futuredस्वास्थ्य

रोग नहीं, रोगी का उपचार करते थे प्राचीन भारत के वैद्य

आचार्य ललित मुनि

भारतीय चिकित्सा परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और सुव्यवस्थित चिकित्सा परंपराओं में से एक है। यह केवल रोगों के उपचार तक सीमित नहीं रही, बल्कि मनुष्य के संपूर्ण जीवन को स्वस्थ, संतुलित और दीर्घायु बनाने का विज्ञान रही है। यही कारण है कि आयुर्वेद को केवल औषधि विज्ञान नहीं, बल्कि “आयु का वेद” अर्थात जीवन का विज्ञान कहा गया है। भारतीय वैद्यों ने सदियों पहले यह समझ लिया था कि प्रत्येक मनुष्य की प्रकृति, शरीर, मन, आहार, वातावरण और जीवन शैली अलग होती है। इसलिए सभी रोगियों का उपचार एक समान नहीं हो सकता। यही कारण है कि प्राचीन भारत के वैद्य रोग का नहीं, बल्कि रोगी का उपचार करते थे।

आयुर्वेद की मूल भावना अथर्ववेद तथा वैदिक परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। आयुष मंत्रालय तथा अनेक प्राचीन ग्रंथ आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद बताते हैं। आयुर्वेद का उद्देश्य केवल रोग दूर करना नहीं, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के रोग का शमन करना है। यही सिद्धांत आयुर्वेद की मूल पहचान है।

व्यक्ति केंद्रित चिकित्सा का दर्शन

आज की चिकित्सा में किसी रोग का नाम ज्ञात होते ही उसके लिए निर्धारित औषधियाँ दी जाती हैं, जबकि आयुर्वेद में सबसे पहले रोगी की प्रकृति, आयु, पाचन शक्ति, मानसिक स्थिति, ऋतु, निवास स्थान, आहार, दिनचर्या और रोग प्रतिरोधक क्षमता का परीक्षण किया जाता है। चरक संहिता में वैद्य को निर्देश दिया गया है कि वह केवल रोग नहीं, बल्कि रोगी के संपूर्ण व्यक्तित्व का अध्ययन करे। यही कारण है कि एक ही रोग से पीड़ित दो व्यक्तियों को अलग अलग उपचार मिल सकता है।

भारतीय चिकित्सा विज्ञान का यह दृष्टिकोण आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में भी “पर्सनलाइज्ड मेडिसिन” अथवा “इंडिविजुअलाइज्ड हेल्थ केयर” के रूप में पुनः महत्व प्राप्त कर रहा है।

धन्वंतरि से प्रारंभ हुई गौरवशाली परंपरा

भारतीय परंपरा में भगवान धन्वंतरि को चिकित्सा विज्ञान का आदिदेव माना जाता है। समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए धन्वंतरि केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि चिकित्सा ज्ञान के आदर्श भी माने जाते हैं। धनतेरस का पर्व आज भी उनके सम्मान में मनाया जाता है।

धन्वंतरि के पश्चात आत्रेय, अग्निवेश, चरक, सुश्रुत और वाग्भट जैसे महर्षियों ने चिकित्सा विज्ञान को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। इनके ग्रंथ केवल भारत में ही नहीं, बल्कि मध्यकाल में अरबी, फारसी और अन्य भाषाओं में भी अनूदित हुए तथा विश्व चिकित्सा के विकास में सहायक बने।

यह भी पढ़ें  संघ की सौ वर्ष की यात्रा, आवश्यकता और लक्ष्य को उकेरती महत्त्वपूर्ण कृति

महर्षि चरक की चिकित्सा दृष्टि

महर्षि चरक को आंतरिक चिकित्सा का महान आचार्य माना जाता है। चरक संहिता केवल औषधियों का संग्रह नहीं, बल्कि चिकित्सा दर्शन का महान ग्रंथ है। इसमें रोगों के कारण, निदान, आहार, औषधि, जीवन शैली, चिकित्सक के गुण तथा चिकित्सा नैतिकता का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है।

चरक ने स्पष्ट कहा कि शरीर, मन और आत्मा का संतुलन ही स्वास्थ्य है। उन्होंने भोजन को औषधि के समान महत्व दिया। उनका मानना था कि अनुचित भोजन अनेक रोगों का मूल कारण है तथा उचित भोजन अनेक रोगों की सर्वोत्तम औषधि है। चरक संहिता में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, ऋतु के अनुसार आहार परिवर्तन तथा दिनचर्या का अत्यंत वैज्ञानिक विवेचन मिलता है।

