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शिक्षा बाज़ार बनी और विद्यार्थी उपभोक्ता : कोचिंग संस्कृति

मनोज श्रीवास्तव

पिछले कुछ दशकों में भारत में एक विचित्र परिघटना घटी है। शिक्षा संस्थान — जो किसी भी समाज की आत्मा को पोषित करने वाले स्थल होते हैं — वे धीरे-धीरे उसी समाज के विरुद्ध खड़े होते गये। यह परिघटना न तो आकस्मिक है, न अनायास। इसके पीछे एक दीर्घकालिक, सुनियोजित और बहुस्तरीय प्रयास है जिसे समझे बिना हम न तो इसकी गहराई जान सकते हैं, न इसका प्रतिकार कर सकते हैं।

उन्होंने पहले विश्वविद्यालयों पर अपनी आयरन ग्रिप कायम की और उन्हें अपने ही देश के धर्म और संस्कृति और परंपराओं और जीवन-मूल्यों के विरुद्ध खड़ा कर विष-विद्यालयों में बदल दिया। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में एक विचित्र विरोधाभास उभरा। देश तो स्वतन्त्र हो गया, किन्तु उसके बौद्धिक तंत्र पर वही मानसिकता हावी रही जो उपनिवेशवाद की देन थी। मैकाले की शिक्षा-नीति के साँचे को स्वतन्त्रता के बाद बदला नहीं गया — बल्कि इसमें एक नया आयाम जुड़ा: वामपन्थी वैचारिकी का वर्चस्व।

विश्वविद्यालयों में क्रमशः ऐसे विभाग स्थापित हुए, ऐसे पाठ्यक्रम निर्मित हुए और ऐसे अध्यापकों की नियुक्तियाँ हुईं जो एक विशेष वैचारिक दृष्टि के प्रतिनिधि थे। इतिहास-विभागों में भारत के अतीत को केवल दमन, जाति-उत्पीड़न और अन्धविश्वास की कहानी के रूप में प्रस्तुत किया गया। दर्शन-विभागों में पश्चिमी आधुनिकता को ही एकमात्र तर्कसंगत विकल्प घोषित किया गया। साहित्य-विभागों में भारतीय शास्त्रीय साहित्य को या तो उपेक्षित किया गया या पोस्ट-कोलोनियल लेंस से इस प्रकार पढ़ा गया कि उसका आत्मिक सौन्दर्य विकृत हो जाए।

यह ग्रिप केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं थी। नियुक्ति-प्रक्रियाओं में वैचारिक समानता को अघोषित मापदण्ड बनाया गया। शोध-अनुदान उन्हीं विषयों पर मिले जो स्थापित वैचारिक ढाँचे में फिट बैठते थे। छात्र-संघों के माध्यम से एक विशेष राजनीतिक चेतना को संस्थागत रूप दिया गया।

और सबसे घातक — भारतीय परम्पराओं, संस्कृति, धर्म और जीवन-मूल्यों को बौद्धिक रूप से हेय सिद्ध किया गया। यह काम बड़े परिश्रम और कौशल से किया गया। जो छात्र इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेते थे, वे अपनी संस्कृति में एक स्वाभाविक गर्व और जिज्ञासा लेकर आते थे — और कुछ वर्षों में वे उसी संस्कृति को “रिग्रेसिव,” “ब्राह्मणवादी,” “पितृसत्तात्मक” और “अन्धविश्वासी” कहने लगते थे। यह रूपांतरण आकस्मिक नहीं था — यह एक व्यवस्थित प्रक्रिया का परिणाम था।

इसे विद्रोह कहा गया — किन्तु वास्तव में यह द्रोह था। विद्रोह वह होता है जो किसी स्वदेशी अन्याय के विरुद्ध उठता है और न्याय की स्थापना का प्रयत्न करता है। द्रोह वह है जो विदेशी प्रेरणाओं से संचालित होकर अपने ही मूलों को काटता है। इन बौद्धिक तंत्रों ने जो निर्मित किया वह विद्रोही चेतना नहीं — द्रोही चेतना थी। वे अपने देश की परम्पराओं से लड़ रहे थे, उनसे नहीं जिन्होंने इस देश को शताब्दियों तक लूटा।

फिर जब नई शिक्षा नीति से वह ग्रिप ढीली पड़ने लगी तो अन्य गोचर तलाशने लगे। २०२० में जब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हुई तो उसने विश्वविद्यालयी ढाँचे में कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों का मार्ग खोला। भारतीय भाषाओं में शिक्षा पर बल, भारतीय ज्ञान परम्परा को पाठ्यक्रम में स्थान, स्थानीय संस्कृतियों की पुनर्प्रतिष्ठा — ये सब उन लोगों के लिए असुविधाजनक थे जिन्होंने दशकों तक विश्वविद्यालयों को अपने वैचारिक दुर्गों के रूप में संचालित किया था।जब यह स्पष्ट होने लगा कि विश्वविद्यालयों पर वह एकाधिकार जो दशकों में स्थापित हुआ था, वह अब उतना निरापद नहीं रहेगा — तब उनकी दृष्टि एक नये रणनीतिक क्षेत्र की ओर गई।

