पर्यावरण संकट को लेकर हमारी चुप्पी: शर्मनाक भी और खतरनाक भी!

वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्लॉगर
हम आखिर कैसी दुनिया चाहते हैं? क्या हमें हरे-भरे वनों, पर्वतीय झरनों और नदियों की अमृत धाराओं से परहेज है? अगर नहीं, तो क्यों हम खामोश रहकर इनकी बर्बादी देखते रहते हैं? यह जरूर है कि हममें से कुछ लोग इनकी रक्षा के लिए संघर्ष करते रहते हैं। उनके जज़्बे को प्रणाम और सलाम, लेकिन पर्यावरण बचाने की लड़ाई में उनका साथ देने वाले हममें से आखिर हैं कितने लोग? जंगल तबाह हो रहे हैं, पहाड़ उजड़ते जा रहे हैं, नदियाँ सूखती जा रही हैं। विश्व पर्यावरण दिवस आज हमें चीख-चीखकर कह रहा है कि तेजी से तबाह हो रहे अपने प्राकृतिक पर्यावरण को बचा लो, लेकिन इन चीखों के जवाब में उन्हें मिलती है हमारी कायरतापूर्ण चुप्पी! यह चुप्पी बेहद शर्मनाक है, चिंताजनक है और बेहद खतरनाक भी।
विश्व पर्यावरण दिवस सिर्फ पौधे लगाने की औपचारिकता तक सीमित नहीं रहना चाहिए। लगाए गए पौधों की देखभाल भी हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए।
देखा जाए तो पर्यावरण के भी कई प्रकार होते हैं। मेरे ख्याल से इनमें पहला है प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें नदी, पहाड़, तालाब, जंगल और झरनों के साथ-साथ समुद्र और वायुमंडल भी शामिल हैं। इसी कड़ी में सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और औद्योगिक पर्यावरण सहित मनुष्य का स्वयं का मानसिक और पारिवारिक पर्यावरण भी है। हमें इन सभी प्रकार के पर्यावरणों की रक्षा करनी होगी, लेकिन इसके लिए सबसे पहले प्राकृतिक पर्यावरण को बचाना होगा। हमारा प्राकृतिक परिवेश अगर स्वच्छ रहेगा, तो बाकी सभी पर्यावरणीय संकट अपने-आप समाप्त होते जाएंगे। अगर हम समाज में सुख, शांति और समृद्धि चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने प्राकृतिक पर्यावरण को बचाना होगा। स्वच्छ पर्यावरण हमारे शारीरिक पर्यावरण को भी स्वस्थ बनाएगा।
तरह-तरह की बीमारियों का असली कारण हमारा प्रदूषित पर्यावरण ही तो है! भारत के संदर्भ में मुझे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2014 में देश में शुरू किए गए स्वच्छ भारत अभियान की याद आ रही है। देश के लाखों गाँवों और हजारों शहरों में इस अभियान के लिए जनभागीदारी के साथ जैसा उत्साहजनक वातावरण बना था, लगता है कि उसकी आँच अब धीमी पड़ गई है। पर्यावरण की स्वच्छता के लिए जिस अच्छे उद्देश्य से और जिस जोशीले अंदाज़ में यह अभियान चलाया गया था, क्या उसी जोश-ओ-खरोश से उसे दोबारा शुरू नहीं किया जा सकता?
