छत्तीसगढ़ी साहित्य के नए फूलों और शाखाओं के रचयिता डॉ. बलदेव – एक बातचीत
(जयप्रकाश मानस से शोधार्थी बिमला नायक की बातचीत)
बिमला नायक: प्रश्न – छत्तीसगढ़ी में समीक्षा (आलोचना) का आरंभ किस स्वरूप में हुआ ?
जयप्रकाश मानस: छत्तीसगढ़ी साहित्य में समीक्षा (आलोचना) का आरंभ और विकास हिंदी साहित्य की तुलना में अपेक्षाकृत देर से हुआ। इसकी शुरुआत 20वीं सदी के मध्य में मानी जा सकती है, जब छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखित साहित्य का विकास होने लगा। प्रारंभ में छत्तीसगढ़ी समीक्षा का स्वरूप मुख्य रूप से लोक साहित्य और मौखिक परंपराओं के विश्लेषण तक सीमित था, जिसमें लोकगीतों, लोककथाओं और क्षेत्रीय सांस्कृतिक रचनाओं का मूल्यांकन किया जाता था।
प्रारंभिक काल (20वीं सदी का मध्य) :
छत्तीसगढ़ी में समीक्षा का औपचारिक आरंभ 20वीं सदी के मध्य में हुआ, जब छत्तीसगढ़ी साहित्य को लिखित रूप में संरक्षित करने और उसका विश्लेषण करने की कोशिश शुरू हुई। इस समय तक छत्तीसगढ़ी साहित्य मुख्य रूप से मौखिक परंपराओं, जैसे पंडवानी, नाचा, और लोकगीतों के रूप में प्रचलित था।
समीक्षा का प्रारंभिक स्वरूप पुस्तक परिचय और रचनाओं की सरल व्याख्या के रूप में था। इस दौर में समीक्षा मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ी रचनाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक महत्व को रेखांकित करने पर केंद्रित थी।
लोकनाट्य और काव्य की समीक्षा को प्रोत्साहन मिला, विशेष रूप से छत्तीसगढ़ी नाटकों और कविताओं के संदर्भ में। उदाहरण के लिए, हबीब तनवीर जैसे साहित्यकारों ने नाचा जैसे लोकनाट्यों की समीक्षा और विश्लेषण को बढ़ावा दिया।
2. प्रमुख साहित्यकारों का योगदानः
डॉ. नरेंद्र देव वर्मा, डॉ. बल्देव, डॉ. नंदकिशीर तिवारी, डॉ. चित्तरंजन कर, डॉ. विनय कुमार पाठक जैसे लेखकों ने छत्तीसगढ़ी साहित्य की समीक्षा को व्यवस्थित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्होंने छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य और लिखित रचनाओं के सौंदर्यशास्त्र और सामाजिक संदर्भों पर लेखन किया। इसमें डॉ. बल्देव सर्वोपरि ठहरते हैं, जिन्होंने सच्चे अर्थों में छत्तीसगढ़ी साहित्य में प्रकाशित शताधिक कृतियों की भूमिका के बहाने छत्तीसगढ़ के सौंदर्य को परखने का काम किया है। पाँचवे-छठवें दशक के पश्चात उन्होंने छत्तीसगढी भाषा की विविध विधाओं को परखने का प्रारंभिक प्रतिमानों को गढ़ा है कहें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो छत्तीसगढ़ी में ऐसी कृतियाँ कम ही हैं जिनकी परख और समीक्षात्मक टिप्पणी भूमिका डॉ. बल्देव जी की न हो ।पत्र-पत्रिकाओं का योगदान: 20वीं सदी के उत्तरार्ध में छत्तीसगढ़ी पत्रिकाओं, ने
समीक्षा को बढ़ावा दिया। इनमें रचनाओं के गुण-दोष और सांस्कृतिक महत्व पर चर्चा होती थी।
लोकमंगल की भावना हिंदी साहित्य की तरह छत्तीसगढ़ी समीक्षा में भी लोकमंगल की भावना प्रमुख थी। समीक्षक रचनाओं को सामाजिक उपयोगिता और नैतिकता के आधार पर परखते थे।
3. विकास और आधुनिक स्वरूपः
20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी की शुरुआत में छत्तीसगढ़ी साहित्य में समीक्षा का स्वरूप अधिक परिष्कृत हुआ। इस दौरान सैद्धांतिक और व्यावहारिक समीक्षा दोनों का विकास हुआ।
सैद्धांतिक समीक्षा में छत्तीसगढ़ी साहित्य के रस, छंद, और अलंकार जैसे तत्वों का विश्लेषण शुरू हुआ, जो संस्कृत और हिंदी काव्यशास्त्र से प्रभावित था।
व्यावहारिक समीक्षा में कवियों और लेखकों की रचनाओं का गहन विश्लेषण किया जाने लगा।
