं थे, बल्कि सामाजिक जीवन के केंद्र भी थे। वर्षा जल संचयन प्रकृति के चक्र के साथ सामंजस्य स्थापित करने का एक व्यावहारिक तरीका था। आज आवश्यकता है कि इन परंपरागत ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर जल संरक्षण को जीवन शैली का हिस्सा बनाया जाए।

जल हमें विनम्रता और धैर्य का संदेश भी देता है। वह नीचे की ओर बहता है, सभी को तृप्त करता है और बिना किसी अपेक्षा के अपना योगदान देता है। वह कठोर चट्टानों को भी समय के साथ आकार दे देता है, परंतु बिना कठोर हुए। यह हमें सिखाता है कि निरंतरता और संतुलन से ही स्थायी परिवर्तन संभव है।

आयुर्वेद के अनुसार जल तत्व भावनाओं से भी जुड़ा है। संतुलित जल मन में शांति, करुणा और संवेदनशीलता का भाव उत्पन्न करता है। यही कारण है कि जल के निकट रहने से मानसिक तनाव कम होता है और मन में सहजता आती है।

जल हमें यह सिखाता है कि जीवन का सार संतुलन, प्रवाह और शुद्धता में है। जिस प्रकार जल सम्पूर्ण सृष्टि को जोड़ता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहिए। जब जल शुद्ध और संतुलित रहेगा, तभी जीवन भी संतुलित और सुरक्षित रहेगा।

अग्नि: ऊर्जा, प्रकाश और परिवर्तन 

अग्नि को वैदिक परंपरा में देवताओं का मुख कहा गया है। इसका अर्थ केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक गहरा दार्शनिक संकेत है कि अग्नि मनुष्य और प्रकृति के बीच सेतु का कार्य करती है। यज्ञ की अग्नि में आहुति अर्पित करते समय यह विश्वास किया गया कि अग्नि उस अर्पण को सूक्ष्म रूप में परिवर्तित कर समस्त सृष्टि तक पहुंचाती है। अग्नि परिवर्तन की शक्ति है, जो जड़ को गतिशील और कच्चे को परिपक्व बनाती है। इसी कारण अग्नि को शुद्धि, ऊर्जा और नवसृजन का प्रतीक माना गया है।

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सूर्य को अग्नि का सर्वोच्च रूप माना गया है। सूर्य की ऊर्जा के बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं। वनस्पतियाँ सूर्य के प्रकाश से प्रकाश संश्लेषण करती हैं और यही प्रक्रिया सम्पूर्ण खाद्य शृंखला का आधार बनती है। मानव शरीर में अग्नि तत्व पाचन शक्ति के रूप में कार्य करता है, जिसे आयुर्वेद में जठराग्नि कहा गया है। जठराग्नि संतुलित रहे तो शरीर स्वस्थ रहता है, क्योंकि यही भोजन को ऊर्जा में परिवर्तित करती है। अग्नि केवल भौतिक ऊर्जा नहीं, बल्कि मानसिक स्पष्टता और निर्णय शक्ति का भी प्रतीक है।

अग्नि हमें यह सिखाती है कि ऊर्जा का उपयोग संतुलित और जिम्मेदारीपूर्ण होना चाहिए। यदि ऊर्जा का दुरुपयोग होगा तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा। आज बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन इसी असंतुलित ऊर्जा उपयोग के परिणाम हैं। संतुलित अग्नि सृजन करती है, असंतुलित अग्नि विनाश का कारण बनती है। इसलिए अग्नि हमें संयम, जागरूकता और उत्तरदायित्व का संदेश देती है।

वायु: प्राण और जीवन की गति 

वायु प्राण का आधार है। मनुष्य भोजन के बिना कुछ दिन जीवित रह सकता है, जल के बिना भी कुछ समय तक रह सकता है, किंतु वायु के बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं। श्वास ही जीवन की पहली और अंतिम क्रिया है। जन्म लेते ही शिशु श्वास लेता है और जीवन के अंतिम क्षण तक श्वास का प्रवाह बना रहता है। इस दृष्टि से वायु केवल एक प्राकृतिक तत्व नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता का मूल आधार है।

