पंडित माधवराव सप्रे जिन्होंने 126 वर्ष पहले छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का पौधा लगाया

वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्लॉगर
कल्पना कीजिए उस दौर की, जब न तो आज की तरह टेलीफोन, कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाइल फोन की सुविधा थी और न ही छपाई की अत्याधुनिक मशीनें। आवागमन के साधन भी काफी सीमित थे। ऐसे कठिन दौर में किसी समाचार पत्र या पत्रिका का प्रकाशन कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा, उसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।
लेकिन सप्रे जी ने उस चुनौती को स्वीकार किया। उन दिनों संपूर्ण छत्तीसगढ़ की तरह यहां का पेंड्रा भी एक बेहद पिछड़ा इलाका था। सप्रे जी ने साधन-संसाधन विहीन इस क्षेत्र में जनवरी 1900 में, अर्थात आज से 126 वर्ष पहले, ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के रूप में पत्रकारिता का एक नन्हा पौधा लगाया था, जो आज एक विशाल वृक्ष बन चुका है।
अब छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की इस गौरवशाली परंपरा की शुरुआत करने का श्रेय पंडित माधवराव सप्रे को जाता है, जिन्होंने मासिक पत्रिका के रूप में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का संपादन और प्रकाशन प्रारंभ किया था। आज 19 जून को उनकी जयंती है।
वे छत्तीसगढ़ के प्रथम पत्रकार होने के साथ-साथ हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार भी थे। उनकी लिखी कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ हिंदी की पहली कहानी मानी जाती है। उन्होंने और भी कई कहानियां लिखीं। उनका जन्म 19 जून 1871 को मध्यप्रदेश के ग्राम पथरिया (जिला दमोह) में हुआ था तथा 23 अप्रैल 1926 को छत्तीसगढ़ की वर्तमान राजधानी रायपुर में उनका निधन हुआ।
मासिक पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में उनके सहयोगी रामराव चिंचोलकर थे। पत्रिका के प्रोपराइटर (प्रकाशक) स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और सहकारिता आंदोलन के प्रवर्तक रायपुर निवासी वामन बलिराम लाखे थे। यह पत्रिका रायपुर और नागपुर के प्रिंटिंग प्रेसों में छपवाई जाती थी।
उन दिनों पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं की छपाई हैंड कंपोजिंग और ट्रेडल मशीनों से होती थी। सप्रे जी और लाखे जी को आर्थिक कठिनाइयों के कारण तीन वर्ष बाद, वर्ष 1902 में, ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का मुद्रण और प्रकाशन बंद करना पड़ा। लेकिन छत्तीसगढ़ अंचल में साहित्यिक वातावरण निर्माण तथा सामाजिक और राष्ट्रीय विषयों पर चिंतनपरक लेखों के माध्यम से जनमत निर्माण में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ की ऐतिहासिक भूमिका रही।
बंद होने के 110 वर्ष बाद फिर शुरू हुआ ‘छत्तीसगढ़ मित्र’
आर्थिक समस्याओं के कारण ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन दिसंबर 1902 में बंद करना पड़ा, लेकिन छत्तीसगढ़ में साहित्य और पत्रकारिता के विकास की राह पर उनका यह ऐतिहासिक प्रयास मील का पत्थर सिद्ध हुआ।
सप्रे जी की पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन लगभग 110 वर्ष बाद पुनः प्रारंभ हुआ। यह मासिक पत्रिका सितंबर 2012 से फिर प्रकाशित होने लगी और इसका प्रकाशन रायपुर से हो रहा है। वर्तमान में इसके संपादक डॉ. सुशील त्रिवेदी तथा प्रबंध संपादक डॉ. सुधीर शर्मा हैं।
आजादी के आंदोलन के लिए ‘हिंदी केसरी’ की शुरुआत