लेकिन दिक्कत यह है कि हम सब नागरिक अपने पर्यावरण पर गहराते संकट को लेकर बहुत लापरवाह हैं। सब कुछ जानते-समझते हुए भी इंसान अपने पर्यावरण को दूषित कर रहा है और अपने साथ-साथ अपनी दुनिया को भी तबाही के रास्ते पर ले जा रहा है। पहाड़ों की हरियाली को नोच-खसोट कर उनके नैसर्गिक सौंदर्य को नष्ट करने में अब शायद किसी को कष्ट नहीं होता। बढ़ती जनसंख्या, बढ़ते शहरीकरण और तीव्र गति से फलते-फूलते औद्योगिक विकास की वजह से जल, जंगल, पहाड़ और जमीन आज गंभीर संकट में हैं। अत्यधिक शहरीकरण और सीमेंट-कांक्रीट की लगातार पसरती बस्तियों में, अब तो गाँवों में भी, पक्के मकानों का निर्माण हो रहा है। सीमेंट-कांक्रीट की सड़कें बन रही हैं। इन सबमें प्राकृतिक पत्थरों के उपयोग के लिए मनुष्य और मशीनों के हाथों पहाड़ उजड़ते जा रहे हैं।
हर कोई आज पक्के घरों में रहना चाहता है। इसमें मनुष्य की कई तरह की मजबूरियाँ भी हैं। चारे-पानी की तलाश में गाँवों में आने-जाने वाले बन्दर ग्रामीणों की खपरैल वाली छतों को उजाड़ देते हैं। जंगल कट रहे हैं, तो वहाँ रहने वाले पशु-पक्षियों का जीवन भी खतरे में पड़ गया है। हमें इन सबका विकल्प भी सोचना होगा। नए जंगल लगाने होंगे। उजड़ते पहाड़ों में सघन वृक्षारोपण करना होगा। आधुनिक ड्रोन टेक्नोलॉजी के जरिए उनमें बरसात के दिनों में फलदार, छायादार वृक्षों के बीजों का छिड़काव हो सकता है। शायद उनमें पीपल जैसे वृक्षों के बीजों का छिड़काव भी हो तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं, क्योंकि पीपल की जड़ें कठोर धरती और पत्थरों की दरारों के बीच भी उगने के लिए जगह बना लेती हैं। लोग कहते हैं कि यह चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देने वाला वृक्ष है।
देश में आज प्लास्टिक और पॉलीथिन का कचरा हमारे पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। शहरों के साथ-साथ हमारे गाँव और कस्बे भी प्लास्टिक प्रदूषण के शिकंजे में हैं। अधिकांश लोग जानते हैं कि प्लास्टिक कचरे की रिसाइक्लिंग करके उसे दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है। सड़क निर्माण में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन इंसान हर तरफ प्लास्टिक के डिब्बों, बोतलों और पॉलीथिन की थैलियों का उपयोग करने के बाद उन्हें लापरवाही से इधर-उधर फेंककर प्रदूषण फैलाने का अपराध कर रहा है। यहाँ तक कि अब तो हमारे महासागर भी इस प्रदूषण की चपेट में आ गए हैं। यह एक अच्छी पहल है कि भारत सरकार द्वारा देश के कई शहरों में प्लास्टिक इंजीनियरिंग संस्थान संचालित किए जा रहे हैं, जहाँ युवाओं को इस विषय में प्रशिक्षण के साथ डिग्री और प्रमाणपत्र भी दिए जाते हैं। प्लास्टिक रिसाइक्लिंग में इन युवाओं की प्रतिभा का उपयोग करते हुए उन्हें रोजगार के अवसर दिए जा सकते हैं।
अगर देश में कृषि उपजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की तरह प्लास्टिक कचरे की सरकारी खरीदी के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित हो और जगह-जगह खरीदी केंद्र बना दिए जाएँ, तो जहाँ बड़ी संख्या में गरीबों को कुछ अतिरिक्त आमदनी हो सकती है, वहीं हमारे चारों ओर प्लास्टिक और पॉलीथिन के बेतरतीब फैलते लाखों टुकड़े काफी हद तक साफ हो जाएँगे।
दुनिया भर में कई देशों द्वारा समुद्र और जमीन के भीतर तथा हवा में किए जाने वाले परमाणु हथियारों के परीक्षण भी बढ़ते प्रदूषण का एक खतरनाक कारण बन गए हैं। पूरी दुनिया में परमाणु परीक्षणों और परमाणु हथियारों पर कड़ा प्रतिबंध लगा देना चाहिए। लगभग दो दशक पहले हुए अमेरिका-इराक युद्ध, वर्ष 2021 से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध और इस वर्ष 2026 में अमेरिका, इजराइल तथा ईरान के बीच हो रही लड़ाई में जिस बड़े पैमाने पर बमबारी हुई और हो भी रही है, क्या उससे जन-धन की हानि के साथ-साथ पर्यावरण का भी विनाश नहीं हुआ होगा? लेबनान पर इजराइली हमलों में भी जन-धन और पर्यावरण का भारी विनाश हुआ ही होगा।
आज जरूरत इस बात की है कि पर्यावरण और मानवता की रक्षा के लिए ऐसे युद्ध तत्काल रोके जाएँ और पूरी दुनिया में धरती के मरणासन्न हरित आवरण को नया जीवन दिया जाए।
पर्यावरण की रक्षा केवल सरकारों का दायित्व नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक का नैतिक और सामाजिक दायित्व भी है। यदि हम आज भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी। विश्व पर्यावरण दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि हम केवल पौधे लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री न मान लें, बल्कि जल, जंगल, जमीन, नदियों, पहाड़ों और स्वच्छ वायु की रक्षा के लिए निरंतर सक्रिय रहें। हमारी चुप्पी समस्या का समाधान नहीं है। पर्यावरण संकट के खिलाफ जागरूकता, जनभागीदारी और सतत प्रयास ही भविष्य को सुरक्षित बना सकते हैं।

