futuredहमारे नायक

कालापानी का वह अमर तपस्वी : वीर सावरकर

आचार्य ललित मुनि

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें एक ऐसा नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा जिसने न केवल अपना यौवन, अपना परिवार और अपना सुख देश की बलिवेदी पर अर्पित किया, बल्कि काल की सबसे क्रूर यातना को भी साधना में परिवर्तित कर दिया। वह नाम है विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें संसार “वीर सावरकर” के नाम से जानता है। उन्हें “अमर तपस्वी” इसलिए नहीं कहा जाता कि उन्होंने किसी वन में तपस्या की, बल्कि इसलिए कहा जाता है कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे भयानक कारागार में, जहाँ मनुष्य की देह और आत्मा दोनों को तोड़ने का प्रयास किया जाता था, अपनी राष्ट्रचेतना की ज्योति को कभी बुझने नहीं दिया। कालापानी की सजा, अर्थात अंडमान द्वीप की सेल्युलर जेल, उस काल में मृत्यु से भी अधिक भयावह समझी जाती थी। इस दंड को पाने वाला व्यक्ति न केवल अपनी मातृभूमि से कट जाता था, बल्कि समाज की स्मृति से भी विलुप्त हो जाता था। ऐसे नरक में भी सावरकर ने जो किया, वह इतिहास का एक असाधारण अध्याय है।

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर ग्राम में हुआ था। उनके पिता दामोदरपंत सावरकर एक सम्माननीय परिवार के व्यक्ति थे। बालक विनायक जब मात्र नौ वर्ष का था, तभी उसकी माता का देहांत हो गया और कुछ वर्षों बाद पिता भी चल बसे। इस दुःख ने उसे तोड़ा नहीं, बल्कि उसके भीतर एक ऐसी अग्नि प्रज्वलित कर दी जो आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य के लिए असह्य सिद्ध हुई। बचपन में ही सावरकर ने अपने साथियों को संगठित कर “मित्र मेला” नामक संगठन बनाया, जो आगे चलकर “अभिनव भारत” के रूप में विकसित हुआ। यह कोई साधारण बच्चों का खेल समूह नहीं था, यह एक विचार की नींव थी। छत्रपति शिवाजी महाराज और राणा प्रताप की वीरगाथाएँ सुनकर पले इस बालक के मन में भारत की पराधीनता एक असह्य घाव की तरह थी। विदेशी शासन के प्रति उनका विद्रोह बौद्धिक भी था और भावनात्मक भी, जो उन्हें अपने समकालीन अनेक नेताओं से अलग करता था।

पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में अध्ययन के दौरान सावरकर की प्रतिभा और उनका राष्ट्रवादी तेज दोनों उभरकर सामने आए। बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं के विचारों से प्रेरणा लेकर वे क्रांतिकारी गतिविधियों में जुट गए। 1906 में वे बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए लंदन गए, जहाँ श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापित “इंडिया हाउस” उनका केंद्र बन गया। यह वही स्थान था जहाँ भारत की आज़ादी के लिए सोचने वाले तरुण एकत्र होते थे, योजनाएँ बनाते थे और विदेशी धरती पर बैठकर अपने देश की मुक्ति के स्वप्न देखते थे। सावरकर ने वहाँ 1857 के संग्राम पर एक ऐसी पुस्तक लिखी जो ब्रिटिश सरकार के लिए इतनी खतरनाक थी कि उसे प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया। उस पुस्तक का नाम था “द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857।” इसमें सावरकर ने उस घटना को, जिसे अंग्रेज़ “सिपाही विद्रोह” कहकर तुच्छ सिद्ध करते थे, भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम घोषित किया। यह केवल इतिहास लेखन नहीं था, यह एक वैचारिक विस्फोट था जिसने भारतीय युवाओं की चेतना को झकझोर दिया।