महर्षि सुश्रुत और शल्य चिकित्सा का चमत्कार

यदि चरक आंतरिक चिकित्सा के आचार्य थे तो महर्षि सुश्रुत शल्य चिकित्सा के महान वैज्ञानिक थे। सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा, नेत्र चिकित्सा, अस्थि चिकित्सा, प्रसूति, विष चिकित्सा तथा शरीर रचना का विस्तृत वर्णन मिलता है। आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी के इतिहास में भी सुश्रुत का नाम अत्यंत सम्मान से लिया जाता है।

सुश्रुत ने शल्य चिकित्सकों के प्रशिक्षण की भी वैज्ञानिक व्यवस्था बनाई। विद्यार्थी पहले सब्जियों, लकड़ी, पशुओं के अंगों तथा अन्य वस्तुओं पर अभ्यास करते थे, उसके बाद ही रोगियों पर शल्य चिकित्सा करने की अनुमति मिलती थी। चिकित्सा शिक्षा की यह व्यावहारिक प्रणाली अपने समय से बहुत आगे की सोच का परिचायक थी।

वैद्य केवल चिकित्सक नहीं, आचारवान व्यक्ति भी था

भारतीय चिकित्सा परंपरा में वैद्य के चरित्र को औषधियों से अधिक महत्व दिया गया है। वैद्य से अपेक्षा की जाती थी कि वह सत्यवादी, संयमी, करुणामय, धैर्यवान और लोभ से मुक्त हो। रोगी के प्रति सेवा भाव को सर्वोच्च स्थान दिया गया। चिकित्सा को व्यवसाय नहीं, धर्म माना गया।

सुश्रुत संहिता में विद्यार्थियों के लिए चिकित्सा संबंधी शपथ का उल्लेख मिलता है, जिसमें रोगी की गोपनीयता, सेवा और नैतिक आचरण पर विशेष बल दिया गया है। यह चिकित्सा नैतिकता की अत्यंत प्राचीन और विकसित परंपरा का प्रमाण है।

प्रकृति के साथ संतुलन

प्राचीन भारतीय वैद्य मानते थे कि मनुष्य प्रकृति का अभिन्न अंग है। ऋतु परिवर्तन, जल, वायु, भोजन, नींद, मानसिक तनाव और सामाजिक व्यवहार सभी स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। इसलिए उपचार केवल औषधि से नहीं, बल्कि दिनचर्या, ऋतुचर्या, योग, प्राणायाम, स्वच्छता, उचित निद्रा तथा सात्विक आहार से भी किया जाता था।

यह भी पढ़ें  जमीनी साहित्यकार थे बाबा नागार्जुन : आज उनकी जयंती

आयुर्वेद का उद्देश्य केवल रोग समाप्त करना नहीं, बल्कि भविष्य में रोग उत्पन्न न हो, इसकी व्यवस्था करना भी था। इसलिए इसे निवारक और प्रोत्साहक चिकित्सा का भी उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता पर विशेष बल

भारतीय चिकित्सा पद्धति का एक महत्वपूर्ण आधार शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ बनाना है। आयुर्वेद में इसे “व्याधिक्षमत्व” कहा गया है। चरक संहिता में वर्णित रसायन चिकित्सा, उचित आहार, नियमित व्यायाम, योग, प्राणायाम, पर्याप्त निद्रा और मानसिक संतुलन को स्वास्थ्य संरक्षण का आधार माना गया है। भारतीय वैद्यों का विश्वास था कि यदि शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता सशक्त होगी तो अनेक रोग स्वतः दूर रहेंगे। आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी प्रतिरक्षा प्रणाली के महत्व को स्वीकार करता है और स्वस्थ जीवन शैली को अनेक दीर्घकालिक रोगों की रोकथाम का महत्वपूर्ण साधन मानता है।

औषधि ही नहीं, आहार भी उपचार

प्राचीन भारतीय वैद्य भोजन को चिकित्सा का अभिन्न अंग मानते थे। आयुर्वेद का प्रसिद्ध सिद्धांत है कि उचित आहार ही श्रेष्ठ औषधि है। रोगी की प्रकृति, ऋतु, आयु, पाचन शक्ति तथा रोग की अवस्था के अनुसार भोजन निर्धारित किया जाता था। अनेक रोगों में औषधियों के साथ पथ्य और अपथ्य का पालन अनिवार्य माना गया। चरक संहिता में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि यदि रोगी उचित आहार का पालन नहीं करता तो केवल औषधियाँ अपेक्षित लाभ नहीं दे सकतीं। यह सिद्धांत आज पोषण विज्ञान और जीवन शैली आधारित चिकित्सा में भी व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है।