आधुनिक छत्तीसगढ़ी समीक्षा में मार्क्सवादी और प्रगतिशील विचारधाराओं का प्रभाव भी देखा गया, विशेष रूप से सामाजिक परिवर्तन और जनकल्याण पर केंद्रित रचनाओं के मूल्यांकन में।
4. विशिष्ट विशेषताएं:
छत्तीसगढ़ी समीक्षा का स्वरूप प्रारंभ में लोक-केंद्रित और सरल था, जो क्षेत्रीय संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़ा था।
समीक्षा में छत्तीसगढ़ी भाषा की शब्दावली, मुहावरों और स्थानीय संदर्भों का उपयोग प्रमुख रहा।
समीक्षा का उद्देश्य न केवल रचनाओं के सौंदर्यबोध को उजागर करना था, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति को संरक्षित और प्रचारित करना भी था।
छत्तीसगढ़ी में समीक्षा का आरंभ 20वीं सदी के मध्य में हुआ, जो मुख्य रूप से लोक साहित्य और मौखिक परंपराओं के विश्लेषण के रूप में शुरू हुआ। इसका स्वरूप प्रारंभ में पुस्तक परिचय और सरल व्याख्या तक सीमित था, लेकिन बाद में सैद्धांतिक और व्यावहारिक समीक्षा के रूप में विकसित हुआ। पत्र-पत्रिकाओं, विद्वानों और लोकमंगल की भावना ने इसे समृद्ध किया। आज छत्तीसगढ़ी समीक्षा भाषा, संस्कृति और साहित्य के संरक्षण के साथ-साथ आधुनिक साहित्यिक मानदंडों के आधार पर रचनाओं का मूल्यांकन करती है।
बिमला नायक: प्रश्न डॉ. बलदेव को आप किस कोटि के समीक्षकों में पाते हैं ?
जयप्रकाश मानस : – डॉ. बलदेव छत्तीसगढ़ी साहित्य के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं, जिनकी समीक्षात्मक दृष्टि ने इस क्षेत्र को समृद्ध किया है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी और हिंदी साहित्य दोनों में लेखन किया और उनकी रचनाओं में सहजता, बिंबों और प्रतीकों का सुंदर प्रयोग मिलता है।
उनकी समीक्षात्मक दृष्टि न केवल साहित्य के स्वरूप और शिल्प को समझने में सहायक है, बल्कि छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान है ।
डॉ. बलदेव की समीक्षात्मक दृष्टि की मुख्य बातें को मैं निम्नांकित प्रारूपों में देखनाv चाहता हूँ।
साहित्यिक विधाओं का पोषण : डॉ. बलदेव ने गीत, कहानी, निबंध, आलेख और आलोचनात्मक लेखों के माध्यम से साहित्य की विभिन्न विधाओं को विकसित किया।
नवसृजित रचनाकारों को प्रेरणा उनकी प्रतिभा ने नए रचनाकारों को प्रेरित किया और उन्हें साहित्य की ओर आकर्षित किया।
शिल्प और भाषा का सहज प्रयोग उनकी रचनाओं में भाषा की सहजता, बिंबों और
प्रतीकों का सुंदर प्रयोग मिलता है, जो पाठकों को आसानी से समझ में आता है।
छत्तीसगढ़ी साहित्य का ‘धारनखंभा’ : उन्हें छत्तीसगढ़ी साहित्य का ‘धारनखंभा’ कहा जाता
है, जो इस साहित्य के विकास में उनके महत्वपूर्ण योगदान को दर्शाता है।
तुलनात्मक अध्ययन : उनकी समीक्षात्मक दृष्टि विविध रचनाकारों और समालोचकों के
कार्यों के तुलनात्मक अध्ययन में भी सहायक है।
साहित्य और समाज का संबंध डॉ. बलदेव साहित्य को समाज का आईना मानते थे और उनका मानना था कि साहित्य समाज को आईना दिखाता है।
सांस्कृतिक चेतना : उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ की आंचलिक संस्कृति और लोककथाओं का प्रभाव भी दिखाई देता है।
समग्र रूप से कहें तो डॉ. बलदेव की समीक्षात्मक दृष्टि ने छत्तीसगढ़ी साहित्य को न केवल समृद्ध किया है, बल्कि इसे एक नई पहचान भी दी है। उनकी रचनाएं और विचार आज भी छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
बिमला नायक: प्रश्न – छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल जैसे अविस्मरणीय कार्य के प्रति आपका क्या मत है?