लंदन में ब्रिटिश सरकार की पैनी नज़रें सावरकर पर लगातार थीं। 1910 में उन्हें लंदन में गिरफ्तार किया गया। जब उन्हें जहाज़ में भारत लाया जा रहा था, तब फ्रांस के मार्सेई बंदरगाह के पास उन्होंने एक ऐसा साहसिक कदम उठाया जो इतिहास में अमर हो गया। वे जहाज़ की एक छोटी खिड़की से समुद्र में कूद पड़े और तैरकर फ्रेंच भूमि तक पहुँचने का प्रयास किया। उस समय अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार यदि वे फ्रांसीसी भूमि पर पहुँच जाते, तो ब्रिटेन उन्हें वापस नहीं ले जा सकता था। पर भाग्य को कुछ और ही मंज़ूर था। फ्रांसीसी पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और ब्रिटिश अधिकारियों को सौंप दिया। यह घटना उस काल में पूरे यूरोप में चर्चा का विषय बनी। एक भारतीय क्रांतिकारी ने अपने देश की आज़ादी के लिए जान की बाज़ी लगाकर जो साहस दिखाया, उसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को स्तब्ध कर दिया।

यह भी पढ़ें  लोकतंत्र में शासक वर्ग की निजी दुनिया दिल्ली जिमखाना क्लब?

भारत लाकर उन पर मुकदमा चलाया गया और 1911 में उन्हें दो आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई, अर्थात पचास वर्ष। इस सज़ा के साथ उन्हें कालापानी भेजा गया, जो अंडमान की सेल्युलर जेल थी। इस जेल का निर्माण अंग्रेज़ों ने विशेष रूप से भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को तोड़ने के लिए किया था। इसकी संरचना इस प्रकार बनाई गई थी कि प्रत्येक बंदी दूसरे से सर्वथा अलग रहे। सात भुजाओं में फैला यह विशाल भवन 696 एकांत कोठरियों से युक्त था, जिनमें एक कैदी को दूसरे की आवाज़ भी सुनाई न दे। यहाँ पहुँचने वाला व्यक्ति अपने परिवार से, अपने देश से, यहाँ तक कि अपनी मनुष्यता से भी काट दिया जाता था।

सावरकर को यहाँ जो यातनाएँ दी गईं, उनका वर्णन पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्हें कोल्हू में जोता जाता था, जैसे किसी बैल को जोता जाता है। प्रतिदिन तीस पाउंड नारियल का तेल निकालना उनकी नियत दिनचर्या थी। यदि लक्ष्य पूरा न हो तो कोड़ों की मार। हाथों और पैरों में बेड़ियाँ। अपमानजनक काम। और सबसे भयावह था एकांत, वह भयावह चुप्पी जो धीरे धीरे मनुष्य के मन को खोखला कर देती है। अनेक कैदी इन यातनाओं को सहन न कर पाने के कारण पागल हो गए या आत्महत्या कर ली। सावरकर के बड़े भाई गणेश सावरकर भी उसी जेल में बंद थे, पर दोनों भाइयों को एक दूसरे से मिलने की अनुमति नहीं थी। यह मानसिक यातना शायद शारीरिक पीड़ा से भी अधिक असह्य थी।

किंतु इसी नरक में वह घटना हुई जो सावरकर को “अमर तपस्वी” बनाती है। जहाँ अन्य टूट रहे थे, वहाँ सावरकर ने कारागार को अपनी साधना का स्थल बना लिया। उनके पास न कागज़ था, न कलम। लिखने की अनुमति नहीं थी। किंतु उनका मन रुका नहीं। उन्होंने जेल की दीवारों पर काँटों और नाखूनों से कविताएँ लिखीं। जब वे दीवारें भी भर गईं, तो उन्होंने रचनाओं को अपनी स्मृति में सुरक्षित कर लिया। हज़ारों पंक्तियाँ उन्होंने केवल मस्तिष्क में संग्रहीत कीं और जब कभी कोई साथी कैदी रिहा होकर बाहर जाता, तो उसे वे पंक्तियाँ कंठस्थ करा देते, ताकि संसार उन्हें जान सके। उनकी रचना “कमला” और “गोमांतक” इसी प्रकार जेल की दीवारों से निकलकर संसार तक पहुँचीं। यह केवल साहित्य सृजन नहीं था, यह एक जीवित आत्मा की घोषणा थी कि अत्याचार उसे मिटा नहीं सका।