और यह नया क्षेत्र था — कोचिंग उद्योग। तब दृष्टि में आये वे कोचिंग संस्थान जो एक मेगा-इंडस्ट्री का रूप ले चुके हैं। भारत में कोचिंग उद्योग का विस्तार पिछले तीन दशकों में अभूतपूर्व रहा है। कोटा, दिल्ली, हैदराबाद, पटना — ये शहर आज “कोचिंग हब” के रूप में जाने जाते हैं। IIT-JEE, NEET, UPSC, Banking, SSC — हर प्रतियोगिता के लिए एक विशाल तैयारी-तंत्र खड़ा हो गया है। कुछ अनुमानों के अनुसार भारत का कोचिंग उद्योग एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का हो चुका है।यह उद्योग उन लाखों युवाओं की आकांक्षाओं पर खड़ा है जो एक सुरक्षित भविष्य, एक प्रतिष्ठित पद और सामाजिक गतिशीलता की तलाश में हैं। इसमें कोई दोष नहीं। किन्तु जब पूँजी का कलुषित संगठन होता है, जब कार्टेल बनते हैं, जब शिक्षा को एक उत्पाद और छात्र को एक उपभोक्ता बना दिया जाता है — तब जो विकृतियाँ उत्पन्न होती हैं वे केवल आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक भी होती हैं। कोचिंग उद्योग की संरचनात्मक विकृतियाँ कई स्तरों पर दिखाई देती हैं:

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प्रथम — आर्थिक शोषण का तंत्र: लाखों रुपये की फीस, छात्रावास की अमानवीय परिस्थितियाँ, असफलता पर मानसिक दबाव और परिजनों पर वित्तीय बोझ — यह सब एक ऐसी व्यवस्था की देन है जो मुनाफे को अधिकतम करने के लिए मानवीय संवेदना को न्यूनतम करती है।

द्वितीय — प्रॉफिट मैक्सिमाइजेशन का तर्क: जब शिक्षा और करियर के निर्णय निजी कंपनियों पर छोड़ दिये जाते हैं और सरकारी व्यवस्थाएँ भी उन्हीं पर भरोसा करने लगती हैं — तब प्राइवेट सेक्टर का एकमात्र लक्ष्य प्रॉफिट मैक्सिमाइजेशन शेष रहता है। इस लक्ष्य के लिए वह हर उस साधन का उपयोग करता है जो उसकी पहुँच में हो — चाहे वह छात्रों की मनोवैज्ञानिक कमज़ोरी हो, माता-पिता की असुरक्षा हो, या बाज़ार में उपलब्ध वैचारिक सामग्री हो।

तृतीय — कोटा की त्रासदी: कोटा में छात्र आत्महत्याओं की संख्या एक ऐसी व्यवस्था की निर्मम साक्षी है जहाँ एक पन्द्रह-सोलह वर्ष का बच्चा अपने माता-पिता के सपनों का बोझ, अपनी असफलता का भय और अकेलेपन की पीड़ा एक साथ नहीं सह पाता। यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं — यह एक व्यवस्था की विफलता है।

कोचिंग संस्थानों में impressionable mind के बच्चों के भीतर वही विचार जो विद्रोही कम और द्रोही ज्यादा हैं, उतारे जाने लगे। इसे द्रोही विचार इसलिए कहना उचित है क्योंकि ये विचार अपने देश की आत्मा को कमज़ोर करते हैं। विद्रोह में एक निर्माण की भावना होती है — मैं इस अन्याय को तोड़कर एक बेहतर व्यवस्था बनाऊँगा। द्रोह में केवल विनाश है — मैं इस सब को नकारता हूँ, इसकी जड़ें काटता हूँ, इसके स्थान पर क्या रखूँगा यह मुझे नहीं पता।