सप्रे जी नागपुर के हिस्लाप कॉलेज से बी.ए. उत्तीर्ण करने के बाद वर्ष 1899 में पेंड्रा रियासत के राजकुमार के शिक्षक बने। उन्हीं दिनों उन्होंने मात्र 29 वर्ष की आयु में मासिक ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ की शुरुआत की थी।
‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन बंद होने के बाद उन्होंने नागपुर में राष्ट्रीय चेतना से संपन्न प्रबुद्ध लोगों के सहयोग से ‘हिंदी केसरी’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन प्रारंभ किया। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का दौर था। उन्होंने इस हिंदी साप्ताहिक का प्रकाशन राष्ट्रीय चेतना के विस्तार तथा महान स्वतंत्रता सेनानी, विद्वान लेखक और पत्रकार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के मराठी लेखों को हिंदी पाठकों तक पहुंचाने के उद्देश्य से किया था।
सप्रे जी भी राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार हुए थे
तिलक जी उन दिनों मराठी भाषा के अपने साप्ताहिक ‘केसरी’ में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी विचारों से परिपूर्ण लेख लिखा करते थे। पंडित माधवराव सप्रे को ‘हिंदी केसरी’ में प्रकाशित तिलक जी के चार लेखों के कारण 2 अगस्त 1908 को भारतीय दंड संहिता की धारा 124(ए) के अंतर्गत राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि कुछ महीनों बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
सप्रे जी के साथ एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार तथा ‘देशसेवक’ के संपादक कोल्हटकर जी को भी इसी आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
तिलक जी के महाग्रंथ ‘गीता रहस्य’ का हिंदी अनुवाद
पंडित माधवराव सप्रे ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘गीता रहस्य’ (श्रीमद्भगवद्गीता अथवा कर्मयोग शास्त्र) का हिंदी अनुवाद किया था। लगभग 900 पृष्ठों का यह मराठी महाग्रंथ वर्ष 1915 में प्रकाशित हुआ था, जबकि इसका हिंदी अनुवाद वर्ष 1916 में प्रकाशित हुआ।
तिलक जी ने इस ग्रंथ की रचना उस समय की थी, जब उन्हें गिरफ्तार कर म्यांमार के मंडाले कारागार में रखा गया था। जेल में रहते हुए उन्होंने 2 नवंबर 1910 से 30 मार्च 1911 के बीच मात्र पांच महीनों में इस महान कृति की रचना की।
पंडित माधवराव सप्रे ने मराठी साहित्यकार चिंतामणि विनायक वैद्य द्वारा रचित ‘महाभारत उपसंहार’ का हिंदी अनुवाद ‘महाभारत मीमांसा’ शीर्षक से किया, जो वर्ष 1920 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने समर्थ श्री रामदास के प्रसिद्ध मराठी ग्रंथ ‘दासबोध’ का भी हिंदी अनुवाद किया।
सप्रे जी ने वर्ष 1906 में नागपुर से ‘हिंदी ग्रंथमाला’ का प्रकाशन प्रारंभ किया था। देहरादून में 9 से 11 नवंबर 1924 तक आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन के पंद्रहवें अधिवेशन की अध्यक्षता भी उन्होंने की थी।
उन्होंने बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से रायपुर में वर्ष 1912 में जानकी देवी कन्या पाठशाला की स्थापना की। उनकी प्रेरणा से वर्ष 1900 में रायपुर में आनंद समाज पुस्तकालय की स्थापना हुई, जो स्वतंत्रता संग्राम के दौर में राष्ट्रीय चेतना का एक प्रमुख केंद्र बना।
पंडित माधवराव सप्रे केवल पत्रकार और साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि वे राष्ट्रीय चेतना, शिक्षा, भाषा और सामाजिक जागरण के ऐसे पुरोधा थे, जिनकी विरासत आज भी हिंदी पत्रकारिता और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना को प्रेरणा देती है। उनके द्वारा लगाया गया पत्रकारिता का पौधा आज एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है।