यह भी पढ़ें  पुरुषोत्तमी एकादशी और वैष्णव भक्ति परंपरा

सावरकर ने जेल के भीतर अन्य कैदियों के बीच भी अपना काम जारी रखा। उन्होंने साथी बंदियों को शिक्षित करने का प्रयास किया। निराश और टूटे हुए लोगों में आत्मबल का संचार किया। उन्होंने देखा कि जेल में अनेक अछूत और निम्न जाति के लोग थे, जिनके साथ भेदभाव होता था। सावरकर ने इसका विरोध किया और समानता का व्यवहार करने पर बल दिया। जाति व्यवस्था के प्रति उनका विरोध केवल राजनीतिक नहीं था, वह मानवीय था। वे मानते थे कि जब तक हिंदू समाज जातिभेद और अस्पृश्यता से ग्रस्त रहेगा, तब तक वह न एकजुट हो सकता है और न ही स्वाधीनता के लिए सक्षम लड़ाई लड़ सकता है।

सावरकर का साहित्य और उनके विचार उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों जितने ही महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने “हिंदुत्व” की अवधारणा दी, जो उनके लिए एक धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान थी। उनके अनुसार हिंदुत्व एक जीवनशैली और सभ्यता का बोध है, जो इस भूमि से उत्पन्न हुई और इस भूमि से जुड़ी है। वे विज्ञान और तर्क के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने धर्मांधता और रूढ़िवाद दोनों का विरोध किया। सामाजिक सुधार के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने न केवल अस्पृश्यता का विरोध किया, बल्कि अंतर्जातीय भोज और विधवा विवाह जैसे प्रयोगों को व्यावहारिक स्तर पर प्रोत्साहित किया। वे आधुनिक शिक्षा, वैज्ञानिक चिंतन और सैन्य शक्ति को भारत की मुक्ति के लिए अनिवार्य मानते थे। उनका कहना था कि स्वतंत्रता केवल अहिंसा और प्रार्थना से नहीं मिलती, उसके लिए संगठन, शक्ति और राजनीतिक दूरदर्शिता भी चाहिए।

1921 में सावरकर को अंडमान से रत्नागिरी स्थानांतरित किया गया, जहाँ वे 1924 तक नज़रबंद रहे। इसके बाद उन्हें कुछ शर्तों के साथ रत्नागिरी में ही रहने की अनुमति मिली। वहाँ उन्होंने पतित पावन मंदिर की स्थापना की, जहाँ सभी जातियों के लोग एक साथ प्रवेश कर सकते थे। यह उस काल में एक क्रांतिकारी कदम था। उन्होंने समाज सुधार के कार्यों में गहराई से भाग लिया। 1937 में नज़रबंदी हटने के बाद वे अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हुए। उनका यह मानना था कि स्वतंत्रता के बाद भारत को एक सशक्त, आत्मनिर्भर और एकजुट राष्ट्र बनाना होगा। सैन्य शक्ति और आत्मरक्षा पर उनका विशेष बल था, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के उस काल में बहुत प्रासंगिक था।

सावरकर के जीवन और विचारों से जुड़े कुछ विवाद भी हैं, जिनका संतुलित विवेचना आवश्यक है। अंडमान से रिहाई के लिए उनके द्वारा ब्रिटिश सरकार को लिखे गए पत्रों पर कुछ इतिहासकार प्रश्न उठाते हैं। उनके आलोचक इसे समर्पण कहते हैं, जबकि उनके समर्थक इसे एक रणनीतिक कदम मानते हैं। यह तथ्य है कि अनेक क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों ने ब्रिटिश सरकार से माफी माँगी और रिहाई पाई, यह उस काल की एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया थी। महात्मा गांधी जी ने भी समय समय पर ब्रिटिश सरकार से समझौते किए और बातचीत की। सावरकर के बारे में यह भी विवाद है कि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद उन पर षड्यंत्र में शामिल होने का आरोप लगाया गया, किंतु न्यायालय ने उन्हें सबूतों के अभाव में दोषमुक्त कर दिया। इतिहास के इन प्रश्नों को केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि तथ्यों की कसौटी पर परखकर समझना आवश्यक है।