कोचिंग उद्योग की सबसे गहरी और सबसे कम चर्चित समस्या आर्थिक नहीं है। वह है — उन मनों पर विचारों का रोपण जो अभी कच्ची मिट्टी की तरह हैं।पन्द्रह से बाईस वर्ष की आयु के युवा मस्तिष्क की एक विशेषता है — वह प्राधिकार (authority) के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होता है। जो व्यक्ति उसे IIT या UPSC की राह दिखाने का दावा करता है, वह उसके लिए न केवल शिक्षक, बल्कि एक प्रकार का मार्गदर्शक, आदर्श और नायक बन जाता है। इस सम्बन्ध में एक विशेष प्रकार की शक्ति निहित है — और शक्ति का दुरुपयोग सदैव सम्भव है।जब इस शक्ति का उपयोग केवल गणित के सूत्र या रसायन की प्रतिक्रियाएँ सिखाने में होता है, तब यह सामान्य शिक्षण-सम्बन्ध है। किन्तु जब इसका उपयोग विशेष वैचारिक सामग्री के अंतरण के लिए होने लगता है — तब यह शिक्षण नहीं, एक प्रकार का मानसिक उपनिवेशीकरण है। और यह हो रहा है। कोचिंग कक्षाओं में, ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्मों पर, यूट्यूब के माध्यम से — वही विचार जो विश्वविद्यालयों में दशकों से प्रसारित होते रहे — अब कोचिंग के आवरण में युवाओं तक पहुँच रहे हैं। भारत की संस्कृति को “रिग्रेसिव” बताना, धार्मिक परम्पराओं को “अन्धविश्वास” कहना, राष्ट्रवाद को “संकीर्णता” घोषित करना — ये सब शिक्षा के नाम पर परोसे जा रहे हैं। कोचिंग संस्थानों में शिक्षण की वही टॉप डाउन एप्रोच है जो औपचारिक शिक्षा में है। वही unhealthy submission है जो passive conformity में रहेंगे बिना किसी क्रिटिकल एंगेजमेंट के। वे कभी autonomous individuals तैयार ही नहीं कर पाते।

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जो कोचिंग शिक्षा प्रणाली है, उसका दोष यही नहीं है कि वह पूँजी का कलुषित संगठन कर कार्टेल खड़ा करती है, वह यह है कि उसमें शिक्षा का वही मॉडल है जिसमें शिक्षक एक authority है और प्राधिकार को ही सत्य का एकमात्र स्रोत मानने वाली मानसिकी की मैन्यूफ़ैक्चरिंग होती है। पारंपरिक शिक्षा के इस पहलू पर कई शिक्षाविदों ने पहले भी चिंता भारत के बाहर भी व्यक्त की है।

तो ज़ेन जी को यदि विश्वविद्यालयों में अपने लिए appropriate नहीं किया जा सकता तो कैरियर कोचिंग के नये पॉवर सेंटर्स की डायनेमिक्स का उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार की शिक्षा में शिक्षक एक absolute authority है। वह जो कहे वही सत्य है। प्रश्न करने की न परम्परा है, न प्रोत्साहन। “टीचर ने बोला” — यह किसी भी तर्क का अन्त करने के लिए पर्याप्त है। इस मानसिकी की मैन्यूफ़ैक्चरिंग होती है — ऐसे मन तैयार किये जाते हैं जो प्राधिकार को ही सत्य का एकमात्र स्रोत मानते हैं।

यह बात भारत के बाहर के शिक्षाविदों ने भी कही है। पाउलो फ्रेयर ने अपनी पुस्तक Pedagogy of the Oppressed में इसे “banking model of education” कहा था — जिसमें शिक्षार्थी एक खाली पात्र है और शिक्षक उसमें ज्ञान जमा करता है। इस मॉडल में कोई संवाद नहीं, कोई विवेक नहीं, कोई स्वतन्त्र चिन्तन नहीं।

इवान इलिच ने Deschooling Society में तर्क दिया कि संस्थागत शिक्षा स्वाभाविक जिज्ञासा को नष्ट करती है और dependence निर्मित करती है। जॉन डेवी ने experiential learning पर बल दिया। किन्तु भारतीय कोचिंग उद्योग इन सारी अंतर्दृष्टियों से अछूता रहा — क्योंकि उसका लक्ष्य स्वतन्त्र चिन्तक तैयार करना नहीं, उत्तर-पुस्तिका भरने वाले कुशल यन्त्र तैयार करना है।

अब कल्पना करें कि इस प्राधिकार-केन्द्रित व्यवस्था में यदि वह authority स्वयं एक विशेष वैचारिक एजेण्डे से संचालित हो — तो परिणाम क्या होगा? वे युवा जिन्हें प्राधिकार पर प्रश्न करना ही नहीं आता, वे उस authority के द्वारा दिये गये विचारों को भी बिना परीक्षण के स्वीकार कर लेंगे।

यह एक दोहरी त्रासदी है — एक ओर ये युवा अपनी परम्परा से कट रहे हैं, दूसरी ओर वे उस विचार को भी क्रिटिकली examine करने में असमर्थ हैं जो उन्हें परम्परा से काट रहा है। वे न अपने मूलों में जड़े हैं, न किसी स्वतन्त्र विवेक से सम्पन्न। वे केवल एक नये प्राधिकार के अनुयायी हैं — और यह नया प्राधिकार उन्हें अपनी ही सभ्यता का शत्रु बना रहा है।

Gen Z को उनकी संवेदनशीलता के माध्यम से, उनकी authenticity की चाहत के माध्यम से, उनकी digital connectivity के माध्यम से — एक विशेष वैचारिक दिशा में मोड़ा जा सकता है।

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और इसके लिए कोचिंग प्लेटफ़ॉर्म एक आदर्श माध्यम है। क्यों?