जयप्रकाश मानस – डॉ. बलदेव कोई साधारण नाम नहीं थे, वे तो जैसे एक पूरा आकाश थे, जिसमें साहित्य के तारे टिमटिमाते थे। उनके भीतर गंभीरता थी, लेकिन वह ऐसी गंभीरता थी जो किताबों के पन्नों में साँस लेती थी, और उनके सीमित साधनों के बीच से छत्तीसगढ़ का साहित्य, इतिहास और संस्कृति जैसे फूलों की तरह खिल उठे। उनके पास हिंदी साहित्य का ऐसा खजाना था, जो न खत्म होने वाला था, न थकने वाला। छत्तीसगढ़ के इतिहास-भूगोल, साहित्य और संस्कृति को उन्होंने इस तरह जाना, जैसे कोई नदी अपने किनारों को जानती है-हर मोड़, हर गहराई, हर लहर।
नए साहित्यकार उनके पास चले आते थे, जैसे प्यासे पक्षी पानी की तलाश में। डॉ. बलदेव उन्हें देखते, सुनते, और फिर कुछ ऐसा कहते कि उनके शब्दों में प्रोत्साहन की बारिश हो जाती। छत्तीसगढ़ में साहित्य की खेती उन्होंने ऐसी की, जैसे कोई किसान धान के खेतों में मेहनत करता है-प्यार से, धैर्य से, और विश्वास से। प्राचीन और समकालीन साहित्यकारों पर उन्होंने लिखा, खोजा, और उनके बारे में ऐसी बातें बताईं, जो पहले किसी ने नहीं देखी थीं।
उनके विरोधी भी उनके कलम की उदारता से नहीं बच सके। कई साहित्यकार तो उनकी लिखी भूमिकाओं और समीक्षाओं की रोशनी में ही चमक उठे, जैसे तारे जो चाँद की रोशनी में जगमगाते हैं।
“छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल” उनका वह ग्रंथ है, जो समय के साथ नहीं मिटेगा। वह किताब नहीं, एक दीया है, जो विद्वानों और शोधकर्ताओं के रास्ते को रोशन करता रहेगा। गुरु घासीदास पर उनकी कलम ने एक ऐसा ग्रंथ रचा, जो जैसे पत्थर पर लिखा गया हो-प्रामाणिक, अटल, और हर शब्द में सच्चाई।
‘छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल’ एक सांस्कृतिक स्मृति है। एक अनमोल धरोहर । जब कोई किताब केवल किताब नहीं रहती, बल्कि एक संस्कृति की स्मृति, एक भाषा की साँस, और एक समाज की धड़कन बन जाती है, तब वह ग्रंथ कहलाती है। “छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल”, जो सन् 2011 में वैभव प्रकाशन, रायपुर से प्रकाशित हुई, ऐसी ही एक अनमोल कृति है। यह किताब, जो लगभग साढ़े पाँच सौ पृष्ठों में सिमटी है, छत्तीसगढ़ी कविता के सौ वर्षों की यात्रा को अपने भीतर समेटे हुए है। इसमें 182 कवियों की प्रतिनिधि रचनाएँ हैं, और प्रत्येक कवि का संक्षिप्त परिचय एक ऐसी खिड़की खोलता है, जहाँ से उनकी रचनाओं का संसार और उसका समय दिखाई देता है।
इस कृति को संपादित करना, जैसे किसी विशाल वन में हर पेड़ की डाल, हर पत्ते की हरियाली, और हर फूल की सुगंध को एक साथ सहेजना हो। 182 कवियों की रचनाओं को उनके परिचय के साथ संकलित करना कोई साधारण कार्य नहीं। यह एक ऐसा प्रयास है, जो छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के प्रति गहरे प्रेम और समर्पण की माँग करता है। संपादक बल्देव ने इसे न केवल संभव बनाया, बल्कि इसे एक मनभावन स्वरूप भी दिया। कविताओं को अलग-अलग कालखंडों और भावों के आधार पर सुंदर अध्याय-शीर्षकों में बाँटा गया है-
विरासत, सुरता के चंदन बन, गीत-गजल, मुक्त छंद के नवा, समकालीन कविता, अक्षत दबी, हरियर डारा, और उल्हवा पाना। ये शीर्षक स्वयं में काव्यात्मक हैं, जैसे कोई नदी अपनी धाराओं को अलग-अलग नाम दे रही हो, पर सब एक ही स्रोत से निकलती हों।