ऐलोपैथी चिकित्सा की उपलब्धियाँ और उसकी सीमाएँ

आधुनिक ऐलोपैथिक चिकित्सा ने संक्रामक रोगों के नियंत्रण, टीकाकरण, आपातकालीन चिकित्सा, अंग प्रत्यारोपण, गहन चिकित्सा, प्रसूति सेवाओं तथा जटिल शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। इन योगदानों को नकारा नहीं जा सकता। साथ ही यह भी तथ्य है कि अनेक औषधियों के दुष्प्रभाव होते हैं और उनका अनुचित या लंबे समय तक उपयोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। उदाहरण के लिए दर्द निवारक औषधियों के अत्यधिक सेवन से गुर्दे या यकृत प्रभावित हो सकते हैं, एंटीबायोटिक दवाओं के अनियंत्रित प्रयोग से जीवाणुओं में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है, जबकि कुछ औषधियों से एलर्जी, पाचन संबंधी विकार अथवा अन्य प्रतिकूल प्रभाव भी उत्पन्न हो सकते हैं। इसी कारण आधुनिक चिकित्सा विज्ञान स्वयं भी चिकित्सकीय परामर्श के बिना दवाओं के सेवन से बचने की सलाह देता है। आज विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा अनेक चिकित्सा संस्थान यह भी स्वीकार करते हैं कि स्वस्थ जीवन शैली, संतुलित आहार और रोगों की रोकथाम पर ध्यान देना उपचार जितना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए सर्वोत्तम दृष्टिकोण वही है जिसमें रोग की प्रकृति के अनुसार आधुनिक चिकित्सा और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का वैज्ञानिक एवं प्रमाण आधारित समन्वय किया जाए।

यह भी पढ़ें  रामगढ़ को वैश्विक धरोहर के रूप में विकसित करने के लिए गहन शोध की आवश्यकता : डॉ. निलिम्प त्रिपाठी

चिकित्सा में नैतिकता का सर्वोच्च स्थान

भारतीय वैद्य चिकित्सा को केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि लोककल्याण का माध्यम मानते थे। चिकित्सा से पहले रोगी के प्रति करुणा, धैर्य और आत्मीयता आवश्यक समझी जाती थी। रोगी के साथ सम्मानजनक व्यवहार, उसकी गोपनीयता की रक्षा और आर्थिक शोषण से बचना चिकित्सक का धर्म माना गया। चरक संहिता में चिकित्सक के लिए विनम्रता, शुचिता, संयम और निरंतर अध्ययन को अनिवार्य बताया गया है।

आज जब स्वास्थ्य सेवाएँ अत्यधिक व्यावसायिक होती जा रही हैं, तब प्राचीन भारतीय चिकित्सा दर्शन हमें यह स्मरण कराता है कि चिकित्सा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोग समाप्त करना नहीं, बल्कि पीड़ित मनुष्य को स्वस्थ और सम्मानपूर्ण जीवन प्रदान करना है।

विश्व में भारतीय चिकित्सा की बढ़ती स्वीकार्यता

वर्तमान समय में आयुर्वेद केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व के अनेक देशों में आयुर्वेदिक चिकित्सा, पंचकर्म, योग और प्राकृतिक जीवन शैली के प्रति रुचि लगातार बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के वैज्ञानिक अध्ययन और उनके समुचित उपयोग पर बल दिया है। भारत में आयुष मंत्रालय की स्थापना तथा गुजरात के जामनगर में विश्व स्वास्थ्य संगठन के पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक केंद्र की स्थापना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। यह भारतीय चिकित्सा विरासत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रमाण भी है।

भारत को अपनी चिकित्सा परंपरा पर गर्व अवश्य होना चाहिए, किंतु उसके वैज्ञानिक अध्ययन, मानकीकरण और आधुनिक अनुसंधान को भी समान महत्व देना होगा। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा को प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। जहाँ आपातकालीन स्थितियों, शल्य चिकित्सा और गंभीर संक्रमणों में आधुनिक चिकित्सा अत्यंत प्रभावी है, वहीं जीवन शैली संबंधी रोगों, स्वास्थ्य संरक्षण, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने तथा पुनर्वास में आयुर्वेद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।