पहला — विश्वसनीयता: जो शिक्षक आपको IIT या UPSC की तैयारी करा रहा है, उस पर आपका असाधारण विश्वास है। उसके अन्य विचारों को भी आप उसी विश्वास के साथ ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखते हैं।

दूसरा — कमज़ोरी का क्षण: करियर की तैयारी के दौरान युवा अत्यन्त vulnerable होते हैं। वे असुरक्षित हैं, भविष्य की चिन्ता में हैं, परिवार की अपेक्षाओं का बोझ है। इस अवस्था में वे किसी भी मजबूत आवाज़ की ओर आकर्षित होते हैं जो उन्हें दिशा दे।

तीसरा — डिजिटल गुणन: एक कोचिंग शिक्षक का एक वीडियो लाखों तक पहुँचता है। यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम — ये सब amplification के माध्यम हैं। जो विचार एक कक्षा में पचास छात्रों तक पहुँचता था, वह अब पचास लाख तक पहुँच सकता है।

जब शिक्षा और कैरियर के सम्बन्ध में व्यवस्थाएँ भी निजी कंपनियों पर भरोसा कर रही हों और विद्यार्थी और युवा भी

और प्राइवेट सेक्टर का लक्ष्य प्रॉफिट मैक्सिमाइजेशन हो  तब यही तबाहियाँ होंगी।

प्राइवेट सेक्टर का प्राथमिक लक्ष्य प्रॉफिट मैक्सिमाइजेशन है — और यह स्वाभाविक भी है। किन्तु जब यह लक्ष्य शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करता है तो कुछ विचित्र परिणाम निकलते हैं।

पहला — वह content सफल होता है जो engagement बढ़ाये, जो viral हो, जो controversy create करे। क्रान्तिकारी, anti-establishment, “सच बोलने वाले” शिक्षकों की brand value अधिक होती है। और यह brand उन्हें और अधिक विवादास्पद, और अधिक उत्तेजक content बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है।

दूसरा — इस competition में वे platforms और educators आगे आते हैं जो अपने छात्रों की emotional needs को समझकर उनका दोहन करते हैं। असुरक्षा को बढ़ाओ, फिर solution बेचो। यह न केवल अनैतिक है — यह मनोवैज्ञानिक रूप से हानिकारक है।

तीसरा — जब शिक्षा का commodity बनना और वैचारिक agenda का संयोग होता है — तब जो उत्पन्न होता है वह एक अत्यन्त घातक मिश्रण है। इसमें अर्थ की शक्ति है, विचार का आवेग है, और युवाओं की vulnerability का दोहन है।

जब जाति-व्यवस्था की आलोचना के नाम पर वेदों को नकारा जाए, जब सती-प्रथा की आलोचना के नाम पर भारतीय स्त्री की समृद्ध आध्यात्मिक परम्परा को मिटाया जाए, जब मध्यकालीन आक्रान्ताओं की क्रूरता को “सांस्कृतिक आदान-प्रदान” के रूप में पेश किया जाए तो यह वैचारिक बेईमानी है। और इसीलिए इसे द्रोही कहना उचित है — क्योंकि यह एक चयनात्मक और पूर्वाग्रहग्रस्त दृष्टि से संचालित है।

यह आकस्मिक नहीं है। विश्वविद्यालयों की निवेदिताओं को जब कश्मीर फाइल्स आदि ने सफलतापूर्वक फाश कर दिया

तो अब कोई दिव्ययश हैं जो प्राचीन भारत में शिक्षा को शत-प्रतिशत ब्राह्मण आरक्षण की चीज बता रहे हैं

कोई पटना वाले हैं जो कह देते हैं कि “If Suresh does it, it’s fine. If Abdul does it, the police will thrash him.” या यह कि सड़क पर पड़े पत्थर पर लाल टीका लगा दो तो वह भगवान हो जाता है

कोई दो झा टाइप हैं जो राजनीतिक पार्टी के सदस्य हैं और कोचिंग चला रहे हैं और हनुमान की भक्ति पर कटाक्ष भी कर रहे हैं

कोई मोहतरमा भक्ति आंदोलन को इस्लाम-प्रेरित बता रही हैं

कोई हिंदू सोशल स्ट्रक्चर्स की historical rigidity बता रही हैं

हिंदू हेट विश्वविद्यालयों से इन Wish-विद्यालयों तक चली आई है।

 

— मनोज श्रीवास्तव ( राज्य निर्वाचन आयुक्त मप्र)