क्या अल नीनो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों से अल-नीनो के प्रभाव के मद्देनजर जल संरक्षण बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तैयार रहने को कहा है। तब मेरा ध्यान इसकी आपदा की गंभीरता की ओर गया। वरना ऐसी चेतावनियां तो भिन्न भिन्न विषयों को लेकर लगातार आती रहती हैं। इसके साथ ही विश्व मौसम संगठन ने वर्ष 2026 में अल नीनो के विकसित होने की प्रबल संभावना व्यक्त की है। इसके साथ ही भारत मौसम विज्ञान विभाग ने भी सामान्य से कम वर्षा की आशंका जताई है। इन संकेतों ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या अल नीनो भारत के लिए वास्तव में खतरे की घंटी है।
भारत की अर्थव्यवस्था को यदि किसी एक प्राकृतिक घटना से सबसे अधिक प्रभावित होने वाली अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाए, तो उसमें मानसून का स्थान सबसे ऊपर होगा। भारत आज विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल तकनीक तक अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर है। ऐसे में जब प्रशांत महासागर से यह खबर आती है कि अल नीनो विकसित हो रहा है और मानसून को प्रभावित कर सकता है, तो यह केवल मौसम वैज्ञानिकों की चिंता नहीं रहती, बल्कि किसानों, व्यापारियों, उद्योगों, नीति निर्माताओं और आम नागरिकों की चिंता भी बन जाती है।
आखिर क्या है अल नीनो?
अल नीनो एक समुद्री और वायुमंडलीय घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग का जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इससे वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में वर्षा तथा तापमान के पैटर्न बदल जाते हैं। भारत में इसका सबसे बड़ा प्रभाव दक्षिण पश्चिम मानसून पर पड़ता है। सामान्यतः अल नीनो वाले वर्षों में भारत में वर्षा कम होने की संभावना बढ़ जाती है।
हालांकि हर अल नीनो वर्ष सूखे का कारण बने, यह आवश्यक नहीं है, लेकिन इतिहास बताता है कि भारत के कई बड़े सूखे अल नीनो वर्षों के दौरान ही आए हैं। वर्ष 2002 और 2009 इसके प्रमुख उदाहरण हैं, जब कमजोर मानसून ने कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया था।
भारतीय अर्थव्यवस्था और मानसून का संबंध।
भारत की लगभग आधी कृषि भूमि आज भी वर्षा पर निर्भर है। मानसून देश की वार्षिक वर्षा का लगभग 70 प्रतिशत भाग प्रदान करता है। खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का, दलहन, तिलहन और कपास की बुवाई सीधे मानसून पर निर्भर करती है। यदि वर्षा कम होती है तो उत्पादन घटता है, किसानों की आय कम होती है और ग्रामीण बाजारों में मांग कमजोर पड़ जाती है।
यद्यपि कृषि का प्रत्यक्ष योगदान सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15 से 18 प्रतिशत के बीच है, लेकिन देश की बड़ी आबादी की आजीविका इसी क्षेत्र से जुड़ी हुई है। इसलिए कृषि क्षेत्र में आने वाला संकट केवल खेत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका प्रभाव उपभोग, व्यापार, परिवहन और उद्योगों तक पहुंचता है।
पहला खतरा- कृषि उत्पादन पर असर
अल नीनो का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव कृषि क्षेत्र पर दिखाई देता है। यदि मानसून कमजोर पड़ता है तो बुवाई का क्षेत्र घट सकता है, फसल की वृद्धि प्रभावित हो सकती है और उत्पादन कम हो सकता है। विशेष रूप से वे क्षेत्र अधिक प्रभावित होते हैं जहां सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं।
वर्ष 2026 के लिए जारी विभिन्न आकलनों में आशंका व्यक्त की गई है कि कमजोर मानसून धान, दलहन और तिलहन जैसी फसलों के उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। एशिया के कई देशों में पहले ही गर्म और शुष्क मौसम के कारण बुवाई प्रभावित होने की रिपोर्ट सामने आ चुकी है।
यदि उत्पादन घटता है तो इसका सीधा असर खाद्य उपलब्धता और किसानों की आय पर पड़ता है। किसान कम आय अर्जित करते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग क्षमता घटती है। इसका प्रभाव ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल, उपभोक्ता वस्तुओं और निर्माण गतिविधियों तक देखा जाता है।
दूसरा खतरा – महंगाई का बढना
अल नीनो का दूसरा बड़ा प्रभाव खाद्य मुद्रास्फीति के रूप में सामने आता है। भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाद्य पदार्थों का बड़ा हिस्सा है। जब वर्षा कम होती है और उत्पादन घटता है, तब सब्जियों, फलों, दालों और खाद्यान्नों की कीमतें बढ़ने लगती हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक ने भी अल नीनो को मुद्रास्फीति के लिए एक संभावित जोखिम माना है। यदि खाद्य कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो महंगाई नियंत्रण के प्रयास कठिन हो जाते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में जब वैश्विक ऊर्जा कीमतों में भी अनिश्चितता बनी हुई है, तब कमजोर मानसून और बढ़ती खाद्य कीमतें दोहरी चुनौती पैदा कर सकती हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि कमजोर मानसून की स्थिति में खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ सकती है और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