यह किताब केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की माटी, उसकी लोकसंस्कृति, और उसकी भाषा की आत्मा का दस्तावेज है। यहाँ हर कविता एक कहानी कहती है-कभी खेतों की हरियाली की, कभी गाँव की चौपाल की, तो कभी मन के भीतर उमड़ते भावों की। यह ग्रंथ छत्तीसगढ़ी साहित्य के उस वृक्ष की तरह है, जिसकी जड़ें गहरे अतीत में हैं, और शाखाएँ समकालीनता को छूती हैं। इसे पढ़ना, जैसे किसी लंबी यात्रा पर निकलना हो, जहाँ हर पन्ने पर एक नया गाँव, नया चेहरा, और नई कहानी मिलती है।
सन् 2013 में वैभव प्रकाशन, रायपुर से प्रकाशित “छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि” एक ऐसी कृति है, जो छत्तीसगढ़ी साहित्य की समीक्षा को नई गहराई और दृष्टि देती है। 242 पृष्ठों की इस किताब में डॉ. बल्देव के वे समीक्षात्मक लेख संकलित हैं, जो पहले लोकाक्षर और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके थे। यह किताब कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि उन कविताओं की आत्मा को समझने की कोशिश है। यह उन कवियों की रचनाओं का विश्लेषण है, जिन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा को अपनी साधना से सजाया और संवारा।
डॉ. बल्देव की समीक्षा में एक खास तरह की संवेदना है-वह संवेदना, जो कविता के शब्दों को केवल शब्द नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव मानती है। उनके लेख छत्तीसगढ़ी कविता के सौंदर्य, उसकी भाषिक समृद्धि, और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को उजागर करते हैं। यह किताब, जैसे किसी पुराने दोस्त की तरह, आपको कविता के पास ले जाती है और कहती है-देखो, यह शब्द कितना कुछ कहता है, और यह मौन कितना कुछ छिपाता है।
इस कृति में समीक्षा केवल आलोचना नहीं, बल्कि एक सृजनात्मक प्रक्रिया है। यहाँ कविता के रस, छंद, और भावों का विश्लेषण तो है ही, साथ ही छत्तीसगढ़ी भाषा की वह आत्मा भी है, जो गाँव की माटी, खेतों की हरियाली, और लोकगीतों की लय में बस्ती है। डॉ. बल्देव ने कवियों की रचनाओं को न केवल परखा, बल्कि उन्हें एक नए संदर्भ में रखकर देखा, जैसे कोई माली पौधों को नई मिट्टी में रोपता हो।
ये दोनों कृतियाँ-“छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल” और “छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि”-छत्तीसगढ़ी साहित्य की ऐसी धरोहर हैं, जो न केवल साहित्यकारों, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो इस भाषा और संस्कृति से जुड़ा है। पहली कृति एक विशाल संग्रह है, जो छत्तीसगढ़ी कविता के सौ वर्षों की सैर कराती है, तो दूसरी कृति उस सैर को गहराई देती है, उसे समझने का एक नया नजरिया देती है।
ये किताबें उस नदी की तरह हैं, जो गाँव के किनारे बहती है-कभी शांत, कभी उफनती, पर हमेशा अपने साथ कुछ नया ले आती। इनमें छत्तीसगढ़ की माटी की सौंधी खुशबू है, लोकगीतों की लय है, और उन कवियों की आवाज़ है, जो अपनी भाषा में दुनिया को देखते हैं। इन्हें पढ़ना, जैसे किसी पुराने घर की चौखट पर बैठकर स्मृतियों को टटोलना हो-वहाँ सब कुछ अपना-सा लगता है, फिर भी हर बार कुछ नया मिलता है।
बिमला नायक: प्रश्न – छत्तीसगढ़ी समीक्षा को डॉ. बल्देव के प्रदेय के संबंध में आपका क्या मत है ? छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि को आप किस तरह पाते हैं ?
