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विश्वव्यापी अस्थिरता और भारत का आत्मसंयम

कहावत है “यथा राजा तथा प्रजा” अर्थात् नेतृत्वकर्ता राजा के अनुसार ही उसकी प्रजा का आचरण, विचार और चरित्र ढल जाता है। आज इसी कहावत को चरितार्थ करने भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी ने विश्व के बदलते परिदृश्य को भांपते हुए संसाधनों के सदुपयोग हेतु अपने व्यवहारिक जीवन में पहल करते हुए भारत के नागरिकों का आव्हान किया है। कारण……

आज विश्व आर्थिक, सामरिक और ऊर्जा संबंधी उथल-पुथल से गुजर रहा है, उसने प्रत्येक राष्ट्र को अपनी आंतरिक शक्ति, आत्मनिर्भरता और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य कर दिया है। पश्चिम एशिया में उत्पन्न संकट क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, उसका सीधा प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति, व्यापारिक संतुलन और मुद्रा विनिमय पर पड़ रहा है। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले विकासशील राष्ट्र के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं, खाद्य तेलों और कुछ अन्य आवश्यक वस्तुओं के लिए अब भी वृहत स्तर पर आयात पर निर्भर है।

ऐसे समय में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी द्वारा देशवासियों से किए गए सात आह्वान राष्ट्रहित, आर्थिक राष्ट्रवाद, आत्मसंयम, आत्मनिर्भरता और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना से प्रेरित एक व्यापक राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक हैं। इन आह्वान के पीछे का मूल भाव यही है कि जब संकट के समय राष्ट्र सरकारों के प्रयासों से सुरक्षित नहीं होता, तब राष्ट्र अपने नागरिकों की ओर देखता है।प्रत्येक नागरिक की जीवनशैली, उपभोग की आदतें और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध ही विपरीत परिस्थितियों में राष्ट्र को सशक्त बनाता हैं।

भारत अपनी ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं का बड़ा भाग विदेशों से आयात करता है। इसलिए प्रधानमंत्री द्वारा पेट्रोल और डीजल की बचत का आग्रह किया गया। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका सीधा प्रभाव देश की महंगाई, परिवहन व्यवस्था, कृषि लागत और आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन, कारपूलिंग और इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग व्यक्तिगत सुविधा के साथ राष्ट्रहित का दायित्व को भी पूरा करता है। यह आवाहन हमारा जीवन-दर्शन है जिसमें संसाधनों का संयमित उपयोग और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व को अत्यंत महत्व दिया गया है।

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सोना न खरीदने की अपील भी अत्यंत गहरी आर्थिक समझ से जुड़ी हुई है। भारत में सोना के आभूषण सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक सुरक्षा का प्रतीक माने जाते है। अत्यधिक सोने का आयात देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालता है। आकस्मिक परिस्थितियों में भारत विदेशी मुद्रा- ऊर्जा, कच्चे माल और आवश्यक वस्तुओं के आयात हेतु सुरक्षित रखना चाहता है। यह तभी संभव है जब हम निश्चित समय के लिए सोना करे करना बंद करदें। प्रधानमंत्री का यह संदेश त्याग और राष्ट्रीय अनुशासन की भावना को जागृत करता है कि यदि देश कठिन परिस्थिति से गुजर रहा हो, तो नागरिकों को भी अपनी कुछ व्यक्तिगत इच्छाओं को सीमित करना चाहिए।

विदेश यात्राओं और विदेशों में डेस्टिनेशन वेडिंग से बचने का आवाहन भी इसी आर्थिक राष्ट्रवाद की एक कड़ी है। जब बड़ी मात्रा में भारतीय धन विदेशी पर्यटन, विलासिता और आयोजनों में व्यय होता है, तो उसका प्रतिकूल प्रभाव देश की मुद्रा पर पड़ता है। इसके विपरीत यदि वही धन भारत के भीतर पर्यटन, होटल उद्योग, हस्तशिल्प और स्थानीय सेवाओं पर व्यय हो, तो वह भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देता है। यह संदेश आर्थिक, सांस्कृतिक आत्मगौरव से भी जुड़ा हुआ है।