यह भी पढ़ें  प्रधानमंत्री के रूप में श्रीनरेंद्र मोदी के बारह वर्ष : बिना अवकाश लिये निरंतर कार्य करने का कीर्तिमान

सावरकर का पारिवारिक जीवन भी बलिदान की एक मार्मिक गाथा है। उनकी पत्नी यमुनाबाई ने अपने पति के कारागार में रहने के वे वर्ष घोर दरिद्रता और सामाजिक उपेक्षा में बिताए। बच्चे पिता के स्नेह से वंचित रहे। जिस व्यक्ति ने देश के लिए अपना सब कुछ दे दिया, उसके परिवार को कितना कष्ट झेलना पड़ा, इसकी कल्पना मात्र से हृदय भर आता है। किंतु सावरकर ने कभी इस पीड़ा को अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया। जेल में बिताए वर्षों में उन्होंने जो पत्र लिखे, उनमें परिवार के प्रति उनका प्रेम और देश के प्रति उनकी प्रतिबद्धता दोनों एक साथ दिखाई देते हैं। उनकी कालकोठरी से उठती हर आवाज़ में एक ही स्वर था कि भारत को स्वतंत्र होना ही होगा।

26 फरवरी 1966 को सावरकर ने इस संसार से विदाई ली। अंतिम समय में उन्होंने अपने जीवन को स्वेच्छा से समाप्त करने का निर्णय किया, जिसे उन्होंने “आत्मार्पण” कहा। उन्होंने खाना और दवाई छोड़ दी। उनका कहना था कि जब जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो जाए और शरीर असमर्थ हो जाए, तो मृत्यु की प्रतीक्षा करने से मृत्यु का वरण करना श्रेयस्कर है। यह निर्णय भी उनके उसी विचार की अभिव्यक्ति था जो कहता था कि मनुष्य को अपने जीवन और मृत्यु दोनों पर अधिकार होना चाहिए।

आज जब हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं और राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान तथा आत्मनिर्भरता जैसे प्रश्नों पर विमर्श होता है, तो सावरकर के विचार अत्यंत प्रासंगिक हो उठते हैं। उन्होंने जो कहा था कि भारत को अपनी सैन्य शक्ति मज़बूत करनी होगी, आज वह नीति हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार है। उन्होंने जो कहा था कि जाति और धर्म के नाम पर समाज को बाँटने से राष्ट्र कमज़ोर होता है, आज वह चेतावनी और भी प्रासंगिक लगती है। उन्होंने विज्ञान और तर्क के आधार पर समाज के पुनर्निर्माण की बात की थी, आज का आधुनिक भारत उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। युवाओं के लिए सावरकर का जीवन यह संदेश देता है कि परिस्थितियाँ कितनी भी विषम हों, साहस और संकल्प से मनुष्य उन्हें पार कर सकता है।

कालापानी की वे काली कोठरियाँ आज भी अंडमान में खड़ी हैं। पर्यटक वहाँ जाते हैं और उन बंद दरवाज़ों को देखकर कल्पना भी नहीं कर पाते कि उनमें कितने जीवन तड़पे और कितने सपने दफन हुए। किंतु उन्हीं दीवारों पर उकेरी गई सावरकर की कविताओं की गूँज आज भी सुनाई देती है। वह गूँज केवल शब्दों की नहीं, उस अदम्य आत्मा की है जिसने कहा था कि हम टूटेंगे नहीं। वीर सावरकर केवल एक व्यक्ति नहीं हैं, वे एक विचार हैं, एक ऊर्जा हैं, जो यह सिखाती है कि राष्ट्र के लिए जीना और राष्ट्र के लिए कष्ट सहना, यही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उनका जीवन त्याग, तप और राष्ट्रसमर्पण का वह अमिट प्रतीक है जिसे काल की कोई भी आँधी मिटा नहीं सकती। कालापानी की पीड़ा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह अध्याय है, जो हर उस भारतीय के हृदय में जीवित रहना चाहिए जो अपने देश से प्रेम करता है और उन महापुरुषों के प्रति कृतज्ञ है जिन्होंने उसकी स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।