जयप्रकाश मानस – जैसा कि हम आगे चर्चा कर चुके हैं डॉ. बल्देव का छत्तीसगढ़ी साहित्य की समीक्षा के क्षेत्र में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी है। उनकी कृतियाँ, विशेष रूप से “छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल” (2011) और “छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि” (2013), छत्तीसगढ़ी साहित्य को व्यवस्थित, सैद्धांतिक और विश्लेषणात्मक आधार प्रदान करने में मील का पत्थर साबित हुई हैं। यह कार्य केवल संकलन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति की स्मृति को जीवित रखने का एक सांस्कृतिक प्रयास है। प्रत्येक कवि का संक्षिप्त परिचय शामिल करना उनकी दूरदृष्टि को दर्शाता है, क्योंकि यह न केवल रचनाओं को संदर्भ देता है, बल्कि कवियों के व्यक्तित्व और उनके समय को भी जीवंत करता है। यह छत्तीसगढ़ी समीक्षा को ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में “छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ
उन कविताओं की आत्मा को समझने की कोशिश है। यह उन कवियों की रचनाओं का विश्लेषण है, जिन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा को अपनी साधना से सजाया और संवारा।
डॉ. बल्देव की समीक्षा में एक खास तरह की संवेदना है-वह संवेदना, जो कविता के शब्दों को केवल शब्द नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव मानती है। उनके लेख छत्तीसगढ़ी कविता के सौंदर्य, उसकी भाषिक समृद्धि, और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को उजागर करते हैं। यह किताब, जैसे किसी पुराने दोस्त की तरह, आपको कविता के पास ले जाती है और कहती है-देखो, यह शब्द कितना कुछ कहता है, और यह मौन कितना कुछ छिपाता है।
इस कृति में समीक्षा केवल आलोचना नहीं, बल्कि एक सृजनात्मक प्रक्रिया है। यहाँ कविता के रस, छंद, और भावों का विश्लेषण तो है ही, साथ ही छत्तीसगढ़ी भाषा की वह आत्मा भी है, जो गाँव की माटी, खेतों की हरियाली, और लोकगीतों की लय में बस्ती है। डॉ. बल्देव ने कवियों की रचनाओं को न केवल परखा, बल्कि उन्हें एक नए संदर्भ में रखकर देखा, जैसे कोई माली पौधों को नई मिट्टी में रोपता हो।
ये दोनों कृतियाँ-“छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल” और “छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि”-छत्तीसगढ़ी साहित्य की ऐसी धरोहर हैं, जो न केवल साहित्यकारों, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो इस भाषा और संस्कृति से जुड़ा है। पहली कृति एक विशाल संग्रह है, जो छत्तीसगढ़ी कविता के सौ वर्षों की सैर कराती है, तो दूसरी कृति उस सैर को गहराई देती है, उसे समझने का एक नया नजरिया देती है।
ये किताबें उस नदी की तरह हैं, जो गाँव के किनारे बहती है-कभी शांत, कभी उफनती, पर हमेशा अपने साथ कुछ नया ले आती। इनमें छत्तीसगढ़ की माटी की सौंधी खुशबू है, लोकगीतों की लय है, और उन कवियों की आवाज़ है, जो अपनी भाषा में दुनिया को देखते हैं। इन्हें पढ़ना, जैसे किसी पुराने घर की चौखट पर बैठकर स्मृतियों को टटोलना हो-वहाँ सब कुछ अपना-सा लगता है, फिर भी हर बार कुछ नया मिलता है।
बिमला नायक: प्रश्न – छत्तीसगढ़ी समीक्षा को डॉ. बल्देव के प्रदेय के संबंध में आपका क्या मत है ? छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि को आप किस तरह पाते हैं ?
