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अयोध्या मंदिर में चढ़ावा चोरी : यह मंदिर निर्माण विरोधियों का नया शोर या चोरी का कूचक्र भी

विश्व प्रसिद्ध रामजन्म मंदिर, अयोध्या में चढ़ावा चोरी के नित नए आरोप सामने आ रहे हैं। चार ट्रस्टियों के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट भी थाने में की गई है। ट्रस्ट की पहल पर उत्तर प्रदेश सरकार ने जांच के लिये एसआईटी गठित कर दी है। जांच के बाद पता चलेगा कि क्या वाकई चढ़ावे में चोरी हुई अथवा यह श्रद्धालुओं की आस्था पर आघात करने का कोई कुचक्र है। इस चढ़ावा चोरी का आरोप लगाने वालों में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी के वे नेता सबसे मुखर हैं, जो मंदिर निर्माण अभियान के कभी सहमत नहीं रहे।

सामान्यतः ग्रहणकाल कुछ घंटों का होता है। शनिदेव की महादशा अधिकतम साढ़े सात साल और राहु की महादशा अठारह वर्ष तक चलती है। लेकिन अयोध्या में श्रीराम जन्मस्थान मंदिर पर जो ग्रहण लगभग नौ सौ वर्ष पहले लगा था, उसकी मुक्ति अभी तक नहीं हो पा रही। युग बदला, सत्ताएँ बदलीं, सल्तनत और अंग्रेजी काल भी चला गया, लेकिन अयोध्या जन्मस्थान मंदिर को निशाने पर लेने की मानसिकता नहीं बदली।

पहले सतत सैन्य आक्रमण हुए, लूटने और तोड़ने के बाद पुनर्निर्माण का संघर्ष चला। पीढ़ियाँ बीतीं, लेकिन रामभक्तों की जिजीविषा बनी रही। समय के साथ संघर्ष की शैली तो बदली, लेकिन रामजन्मस्थान मुक्ति का संघर्ष कभी रुका नहीं।

1949 में संघर्ष का नया अध्याय जुड़ा। अपने जन्मस्थान में रामलला स्वयं प्रकट हो गए। लेकिन दिल्ली सरकार का दृष्टिकोण प्रतिकूल रहा और मंदिर में विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा न हो सकी। संघर्ष भी नए स्वरूप में बदला। न्यायालय में याचिकाओं के साथ देशभर से श्रद्धालु कारसेवक के रूप में अयोध्या पहुँचने लगे। गोलियाँ चलीं, रामसेवकों के बलिदान हुए, ढाँचा ढहा। अंततः 9 नवम्बर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय आया।

5 फरवरी 2020 को संसद की अनुमति से भारत सरकार द्वारा स्वतंत्र श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास का गठन किया गया। 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में भूमिपूजन हुआ और 22 जनवरी 2024 को श्रीरामलला अपने जन्मस्थान पर विराजमान हो गए।

जिन दिनों यह प्रकरण न्यायालय में था, तब सभी पक्षों ने न्यायालय के निर्णय को मानने की घोषणा की थी। रामभक्तों को आशा थी कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद स्थिति सामान्य होगी और संपूर्ण देश अपने आराध्य के निर्विवाद दर्शन कर सकेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

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जिस प्रकार रामजी का जीवन वनवास काटने के बाद भी निरापद नहीं रहा, ठीक वही स्थिति इस जन्मस्थान मंदिर की रही। सर्वोच्च न्यायालय में भी कई पेशियों पर नए-नए बिंदु उठाए गए, जिससे प्रकरण को निर्णय तक आने में वर्षों लगे। संभवतः भारत के न्यायालयीन इतिहास में यह पहला प्रकरण था, जिसमें निर्णय को विलंब से देने की याचिका भी लगी।

बात यहाँ भी नहीं रुकी। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने के बाद राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया में भी विवाद उठाए गए। इसमें ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया तथा चयनित नामों पर भी विवाद उठाने का प्रयास हुआ। फिर मंदिर निर्माण के लिये भूमि पूजन की विधि और मुख्य यजमान पर विवाद उठाया गया।

एक ओर पूजन चल रहा था और दूसरी ओर मीडिया में इस भूमि पूजन के मुहूर्त से लेकर मुख्य यजमान तक पर प्रश्न खड़े किये जा रहे थे। विवाद का अगला मुद्दा श्रीरामलला के विराजमान होने के दिन शंकराचार्यों की अनुपस्थिति के साथ तिथि-मुहूर्त का भी मुद्दा उछाला गया। इसके बाद ट्रस्ट द्वारा क्रय की गई भूमि के मूल्य को उछाला गया।

लेकिन इन सब बातों और विवादों का रामभक्तों की श्रद्धा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। देश-विदेश से भक्तों का ताँता लग गया। प्रतिदिन लाखों लोग अयोध्या आते हैं। अब तक 45 करोड़ से अधिक श्रद्धालु अयोध्या जाकर श्रीरामलला के दर्शन कर चुके हैं।

लेकिन कथित चढ़ावा चोरी का यह हमला द्वितरफा है। एक ओर मंदिर प्रबंधन की साख पर और दूसरी ओर श्रद्धालुओं की भावनाओं पर। आरोप है कि मंदिर में आने वाले चढ़ावे और श्रद्धालुओं की दान राशि में करोड़ों रुपये की चोरी हुई है। आरोप चढ़ावे में आए आभूषणों में भी चोरी के लगाए गए हैं।

चोरी के केवल आरोप ही नहीं लगे, बल्कि राम मंदिर न्यास के महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा, राम मंदिर के व्यवस्थापक गोपाल राव और चंपत राय के ड्राइवर रहे रामशंकर दयाल उर्फ टिन्नू यादव के विरुद्ध थाने में नामजद रिपोर्ट भी की गई।