तीसरा खतरा- ग्रामीण क्षेत्रों की क्रय शक्ति में कमी
भारत की अर्थव्यवस्था में ग्रामीण उपभोग का महत्वपूर्ण योगदान है। अच्छी फसल होने पर ग्रामीण क्षेत्रों में क्रय शक्ति बढ़ती है। लोग कृषि उपकरण खरीदते हैं, घर बनवाते हैं, उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ती है और स्थानीय बाजारों में गतिविधियां तेज होती हैं।
लेकिन जब फसल खराब होती है तो किसान अपनी आय का बड़ा हिस्सा केवल आवश्यक खर्चों पर लगाते हैं। इससे गैर आवश्यक वस्तुओं की मांग कम हो जाती है। उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियां, दोपहिया वाहन उद्योग, सीमेंट और निर्माण क्षेत्र तक इसका प्रभाव महसूस करते हैं। इस प्रकार अल नीनो केवल खेतों को प्रभावित नहीं करता, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति को भी धीमा कर सकता है।
चौथा खतरा- जल एवं ऊर्जा संकट
कम वर्षा का प्रभाव केवल कृषि तक सीमित नहीं रहता। जलाशयों में पानी कम आने से पेयजल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। कई राज्यों में सिंचाई परियोजनाओं पर दबाव बढ़ सकता है। जलाशयों का जलस्तर कम होने से जलविद्युत उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। दूसरी ओर अधिक गर्मी के कारण बिजली की मांग बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप ऊर्जा क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यदि स्थिति गंभीर होती है तो राज्यों को अतिरिक्त बिजली खरीदनी पड़ सकती है, जिससे वित्तीय बोझ बढ़ सकता है।
सकल घरेलू उत्पाद पर असर
यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या अल नीनो भारत की आर्थिक वृद्धि को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। कुछ दशक पहले इसका उत्तर संभवतः “हाँ” होता, लेकिन आज स्थिति कुछ बदली हुई है। भारत की अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में अधिक विविध हो चुकी है। सेवा क्षेत्र, विनिर्माण और डिजिटल अर्थव्यवस्था का योगदान बढ़ा है। इसलिए केवल कृषि क्षेत्र की कमजोरी से संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर पहले जैसा प्रभाव नहीं पड़ता।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अल नीनो के साथ गंभीर सूखा भी जुड़ जाए तो आर्थिक वृद्धि दर में कुछ कमी आ सकती है। कुछ आकलनों के अनुसार ऐसी स्थिति में वृद्धि दर पर 0.20 से 0.65 प्रतिशत अंक तक का प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए यह कहना उचित होगा कि आज अल नीनो भारत की अर्थव्यवस्था को रोक नहीं सकता, लेकिन उसकी गति को धीमा अवश्य कर सकता है।
क्या भारत इस संकट से निपटने तैयार है?
हाँ! पिछले दो दशकों में भारत ने सिंचाई सुविधाओं का विस्तार किया है। माइक्रो इरिगेशन, ड्रिप सिंचाई, बेहतर बीज, मौसम पूर्वानुमान प्रणाली और कृषि तकनीकों ने किसानों की क्षमता बढ़ाई है। रिजर्व बैंक ने भी अपनी रिपोर्ट में माना है कि सिंचाई और तकनीकी प्रगति अल नीनो के प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकती है। इसके अतिरिक्त देश के पास पर्याप्त खाद्यान्न भंडार मौजूद हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली और विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाएं भी संकट की स्थिति में राहत प्रदान कर सकती हैं।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, मनरेगा और अन्य ग्रामीण योजनाएं भी ग्रामीण आय को सहारा देने में मदद कर सकती हैं। आर्थिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों के बीच गहरा संबंध है। आधुनिक तकनीक और मजबूत वित्तीय संस्थानों के बावजूद भारत अभी भी मानसून पर निर्भर है। जल संरक्षण, सिंचाई विस्तार, फसल विविधीकरण और जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देना अब केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं बल्कि आर्थिक आवश्यकता भी बन चुका है।
भविष्य की अर्थव्यवस्था वही होगी जो जलवायु जोखिमों के प्रति अधिक लचीली होगी। यदि भारत वर्षा पर निर्भरता कम करने, जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और कृषि में नवाचार को बढ़ावा देने में सफल होता है, तो अल नीनो जैसी घटनाएं उसके विकास को बाधित नहीं कर पाएंगी।

