बालोद विवाद: ‘स्थानीय आदिवासी बनाम बाहरी राजनीति’ की जमीनी हकीकत
छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम (जामड़ीपाठ क्षेत्र) का विवाद इन दिनों सुर्खियों में है। ऊपरी तौर पर इसे ‘जल, जंगल, जमीन’ की रक्षा और आदिवासियों के आंदोलन के रूप में पेश किया जा रहा है। कलेक्ट्रेट के घेराव और हजारों की भीड़ को दिखाकर यह नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है कि पूरा आदिवासी समाज इस निर्माण कार्य के खिलाफ खड़ा है। लेकिन जब हम इस आंदोलन की परतों को हटाकर जमीनी हकीकत को टटोलते हैं, तो एक बिल्कुल अलग और चौंकाने वाली सच्चाई सामने आती है। यह विवाद बाहरी बनाम स्थानीय का तो है ही, लेकिन उससे कहीं अधिक यह ‘स्थानीय आदिवासी समाज बनाम बाहरी राजनीतिक संगठनों’ के बीच का टकराव है।
सच यह है कि इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे ‘सर्व आदिवासी समाज’ और कुछ कथित बड़े नेताओं को जमीन पर स्थानीय ग्रामीणों का समर्थन हासिल नहीं है, बल्कि वे अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए स्थानीय शांति को दांव पर लगा रहे हैं।
12 में से 11 गांवों का विरोध और बाहरी हस्तक्षेप का सच
इस पूरे घटनाक्रम के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु को निम्नलिखित पहलुओं के माध्यम से गहराई से समझा जा सकता है।
स्थानीय जनता का अलगाव और 11 गांवों की मर्जी
इस पूरे क्षेत्र में मुख्य रूप से 12 गांव आते हैं, जो इस देवस्थल और धाम से सीधे जुड़े हुए हैं। दावों के विपरीत, जमीनी हकीकत यह है कि इन 12 में से 11 गांवों के मूल निवासी, स्थानीय आदिवासी और बुजुर्ग ग्रामीण इस तथाकथित आंदोलन के साथ बिल्कुल नहीं हैं। तुएगोंडी के एक छोटे से वर्ग को मोहरा बनाकर बाहर से आए ‘सर्व आदिवासी समाज’ के नेताओं ने पूरे क्षेत्र का माहौल खराब कर दिया है।
11 गांवों के पारंपरिक आदिवासी समाज का मानना है कि जो निर्माण या गतिविधियां हो रही हैं, वे उनकी मूल संस्कृति के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि बाहरी लोग उनके क्षेत्र में आकर अशांति फैला रहे हैं।
परंपरागत सामाजिक व्यवस्था बनाम आधुनिक राजनीतिक रसूख
गोंडवाना और आदिवासी समाज की अपनी एक बेहद सुदृढ़ और पूजनीय पारंपरिक व्यवस्था होती है, जिसमें गांवों के ‘गांयता’ (पारंपरिक मुखिया), ‘बैगा’ (पुजारी) और बुजुर्गों के फैसले को सर्वोपरि माना जाता है।
आवाज दबाने की रणनीति : बाहर से आए अलगाववादी और राजनीतिक नेता स्थानीय स्तर पर पीढ़ियों से चली आ रही इन परंपरागत व्यवस्थाओं और मुखियाओं की आवाज को दबा रहे हैं।
डराने का माहौल : ये बाहरी नेता अपनी तेज आवाज, उग्र भाषणों, भीड़तंत्र और राजनीतिक रसूख के दम पर सीधे-सादे स्थानीय आदिवासियों को डराते-धमकाते हैं। जो बुजुर्ग ग्रामीण शांति और आपसी तालमेल की बात करते हैं, उन्हें समाज-विरोधी घोषित करने की धमकी देकर चुप करा दिया जाता है।
फूट डालो और राज करो की नीति
सालों से इस जामड़ीपाठ क्षेत्र के आदिवासी और गैर-आदिवासी समाज के लोग आपस में मिल-जुलकर रहते आए हैं। उनके बीच कभी कोई वैचारिक खाई नहीं रही। लेकिन बाहरी संगठनों ने अपने अस्तित्व को चमकाने और वोट बैंक की राजनीति के लिए स्थानीय लोगों के बीच अविश्वास का बीज बो दिया है।
तुएगोंडी के आदिवासियों के एक हिस्से को बाकी 11 गांवों के आदिवासियों के खिलाफ खड़ा कर देना, इसी ‘फूट डालो और राज करो’ की राजनीति का जीवंत उदाहरण है।
स्वयंभू नेताओं का ‘एजेंडा’
जो नेता आज बालोद कलेक्ट्रेट के सामने खड़े होकर आदिवासियों के हक की बात कर रहे हैं, उनका इस क्षेत्र के विकास, शिक्षा या स्वास्थ्य से कोई सरोकार नहीं रहा है। स्थानीय ग्रामीणों का दबी जुबान में कहना है कि इन नेताओं को केवल बड़े प्रदर्शनों, मीडिया कवरेज और प्रशासन पर दबाव बनाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करनी है।
वे आदिवासियों की मासूम आस्था को एक ‘टूल’ (हथियार) की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे अंततः नुकसान केवल स्थानीय आदिवासियों का ही होगा।
बालोद का यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त (अपने आप उपजा हुआ) नहीं है, बल्कि यह बाहरी ताकतों द्वारा प्रायोजित है। जब 12 में से 11 गांवों के आदिवासी ही इस तथाकथित आंदोलन के तौर-तरीकों और मांगों के खिलाफ हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि विरोध के स्वर स्थानीय आदिवासियों के नहीं, बल्कि उन अलगाववादी नेताओं के हैं, जो आदिवासी समाज के भीतर ही विभाजन पैदा करना चाहते हैं।