आरोपों पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी संज्ञान लिया और मंदिर प्रबंधन ने भी। मंदिर प्रशासन की पहल पर उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन कर दिया। एसआईटी की टीम ने मंदिर परिसर में दान पेटियों के प्रबंधन, कर्मचारियों की आवाजाही, चढ़ावा प्रक्रिया, दान के बही-खातों आदि की लगातार तीन दिन तक जांच की।

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एसआईटी अब नोट गिनने वाले उन पचास कर्मचारियों की संपत्ति की जांच कर रही है, जिन पर नोट चोरी का आरोप है। एसआईटी को सात दिन में प्रारंभिक और पन्द्रह दिन में अंतिम रिपोर्ट देना है। यदि आरोप सही पाए गए, तो चढ़ावे की चोरी के चेहरे सामने आएँगे और एसआईटी का प्रतिवेदन एफआईआर में बदल जाएगा।

आरोपों की सच्चाई तो एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट में ही स्पष्ट होगी, लेकिन आरोपों की शैली और शिकायत का विवरण बहुत आश्चर्यजनक है। सबसे पहले “चढ़ावा चोरी” शब्द। चोरी शब्द लंबे समय से राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का प्रमुख हिस्सा बना हुआ है। सबसे पहले “चौकीदार चोर” शब्द सामने आया। फिर “वोट चोरी”, “सीट चोरी” और “चुनाव चोरी” जैसे शब्द चर्चा में आए। अब “चढ़ावा चोरी” शब्द सामने आया है।

मंदिर में चढ़ावा चोरी का आरोप भी ठीक उसी प्रकार उछाला जा रहा है, जैसे कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी जैसे राजनीतिक दल वोट चोरी, चुनाव चोरी या सीट चोरी के आरोप उछालते रहे हैं। इन राजनीतिक दलों के लोग भी इस कथित चढ़ावा चोरी के आरोप को लेकर मुखर दिखाई दे रहे हैं।

आरोपों में दो और बिंदु आश्चर्यजनक हैं। पहला, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय जी सहित चार पदाधिकारियों को निशाने पर लेना, और दूसरा, कथित चोरी की अनुमानित राशि तथा चोरी के तरीके का विस्तृत विवरण देना।

आरोपों में महासचिव चंपत राय जी, ट्रस्टी गोपाल राव, अनिल मिश्रा तथा व्यवस्थापक टिन्नू यादव के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट होना भी आश्चर्यजनक है। चंपत राय जी का संत जीवन है। उन्होंने रामजी की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सहित मंदिर निर्माण विरोधियों के निशाने पर चंपत राय सदैव रहे हैं, लेकिन उनकी संकल्पशीलता कभी बाधित नहीं हुई। वे करोड़ों रामभक्तों के आदर का केंद्र हैं। उन्हें चढ़ावा चोरी के प्रकरण में नामजद करना भी सामान्य नहीं माना जा सकता।

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आरोपों के विवरण का एक बिंदु और भी आश्चर्यजनक है। इसमें चोरी किस प्रकार की गई, इसका भी विवरण दिया गया है। आरोपों की सच्चाई बहुत शीघ्र सामने आने वाली है, क्योंकि ट्रस्ट के पदाधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्री योगी जी और प्रधानमंत्री भी इस शिकायत के बाद गंभीर हैं।

यदि चढ़ावे में चोरी हुई है, तो यह साधारण चोरी नहीं हो सकती। यह मंदिर के प्रति जन-आस्था को आघात पहुँचाने वाला एक योजनापूर्वक किया गया कुचक्र भी हो सकता है। नियमानुसार नोटों की गिनती कैमरे की निगरानी में होने का प्रावधान है। नोट गिनने वाले कर्मचारियों की आते और जाते समय तलाशी होने तथा बिना जेब वाले साधारण कपड़े पहनने का नियम भी है।

क्या इन नियमों में ढिलाई बरती गई? यदि ढिलाई बरती गई, तो उसका सूत्र कहाँ है? नोट गिनने वालों में कुछ लोग ट्रस्ट के नियमित कर्मचारी नहीं हैं। उनके जुड़ने का मार्ग कौन-सा है? क्या कुछ बाहरी तत्वों ने योजनापूर्वक प्रबंधकों का विश्वास अर्जित करके यह चोरी कांड किया है, ताकि मंदिर प्रबंधन की छवि बिगाड़ी जा सके?

उत्तर प्रदेश से वेश बदलकर मंदिरों में प्रवेश करने के समाचार आते रहे हैं। सौ से अधिक ऐसे नकली पुजारी पकड़े जा चुके हैं, जिनका सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं था। इसी माह जून में एक नकली साधु, गले में रुद्राक्ष की माला पहनकर, उज्जैन के महाकाल मंदिर की भस्म आरती में प्रवेश करता हुआ पकड़ा गया।

ये वे घटनाएँ हैं, जो मंदिर प्रबंधकों और संपूर्ण समाज को अतिरिक्त सावधानी बरतने का संदेश दे रही हैं। सनातन धर्म के आस्था केंद्रों में घुसपैठ करके आस्था पर आघात करने की घटनाएँ देशभर में घट रही हैं।

क्या कोई ऐसा षड्यंत्र राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण के पीछे भी हो सकता है? कथित चढ़ावा चोरी के आरोपियों को कठोर दंड देने के साथ-साथ इन सभी प्रश्नों पर भी विचार आवश्यक है। यदि चोरी हुई है, तो दोषियों को दंड मिलना चाहिए, और यदि यह किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है, तो उसके सूत्रधारों को भी कानून के कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।