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महामारी के समय भारत ने अनुभव किया कि तकनीक के माध्यम से अनेक कार्य बिना अनावश्यक यात्रा के भी प्रभावी ढंग से किए जा सकते हैं। यदि कर्मचारी प्रतिदिन कम यात्रा करेंगे, तो ईंधन की बचत होगी, प्रदूषण घटेगा, यातायात का दबाव कम होगा और समय की भी बचत होगी। वर्क फ्रॉम होम और वर्चुअल मीटिंग्स को प्रोत्साहन देने के पीछे भी इसी बचत का भाव है। इससे आर्थिक बचत भी होगी ,पर्यावरणीय संतुलित रहेगा और आधुनिक कार्य-संस्कृति के निर्माण की दिशा में सकारात्मक परिवर्तन होगा।

खाने के तेल की खपत कम करने और अनावश्यक उपयोग से बचने का संदेश भारत की खाद्य सुरक्षा और आयात निर्भरता से जुड़ा हुआ है। भारत बड़ी मात्रा में खाद्य तेल विदेशों से आयात करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण इन वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होती है या कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका सीधा प्रभाव आम जनता पर पड़ता है। संयमित उपयोग और स्वस्थ खानपान की आदतें आयात व्ययको कम करेंगी, नागरिक भी स्वास्थ्य रहेंगे। यह संदेश स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आत्मसंयम—तीनों का समन्वय प्रस्तुत करता है।

प्राकृतिक और जैविक खेती को अपनाने के पीछे कृषि सुधार के साथ दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा भी जुड़ी है। रासायनिक खाद बड़ी मात्रा में बाहर से आयात करनी पड़ती है। हमें छूट ( सब्सिडी) पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि वैश्विक संकट के कारण उर्वरकों की आपूर्ति बाधित होती है, तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। प्राकृतिक खेती भारतीय कृषि परंपरा के अधिक निकट है, जो भूमि की उर्वरता, जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने में सहायक है। इससे किसान आत्मनिर्भर बन सकते हैं और कृषि लागत भी कम होगी। यह पहल “धरती माता” के संरक्षण और सतत विकास की भारतीय अवधारणा को भी पुनर्जीवित करती है।

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‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों के समर्थन का संदेश इन सभी आवाहनों का “केंद्रबिंदु” कहा जा सकता है। जब नागरिक स्वदेशी वस्तुओं को प्राथमिकता देते हैं, तब देश का उद्योग, रोजगार, लघु उद्यम, हस्तशिल्प और नवाचार सशक्त होते हैं। यह आर्थिक नीति आत्मगौरव और राष्ट्रीय आत्मविश्वास का प्रतीक है। स्वदेशी का विचार भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा है। आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा के युग में वही भावना आधुनिक रूप में पुनः दिखाई देती है।

यदि हम समग्र रूप से देखें तो प्रधानमंत्री के ये सात आवाहन तात्कालिक संकट से निपटने के उपायों के साथ गहरी राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा है। मोदी जी का यह संदेश नागरिकों को उपभोक्ता से राष्ट्रनिर्माता बनने का आह्वान करता है। इसमें त्याग है, अनुशासन है, आत्मसंयम है और सबसे महत्वपूर्ण—राष्ट्रहित को व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर रखने की प्रेरणा है। संकट के समय वही राष्ट्र अधिक मजबूत बनकर उभरते हैं जिनके नागरिक अधिकारों के स्थान पर अपने कर्तव्यों को अधिक महत्व देते हैं। प्रधानमंत्री का यह आवाहन उसी राष्ट्रीय उत्तरदायित्व और सामूहिक संकल्प का प्रतीक है।

डॉ नुपूर निखिल देशकर