भारतीय दर्शन में वायु को प्राण कहा गया है। प्राण वह जीवन ऊर्जा है, जो शरीर की प्रत्येक कोशिका को सक्रिय रखती है। योग में प्राणायाम वायु तत्व को संतुलित करने का महत्वपूर्ण साधन है। नियंत्रित और लयबद्ध श्वास से शरीर में ऊर्जा का संतुलन बना रहता है तथा मन में शांति का अनुभव होता है। आयुर्वेद के अनुसार वायु तत्व से वात दोष का निर्माण होता है, जो शरीर की गति, तंत्रिका तंत्र और संचार क्रियाओं को नियंत्रित करता है।

अथर्ववेद में वायु को शुद्धि और जीवन शक्ति का प्रतीक माना गया है। शुद्ध वायु शरीर और मन दोनों को स्वस्थ रखती है। वृक्षों, वनों और प्राकृतिक वातावरण की उपस्थिति वायु को शुद्ध बनाए रखती है। आज वायु प्रदूषण मानव जीवन के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है, जो यह संकेत देता है कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। वायु हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में लय और संतुलन आवश्यक है, क्योंकि संतुलित श्वास ही स्वस्थ जीवन का संकेत है।

आकाश: व्यापकता और चेतना

आकाश सबसे सूक्ष्म तत्व है। यह दृश्य नहीं होता, फिर भी सब कुछ उसी में स्थित है। भारतीय दर्शन में आकाश को केवल भौतिक शून्य नहीं माना गया, बल्कि उसे चेतना का प्रतीक समझा गया है। ध्वनि का उद्गम आकाश से माना गया है, क्योंकि ध्वनि को प्रसारित होने के लिए स्थान चाहिए। हमारे शब्द, हमारी वाणी और हमारे विचार, सब किसी न किसी रूप में आकाश से जुड़े हैं। शरीर में भी अनेक रिक्त स्थान, जैसे मुख, नासिका, कर्ण, हृदय और कोशिकाओं के बीच की सूक्ष्म जगह, आकाश तत्व की उपस्थिति को दर्शाते हैं।

आकाश हमें विस्तार का बोध कराता है। जब हम खुले आकाश को देखते हैं, तो मन स्वतः ही सीमाओं से मुक्त होने लगता है। यही कारण है कि ध्यान की अवस्था में मन को आकाश के समान व्यापक और शांत बनाने की बात कही जाती है। जिस प्रकार आकाश में बादल आते हैं और चले जाते हैं, उसी प्रकार मन में विचार आते हैं और चले जाते हैं। आकाश स्वयं कभी विचलित नहीं होता, वह सबको स्थान देता है, सबको धारण करता है, पर किसी से बंधता नहीं। यही स्थिति मन की आदर्श अवस्था मानी गई है, जहाँ व्यक्ति विचारों, इच्छाओं और परिस्थितियों से प्रभावित तो होता है, पर उनमें उलझता नहीं।

उपनिषदों में आकाश को ब्रह्म का निकटतम प्रतीक माना गया है, क्योंकि वह अनंत है, सर्वव्यापी है और सबको समाहित करने की क्षमता रखता है। आकाश का गुण शब्द बताया गया है, और शब्द ज्ञान का माध्यम है। इसी कारण भारतीय परंपरा में मंत्रों और ध्वनि की इतनी महत्ता है। मंत्रों का उच्चारण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि चेतना को परिष्कृत करने की प्रक्रिया भी है। जब मंत्रों का उच्चारण होता है, तो उसकी ध्वनि तरंगें वातावरण और मन दोनों पर प्रभाव डालती हैं।

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शांति पाठ में सम्पूर्ण सृष्टि के संतुलन की कामना की गई है-

द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।

अर्थात आकाश, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल और औषधियाँ सभी शांत और संतुलित रहें। यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक समग्र दृष्टिकोण है, जिसमें सम्पूर्ण प्रकृति के संतुलन को आवश्यक माना गया है। यहाँ “द्यौः” का अर्थ ऊर्ध्व लोक या आकाश से है, “अन्तरिक्ष” मध्य क्षेत्र का प्रतीक है और “पृथ्वी” स्थूल जगत का। जल और औषधियाँ जीवन की निरंतरता का आधार हैं। जब इन सभी में संतुलन बना रहता है, तभी जीवन संभव होता है।

