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दलित समाज और महिला शिक्षा के संबल बने ज्योतिबा फुले

उमेश चौरसिया

महात्मा ज्योतिबा गोविन्दराव फुले 19वीं सदी के महान समाज सुधारक, दलित उद्धारक, स्त्री शिक्षा के जनक, समाजसेवी, लेखक और दार्शनिक थे । उन्होंने कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने और समाज में समरसता स्थापित करने के प्रति अपना जीवन समर्पित कर दिया।

11 अप्रेल 1927 को पुणे में जन्मे ज्योतिबा की औपचारिक शिक्षा तो कट्टरपंथियों द्वारा जातिगत विरोध के कारण मिशनरी स्कूल से निकाल दिये जाने से छूट गयी।

किंतु बचपन से उनके मन में शिक्षा के प्रसार की ललक जाग गयी। उन्होंने समाज में स्त्री को भी पढने का अधिकार दिलाने के लिए 1848 मात्र 20 वर्ष की आयु में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्वदेशी स्कूल खोला और वहां उनकी पत्नि सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं ।

कतिपय रूढ़िवादियों को यह स्वीकार नहीं हुआ, वे सावित्रीबाई पर पत्थर, गोबर फेंकते। उनके बहकावे में आकर पिता ने भी घर से निकाल दिया, 1949 में स्कूल भी बंद हो गया । तब भी उन्होंने हार नहीं मानी और 1950 में फिर से स्कूल शुरू किया 1952 तक दलित स्त्रियों के लिए 16 विद्यालय चलने लगे ।

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उस समय निचली जाति के साथ अछूत सा व्यवहार होता था । होज व कुंए पर जाने नहीं दिया जाता था। तब ज्योतिबा ने अपने घर का होज सबके लिए खोल दिया और नगरपालिका सदस्य होने के नाते सार्वजनिक स्थानों पर भी होज बनवाए।

24 सितंबर 1873 को उन्होंने दलित व शोषित वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ‘सत्य शोधक समाज’ की स्थापना कर शिक्षा के द्वारा सामाजिक कुप्रथाओ को दूर करने में महती योगदान दिया ।

विधवा स्त्रियों के सुखमय जीवन के लिए 1866 में विष्णु शास्त्री के सहयोग से ‘विधवा विवाह समितियों’ का गठन किया तथा सावित्रीबाई के संयोजन में विधवा आश्रम भी शुरू किया ।

नगर पालिका सदस्य रहते हुए अपव्यय की रोकथाम, शराब की दुकानें बढ़ाने का विरोध, कम वेतन पर अधिक युवाओं को रोजगार देने की व्यवस्था, कचरे के निस्तारण की उपयुक्त व्यवस्था तथा मिल मजदूरों की समस्याओं के निराकरण जैसे कई लोकहित कार्य किये।

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1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बैलगाड़ियों पर फेरी निकालकर अनेक भागों में स्वाधीनता की अलख जगायी तथा 1874 में किसान विद्रोह का सक्रिय समर्थन भी किया।

11 मई 1888 को बम्बई में हुए भव्य समारोह में उन्हें महात्मा की उपाधि से सम्मानित किया गया। ज्योतिबा ने नौ से अधिक पुस्तकों की रचना की जिनमें गंलाग मिरी, चेतावनी, सत्सार, अछूतों की कैफियत आदि प्रमुख हैं, उनकी काव्य रचनाएं भी लोकप्रिय रहीं ।