जयप्रकाश मानस – जैसा कि हम आगे चर्चा कर चुके हैं डॉ. बल्देव का छत्तीसगढ़ी साहित्य की समीक्षा के क्षेत्र में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी है। उनकी कृतियाँ, विशेष रूप से “छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल” (2011) और “छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि” (2013), छत्तीसगढ़ी साहित्य को व्यवस्थित, सैद्धांतिक और विश्लेषणात्मक आधार प्रदान करने में मील का पत्थर साबित हुई हैं। यह कार्य केवल संकलन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति की स्मृति को जीवित रखने का एक सांस्कृतिक प्रयास है। प्रत्येक कवि का संक्षिप्त परिचय शामिल करना उनकी दूरदृष्टि को दर्शाता है, क्योंकि यह न केवल रचनाओं को संदर्भ देता है, बल्कि कवियों के व्यक्तित्व और उनके समय को भी जीवंत करता है। यह छत्तीसगढ़ी समीक्षा को ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में “छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि” में डॉ. बल्देव ने छत्तीसगढ़ी कविता को सैद्धांतिक और व्यावहारिक समीक्षा का आधार दिया। उनके लेख, जो पहले लोकाक्षर और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए, कविताओं के सौंदर्यशास्त्र, भाषिक समृद्धि, और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को गहराई से विश्लेषित करते हैं।
उनकी समीक्षा में छत्तीसगढ़ी कविता के रस, छंद, अलंकार, और लोक तत्वों का विश्लेषण हिंदी और संस्कृत साहित्यशास्त्र से प्रभावित होने के बावजूद छत्तीसगढ़ी की मौलिकता को बनाए रखता है। यह एक ऐसा संतुलन है, जो छत्तीसगढ़ी साहित्य को व्यापक साहित्यिक परिदृश्य में सम्मान दिलाता है। उनकी समीक्षा में लोकमंगल की भावना और सामाजिक प्रासंगिकता पर बल दिया गया है, जो छत्तीसगढ़ी साहित्य की जड़ों को ग्रामीण और लोक जीवन से जोड़ता है। यह समीक्षा को केवल बौद्धिक कवायद नहीं, बल्कि एक सामाजिक संवाद बनाता है। समृद्ध करता है।
बल्देव ने अपनी समीक्षाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा की समृद्धि को रेखांकित किया। उनके लेखन में छत्तीसगढ़ी के मुहावरे, लोकोक्तियाँ, और स्थानीय संदर्भों का उपयोग न केवल भाषा की जीवंतता को दर्शाता है, बल्कि उसे व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाने में भी मदद करता है। उनकी कृतियाँ छत्तीसगढ़ी साहित्य को शैक्षिक और साहित्यिक मंचों पर स्थापित करने में सहायक रही हैं। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि छत्तीसगढ़ी को अक्सर हिंदी के छायाक्षेत्र में देखा जाता था। डॉ. बल्देव ने इसे स्वतंत्र और आत्मनिर्भर साहित्यिक परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया।
डॉ. बल्देव की समीक्षा में एक ऐसी संवेदनात्मक दृष्टि है, जो कविता को केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव मानती है। उनकी समीक्षा में कविता की आत्मा को टटोलने की कोशिश है-वह आत्मा, जो खेतों की माटी, गाँव की चौपाल, और लोकगीतों की लय में बस्ती है। उनकी समीक्षा में एक सहजता है, जो पाठक को कविता के करीब लाती है। यह ऐसा है, जैसे कोई पुराना मित्र आपको किसी गीत की धुन सुनाता हो और कहता हो-देखो, यह धुन कितना कुछ कहती है, और इसके बीच का मौन कितना कुछ छिपाता है। डॉ. बल्देव ने छत्तीसगढ़ी समीक्षा को केवल परंपरागत ढाँचे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आधुनिक साहित्यिक विचारधाराओं, जैसे प्रगतिशीलता और सामाजिक चेतना, से जोड़ा। उनकी समीक्षा में मार्क्सवादी और जनवादी दृष्टिकोण का प्रभाव देखा जा सकता है, जो कविताओं को सामाजिक परिवर्तन और जनकल्याण के संदर्भ में परखता है।
मैं तो यही कहना चाहूँगा डॉ. बल्देव का छत्तीसगढ़ी समीक्षा में योगदान एक माली की तरह है, जिसने छत्तीसगढ़ी साहित्य के बगीचे को न केवल सींचा, बल्कि उसे नए फूलों और शाखाओं से सजाया। उनकी कृतियों ने छत्तीसगढ़ी कविता को एक ऐतिहासिक और सैद्धांतिक आधार दिया, उसकी सांस्कृतिक समृद्धि को उजागर किया, और उसे व्यापक साहित्यिक परिदृश्य में स्थापित किया। उनकी समीक्षा में वह संवेदनशीलता और गहराई है, जो छत्तीसगढ़ की माटी की सौंधी खुशबू को शब्दों में ढालती है। डॉ. बल्देव ने छत्तीसगढ़ी साहित्य को एक ऐसी नदी
बना दिया, जो गाँव की चौखट से होकर गुजरती है-शांत, गहरी, और हमेशा कुछ नया कहती हुई।
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जयप्रकाश मानस एफ-3, आवासीय परिसर छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल पेंशनबाड़ा, रायपुर – 492001 मो. न. – 9424182664
(प्रस्तुति बसंत राघव)

