futuredसम्पादकीय

बुके कल्चर सम्मान या संसाधनों का अपव्यय?

आचार्य ललित मुनि

भारतीय संस्कृति में अतिथि सत्कार केवल एक सामाजिक व्यवहार नहीं, बल्कि परम्परा का अभिन्न अंग है। “अतिथि देवो भवः” की भावना ने हमारे समाज को सदियों तक दिशा दी है। सम्मान प्रकट करने के अनेक भारतीय तरीके रहे हैं। तिलक लगाना, अक्षत अर्पित करना, श्रीफल भेंट करना, अंगवस्त्र ओढ़ाना, पुष्पमाला पहनाना, पुस्तक देना अथवा स्मृति चिह्न प्रदान करना हमारी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं। इन सभी में सम्मान के साथ उपयोगिता, प्रतीकात्मकता और सांस्कृतिक आत्मीयता का समावेश होता था।

किन्तु पिछले दो दशकों में एक नई प्रवृत्ति तेजी से विकसित हुई है, जिसे “बुके कल्चर” कहा जा सकता है। आज किसी भी सरकारी, राजनीतिक, सामाजिक या शैक्षणिक कार्यक्रम में अतिथि के स्वागत का पहला माध्यम फूलों का महंगा गुलदस्ता बन गया है। मंत्री, सांसद, विधायक, अधिकारी अथवा विशिष्ट अतिथि मंच पर पहुँचते हैं और कुछ ही मिनटों में उनके हाथों में कई-कई बुके दिखाई देने लगते हैं।  बुके न किसी के खाने के काम आता न पहनने के, न स्थाई रुप से प्रदर्शित करने के। कार्यक्रम समाप्त होते ही अधिकांश बुके या तो कार्यक्रम स्थलों पर छोड़ दिये जाते हैं या कुछ घंटों बाद कचरे का हिस्सा बन जाते हैं।

प्रश्न यह है कि क्या सम्मान की यह पद्धति वास्तव में सार्थक है?

यह भी पढ़ें  जमीनी साहित्यकार थे बाबा नागार्जुन : आज उनकी जयंती

आजकल कोई छोटा सा कार्यकर्ता या अधिकारी बड़ा सा बुके लेकर नेताओं और अधिकारियों के पास स्वागत करने पहुंच जाता है, एक फ़ोटो खिंचाने के बाद उसका कोई उपयोग नहीं रहता। इस बुके संस्कृति का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव आर्थिक अपव्यय के रूप में सामने आता है। आज एक सामान्य औपचारिक बुके की कीमत पाँच सौ से लेकर कई हजार रुपये तक होती है। यदि किसी जिले में वर्षभर आयोजित होने वाले सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों का आकलन किया जाए तो केवल बुके पर लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं। पूरे राज्य और देश के स्तर पर यह राशि करोड़ों रुपये तक पहुँच जाती है। यह वह धन है जिसे पुस्तकालयों, वृक्षारोपण, छात्रवृत्तियों, सार्वजनिक सुविधाओं अथवा सामाजिक कल्याण के कार्यों में लगाया जा सकता है।

इससे भी बड़ी चिंता पर्यावरणीय दृष्टि से है। एक बुके के निर्माण में फ़ूलों की खेती में सिंचाई, रासायनिक उर्वरकों, परिवहन तथा प्लास्टिक पैकिंग का उपयोग होता है। अधिकांश बुके सेलोफेन, प्लास्टिक रिबन और कृत्रिम सजावट से सुसज्जित होते हैं। फूल कुछ दिनों में नष्ट हो जाते हैं, लेकिन प्लास्टिक का कचरा वर्षों तक पर्यावरण को प्रदूषित करता रहता है। विडंबना यह है कि पर्यावरण संरक्षण पर आयोजित कार्यक्रमों में भी अनेक बार प्लास्टिकयुक्त बुके भेंट किए जाते हैं।

यह भी पढ़ें  संघ की सौ वर्ष की यात्रा, आवश्यकता और लक्ष्य को उकेरती महत्त्वपूर्ण कृति

भारतीय परंपरा हमें इससे बेहतर विकल्प प्रदान करती है। हमारे पूर्वज सम्मान को प्रदर्शन से नहीं, बल्कि भाव से जोड़ते थे। श्रीफल समृद्धि का प्रतीक था, अंगवस्त्र आदर का, पुस्तक ज्ञान का और पौधा जीवन का। यदि किसी अतिथि को एक पौधा भेंट किया जाए तो वह केवल स्वागत का प्रतीक नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले वर्षों तक हरियाली, ऑक्सीजन और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता रहेगा। यदि पुस्तक भेंट की जाए तो वह ज्ञान का प्रसार करेगी। यदि स्थानीय हस्तशिल्प दिया जाए तो स्थानीय कारीगरों की आजीविका को भी बल मिलेगा।

“बुके” (Bouquet) शब्द फ्रांसीसी भाषा (French) से आया है। फ्रेंच शब्द “bouquet” का मूल अर्थ था फूलों का गुच्छा या सजाकर बांधे गए फूलों का समूह। प्रारंभिक फ्रेंच में इसका एक अर्थ पेड़ों की छोटी टहनी या झाड़ी का गुच्छा भी है।आधुनिक “बुके” मूलतः यूरोपीय शैली का पुष्पगुच्छ है, जबकि भारतीय संस्कृति में फूलों द्वारा सम्मान और स्वागत की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। आज जिस रूप में हम फूलों का बुके भेंट करने की संस्कृति देखते हैं, उसे विशेष लोकप्रियता 19वीं शताब्दी के विक्टोरियन इंग्लैंड में मिली।

आज आवश्यकता बुके कल्चर को समाप्त करने की नहीं, भारतीय संस्कृति अपनाने की है। जिससे सम्मान की भावना बनी रहे, परंतु उसके साथ उपयोगिता और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व भी जुड़ें। अनेक संस्थाओं ने “बुके नहीं, पौधा” अभियान चलाकर इस दिशा में सकारात्मक पहल की है। कई विश्वविद्यालयों, सामाजिक संगठनों और प्रशासनिक अधिकारियों ने भी स्वागत के लिए पौधे, पुस्तकें और स्थानीय उत्पाद भेंट करने की परंपरा आरंभ की है। यह परिवर्तन स्वागत योग्य है।

यह भी पढ़ें  रामगढ़ को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में लाने के लिए शोध एवं संकल्प की आवश्यकता

भारत ने विश्व को प्रकृति के प्रति श्रद्धा का संदेश दिया है। यहाँ नदियाँ माता हैं, वृक्ष पूजनीय हैं और धरती को देवी का स्वरूप माना गया है। ऐसे देश में यदि सम्मान की परंपराएँ भी प्रकृति के अनुकूल हों तो यह हमारी सांस्कृतिक चेतना और पर्यावरणीय प्रतिबद्धता दोनों का परिचायक होगा।

समय आ गया है किसी को तो पहल करनी पड़ेगी। नेताओं और अधिकारियों को बुके संस्कृति पर पुनर्विचार करना चाहिए। कार्य ऐसा हो कि सम्मान बना रहे, पर अपव्यय समाप्त हो। परंपरा जीवित रहे, पर प्रकृति भी सुरक्षित रहे। यदि हम बुके के स्थान पर पौधा, पुस्तक या भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों को अपनाएँ, तो यह केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं होगा, बल्कि भारतीयता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।