इस मंत्र का गहरा अर्थ यह भी है कि प्रकृति के किसी एक तत्व में असंतुलन होने पर उसका प्रभाव सम्पूर्ण सृष्टि पर पड़ता है। यदि आकाश प्रदूषित होगा, तो वायु प्रभावित होगी; वायु प्रभावित होगी तो जल चक्र बदलेगा; जल असंतुलित होगा तो पृथ्वी की उर्वरता कम होगी; और जब पृथ्वी असंतुलित होगी तो वनस्पतियाँ और औषधियाँ भी प्रभावित होंगी। इस प्रकार यह शांति पाठ हमें परस्पर निर्भरता का संदेश देता है।

संतुलन ही जीवन का सत्य

पंचमहाभूत हमें सिखाते हैं कि प्रकृति का संतुलन ही जीवन का संतुलन है। भूमि जल को धारण करती है, जल अग्नि को संतुलित करता है, अग्नि वायु को प्रभावित करती है और वायु आकाश में प्रवाहित होती है। यह परस्पर संबंध ही सृष्टि को संचालित करता है।

आज जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, सूखा, बाढ़ और महामारी जैसे संकट हमें यह संकेत दे रहे हैं कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। भारतीय दर्शन हमें समाधान भी देता है संतुलित जीवन शैली, संयमित उपभोग और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता।

छोटे-छोटे प्रयास जैसे वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, योग और प्राकृतिक जीवन शैली आदि पंचमहाभूत के संतुलन को बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं।

आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता

आज पूरा विश्व सतत विकास की बात कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक कार्यक्रम चला रहा है। आश्चर्य होता है कि भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही यह संदेश दे दिया था। भारतीय दर्शन कहता है-

“सर्वं खल्विदं ब्रह्म”

अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि दिव्य है। यदि हम प्रकृति को सम्मान देंगे, तो प्रकृति हमें जीवन देगी। पृथ्वी सूक्त के मंत्र आज भी हमें पुकारते हैं,  माता भूमि की रक्षा करो, जल को शुद्ध रखो, वायु को स्वच्छ रखो, अग्नि का संतुलित उपयोग करो और आकाश की व्यापकता को अनुभव करो। मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि संरक्षक है। प्रकृति के साथ सामंजस्य ही मानवता का भविष्य सुरक्षित रख सकता है। इस तरह पृथ्वी सूक्त की कृतज्ञता हमें आज भी प्रेरित करती है: माता को चोट न पहुँचाओ, उसे नमन करो, उसके साथ जीओ।

आज जब पूरी दुनिया पृथ्वी दिवस के माध्यम से प्रकृति संरक्षण का संकल्प दोहराती है, तब भारतीय दर्शन का पंचमहाभूत सिद्धांत हमें गहराई से यह स्मरण कराता है कि पृथ्वी केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि जीवन का आधार, जैवविविधता का आश्रय और समस्त सृष्टि का पोषण करने वाली माता है। पृथ्वी पर विद्यमान वन, नदियाँ, पर्वत, वनस्पतियाँ, जीव जंतु और सूक्ष्म जीव सभी पंचमहाभूत के संतुलन से ही अस्तित्व में हैं। जब भूमि उर्वर रहती है, जल शुद्ध रहता है, वायु स्वच्छ रहती है, अग्नि संतुलित रहती है और आकाश निर्मल रहता है, तभी जैवविविधता सुरक्षित रहती है और जीवन का चक्र सुचारु रूप से चलता है।

अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि संरक्षक है। यदि हम जल का संरक्षण करें, वृक्ष लगाएं, मिट्टी को प्रदूषण से बचाएं, ऊर्जा का संयमित उपयोग करें और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव रखें, तो यही पृथ्वी दिवस का सच्चा पालन होगा। पंचमहाभूत का संतुलन ही जैवविविधता की सुरक्षा का आधार है और जैवविविधता का संरक्षण ही मानव सभ्यता के भविष्य की रक्षा है। प्रकृति के साथ सामंजस्य ही वह मार्ग है, जो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित, संतुलित और समृद्ध पृथ्वी प्रदान कर सकता है।