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बावनी इमली जहाँ अंग्रेजों ने 52 क्रान्तिकारीयों को एक साथ पेड़ पर लटकाया

1857 में हुए भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की असफलता के बाद अंग्रेज सरकार ने क्रांतिकारियों का जिस क्रूरता से दमन किया, उसका विवरण लगभग हर जिले के इतिहास में मिलता है। ऐसा ही एक क्रूरतापूर्ण घटनाक्रम उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के अंतर्गत बिंदकी उपखंड के खजुआ कस्बे में हुआ। यहाँ एक इमली के पेड़ पर 52 क्रांतिकारियों को लटकाकर फाँसी दी गई थी। सभी मृतदेह पेड़ पर लटकते हुए पहले सड़ीं, फिर सूखीं और अंततः केवल हड्डियों के ढाँचे में बदल गईं। इस अमानवीय कृत्य का आदेश देने वाला अंग्रेज अधिकारी ब्रिगेडियर नील था।

यह पेड़ आज भी वहाँ मौजूद है और स्थानीय लोग इसे “बावनी इमली” के नाम से जानते हैं। चूँकि इस पर बावन क्रांतिकारियों को फाँसी दी गई थी, इसलिए इसका नाम “बावनी इमली” पड़ गया। स्वतंत्रता के बाद यहाँ एक स्मारक भी बनाया गया। यह स्मारक फतेहपुर जिले की बिंदकी तहसील मुख्यालय से लगभग तीन किलोमीटर दूर मुगल रोड पर स्थित है।

1857 के इस स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत क्रांतिकारी मंगल पांडेय ने बंगाल के बैरकपुर छावनी से की थी, जो धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गई। उत्तर प्रदेश में इसका प्रमुख केंद्र कानपुर और मेरठ थे। कानपुर में इस क्रांति का नेतृत्व नाना साहब पेशवा कर रहे थे। उनके संदेश पूरे क्षेत्र में भेजे गए। ऐसा ही एक संदेश बिंदकी के जागीरदार जोधासिंह अटैया को भी मिला।

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जोधासिंह अटैया अपने क्षेत्र में अत्यंत लोकप्रिय थे। उनके आह्वान पर एक सैन्य टुकड़ी तैयार हुई और 10 जून 1857 को क्रांति की घोषणा कर दी गई। उन्होंने अपने क्षेत्र में तैनात अंग्रेजी थानों और प्रशासनिक केंद्रों पर अधिकार कर लिया तथा अपनी व्यवस्था स्थापित की। जो लोग अंग्रेजी शासन को बनाए रखने के लिए सामने आए, उन्हें दंडित किया गया।

जोधासिंह अटैया के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने न केवल बिंदकी क्षेत्र, बल्कि फतेहपुर पहुँचकर कचहरी एवं कोषागार सहित सभी शासकीय कार्यालयों पर अधिकार कर लिया। उनका संपर्क नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे से भी बना हुआ था। क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए अंग्रेजी सेना फतेहपुर पहुँची, जिसकी सूचना पहले ही क्रांतिकारियों को मिल गई थी। इस कारण उन्होंने संभावित मार्गों पर मोर्चाबंदी कर ली थी।

पांडु नदी के तट पर क्रांतिकारियों और अंग्रेजी सेना के बीच भीषण संघर्ष हुआ, जिसमें अंग्रेजी सेना को पीछे हटना पड़ा। इसके बाद क्रांतिकारी कानपुर पहुँचे और नाना साहब पेशवा की सत्ता स्थापित करने में सहायता की।

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सत्ता स्थापित होने के बाद वे अपने क्षेत्र में व्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए लौटे और मेहमूदपुर, रानीपुर आदि क्षेत्रों से अंग्रेजी शासन को समाप्त कर दिया तथा खजुआ को अपना केंद्र बनाया। यहाँ आवागमन की सुविधा अच्छी थी।

जब अंग्रेजी सेना को इसकी सूचना मिली, तो प्रयागराज में क्रांति का दमन कर रहे कर्नल पावेल ने इस क्रांतिकारी दल पर आक्रमण किया। किन्तु क्रांतिकारी सतर्क थे और उन्होंने छापामार युद्ध की रणनीति अपनाई। इसमें कर्नल पावेल पराजित हुआ और युद्ध में मारा गया।

इस घटना से अंग्रेज बौखला उठे और कर्नल नील के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी गई। इस सेना ने पूरे क्षेत्र को घेर लिया और निर्दोष नागरिकों का सामूहिक नरसंहार आरंभ कर दिया। जनरल नील ने क्रांतिकारियों को आत्मसमर्पण का प्रस्ताव दिया और साथ ही यह आश्वासन भी दिया कि समर्पण करने पर उन्हें क्षमा कर दिया जाएगा।

निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए क्रांतिकारियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। क्रांति का नेतृत्व कर रहे जोधासिंह अटैया अपने 51 साथियों सहित बंदी बना लिए गए। इसके बावजूद अंग्रेजी सेना का अत्याचार बंद नहीं हुआ।

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अंततः 28 अप्रैल 1858 को सभी 52 क्रांतिकारियों को मुगल रोड पर लाकर इस इमली के पेड़ और आसपास के पेड़ों पर फाँसी पर लटका दिया गया। अंग्रेजों ने क्षेत्र में मुनादी करवा दी कि कोई भी शवों को नीचे उतारने का प्रयास न करे, अन्यथा उसे भी इसी दंड का सामना करना पड़ेगा।

इस भय से पूरा क्षेत्र खाली हो गया। लोग जंगलों या दूर-दराज के स्थानों पर चले गए। क्रांतिकारियों के शव पेड़ों पर लटकते रहे और चील-गिद्ध उन्हें नोचते रहे। समय के साथ वे केवल अस्थि-पंजर में बदल गए।

कई महीनों बाद महाराजा भवानी सिंह के प्रयासों से अंग्रेजों से अनुमति प्राप्त हुई, तब जाकर उन अस्थि-पंजरों को उतारा जा सका।

खजुआ और बिंदकी के बीच स्थित “बावनी इमली” आज भी उन अमर बलिदानियों की याद दिलाती है।