futuredधर्म-अध्यात्म

व्रत, दान और तप की त्रिवेणी अचला एकादशी

आचार्य ललित मुनि

भारत पर्वों की भूमि है और यहाँ प्रत्येक पर्व केवल कैलेंडर का एक दिन नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है जो सदियों की सांस्कृतिक स्मृति को अपने भीतर समेटे हुए है। वर्ष में चौबीस एकादशियाँ आती हैं और इनमें से प्रत्येक का अपना महात्म्य है, अपनी कथा है, अपना लोक है। इन सबमें ‘अचला एकादशी’ का स्थान विशेष है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को अचला एकादशी कहा जाता है। ‘अचला’ अर्थात जो चलायमान न हो, जो स्थिर हो, जो अटल हो। इस नाम में ही इस व्रत का सार छिपा है अर्थात ऐसा व्रत जो मनुष्य की श्रद्धा को अचल बनाए, उसके मन को स्थिर करे और उसकी मुक्ति को सुनिश्चित करे।

ग्रामीण भारत में यह पर्व केवल उपवास का दिन नहीं है। यह सामूहिकता का उत्सव है, लोकस्मृति की अभिव्यक्ति है और उस सनातन विश्वास का प्रकाशन है जो भारत के जन-जन में अनादि काल से प्रवाहित हो रहा है। खेत-खलिहानों से लेकर नदी के घाटों तक, आम के बागों से लेकर मंदिर के प्रांगणों तक, अचला एकादशी की महक और माहौल जिस तरह फैलता है, वह किसी साहित्यिक रचना से कम नहीं।

एकादशी व्रत की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। भविष्योत्तर पुराण, पद्म पुराण, स्कंद पुराण और विष्णु पुराण में एकादशी के महात्म्य का विस्तृत वर्णन है। पद्म पुराण के उत्तर खंड में ‘एकादशी माहात्म्य’ नामक एक पूर्ण अध्याय है जिसमें प्रत्येक एकादशी की कथा और उसके फल का वर्णन है। भविष्योत्तर पुराण में राजा युधिष्ठिर और भगवान कृष्ण के संवाद के रूप में एकादशी की व्याख्या की गई है।

शास्त्रों के अनुसार एकादशी व्रत का संबंध सीधे भगवान विष्णु से है। वैष्णव परंपरा में इसे सर्वोच्च व्रत माना गया है। चाणक्य ने भी अपने ग्रंथ में स्वस्थ जीवन के लिए मास में दो बार उपवास की अनुशंसा की है, जो एकादशी की वैज्ञानिकता को भी रेखांकित करता है। आयुर्वेद की दृष्टि से भी पंद्रह दिन के अंतर पर उपवास शरीर की पाचन शक्ति को पुनर्जीवित करता है और जठराग्नि को तीव्र करता है।

अचला एकादशी विशेष रूप से ‘अपरा एकादशी’ के नाम से भी जानी जाती है। ‘अपरा’ का अर्थ है जिसकी कोई सीमा न हो, जो असीम हो। इस एकादशी का फल भी असीम बताया गया है। पद्म पुराण में कहा गया है कि इस एकादशी का व्रत करने से ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या और गोहत्या जैसे महापापों से भी मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि जन साधारण में इस एकादशी के प्रति विशेष श्रद्धा है।

यह भी पढ़ें  पश्चिम बंगाल 'शपथ ग्रहण' में प्रतीकों के ज़रिए वैचारिक संदेश

प्रत्येक एकादशी की एक कथा होती है जो उसकी आत्मा होती है। अचला एकादशी की प्रमुख कथा भविष्योत्तर पुराण में उल्लिखित है। इसके अनुसार महाधन नामक एक राजा था जो अत्यंत पापी और दुराचारी था। उसने अनेक अपराध किए थे किंतु जब उसने एक बार अनजाने में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का व्रत किया तो उसके सारे पाप नष्ट हो गए और उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। इस कथा का सार यह है कि ईश्वर की कृपा सबके लिए समान है और व्रत की शक्ति अपरिसीम है।

ग्रामीण भारत में इस कथा के अनेक स्थानीय संस्करण प्रचलित हैं। राजस्थान के गाँवों में एक प्रचलित लोककथा के अनुसार एक निर्धन ब्राह्मण स्त्री प्रतिवर्ष अचला एकादशी का व्रत करती थी। उसके कठोर व्रत और निष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसके पुत्र को यमराज के मुँह से बचा लिया। मध्यप्रदेश के वनवासी अंचलों में इस एकादशी को ‘भगवान की ग्यारस’ कहा जाता है और यहाँ इससे जुड़ी अनेक स्थानीय कहानियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं।

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में अचला एकादशी की कथा को ‘एकादशी माता की कहानी’ के रूप में कहा जाता है। इसमें एकादशी को एक देवी के रूप में चित्रित किया जाता है जो अपने भक्तों की रक्षा करती है। यह लोकीकरण भारतीय संस्कृति की उस विशेषता को दर्शाता है जहाँ पुराण और लोक एक-दूसरे में समाकर एक अभेद्य सांस्कृतिक ताना-बाना बनाते हैं।

अचला एकादशी में दान का विशेष महत्व है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस एकादशी पर किया गया दान अश्वमेध यज्ञ के समान फल देता है। ग्रामीण भारत में इस दिन अन्नदान, वस्त्रदान, जलदान और स्वर्णदान की परंपरा है। ज्येष्ठ की तपती गर्मी में जलदान को सर्वोच्च माना जाता है।

राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के गाँवों में इस दिन ‘प्याऊ’ लगाने की परंपरा है। गाँव के संपन्न परिवार सड़क किनारे ठंडे जल के मटके रखवाते हैं और राहगीरों को पानी पिलाते हैं। शर्बत और छाछ का वितरण भी होता है। बिहार और झारखंड के गाँवों में इस दिन ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन कराने की परंपरा है।

महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के गाँवों में ‘सत्तू दान’ की विशेष परंपरा है। सत्तू गर्मी में शीतल होता है और इसका दान इस ऋतु में अत्यंत उपयोगी होता है। इस प्रकार भारतीय पर्वों का धार्मिक विधान और व्यावहारिक जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, वे परस्पर पूरक हैं।

यह भी पढ़ें  भारतीय संस्कृति में परिचर्या परंपरा प्राचीन काल से आधुनिक नर्सिंग तक

दान की इस परंपरा में एक गहरा आर्थिक और सामाजिक समता का संदेश छिपा है। गाँव के संपन्न परिवार इस अवसर पर अपनी समृद्धि को समाज के साथ बाँटते हैं। यह वह अदृश्य सामाजिक संतुलन है जिसे धर्म के माध्यम से बनाए रखा गया। भारत में धर्म और समाज कभी अलग नहीं रहे, वे सदा एक-दूसरे के पूरक रहे हैं

व्रत, दान और तप की इस त्रिवेणी में तप वह आयाम है जो मनुष्य को आंतरिक परिवर्तन की ओर ले जाता है। एकादशी का उपवास केवल शरीर को भूखा रखना नहीं है, यह मन और इंद्रियों को साधने की प्रक्रिया है। भागवत पुराण में तप की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि जो मनुष्य इंद्रियों को वश में करके ईश्वर में मन लगाता है, वही सच्चा तपस्वी है।

ग्रामीण भारत में एकादशी के दिन मनोरंजन और विलास का त्याग किया जाता है। झूठ, क्रोध और निंदा से बचने की कोशिश की जाती है। बड़े-बुजुर्ग इस दिन विशेष रूप से मौन व्रत धारण करते हैं। मौन में एक अद्भुत शक्ति है। जब मनुष्य बोलना बंद करता है तो वह सुनना शुरू करता है, अपने भीतर की आवाज को, ईश्वर की वाणी को। यह आत्मावलोकन ही तप का मूल स्वरूप है।

उत्तराखंड के पहाड़ी गाँवों में एकादशी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करके पूजा करने की परंपरा है। गंगा, यमुना और अन्य पवित्र नदियों के तट पर इस दिन स्नान का विशेष महत्व है। इस तप में शरीर, मन और आत्मा तीनों की शुद्धि का भाव समाहित है।

ग्रामीण भारत में एकादशी व्रत की परंपरा को जीवित रखने में स्त्रियों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही है। घर की माताएँ और दादी-नानी इस व्रत को पीढ़ियों से करती आई हैं और अपनी बेटियों और बहुओं को इस परंपरा से जोड़ती रही हैं। एकादशी के दिन गाँव की महिलाएँ सामूहिक रूप से मंदिर जाती हैं, वहाँ भजन गाती हैं और एक-दूसरे से भेंट करती हैं। यह एक अनौपचारिक सामाजिक संस्था का काम करता है।

लोकगीतों में एकादशी की महिमा गाई जाती है। बुंदेली, भोजपुरी, राजस्थानी और अवधी लोकगीतों में एकादशी का उल्लेख मिलता है। ये गीत महिलाओं द्वारा एकादशी के दिन सामूहिक रूप से गाए जाते हैं। इन गीतों में व्रत की महिमा, भगवान विष्णु की स्तुति और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना होती है।

ओड़िशा के जगन्नाथ पुरी में एकादशी का पर्व विशेष रूप से मनाया जाता है। वहाँ के गाँवों में ‘हरिबोल’ की आवाज गूँजती है और सामूहिक भजन-कीर्तन होता है। पश्चिम बंगाल में वैष्णव परंपरा के अंतर्गत एकादशी का पालन बहुत कठोरता से होता है और गाँवों में ‘कीर्तन’ की परंपरा अत्यंत प्रबल है।

यह भी पढ़ें  पश्चिम बंगाल 'शपथ ग्रहण' में प्रतीकों के ज़रिए वैचारिक संदेश

एकादशी और तुलसी का संबंध अटूट है। विष्णु पूजा में तुलसी अनिवार्य मानी जाती है। ग्रामीण भारत के प्रत्येक घर में तुलसी का पौधा होता है और एकादशी के दिन उसकी विशेष पूजा होती है। सुबह स्नान करके तुलसी को जल चढ़ाना और उसकी परिक्रमा करना इस दिन का अनिवार्य अनुष्ठान है। तुलसी को विष्णुप्रिया माना गया है और इसीलिए विष्णु व्रत में उसका विशेष स्थान है। आयुर्वेद की दृष्टि से भी तुलसी का औषधीय महत्व अपार है। इस प्रकार धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण यहाँ भी एकत्र होते हैं।

एकादशी की परंपरा में एक गहरा सामाजिक दर्शन है। यह पर्व मनुष्य को याद दिलाता है कि वह केवल शरीर नहीं है। उसके भीतर एक आत्मा है जिसे भी पोषण चाहिए। भौतिक जगत में डूबे रहने वाले मनुष्य को यह एकादशी का दिन रुकने, सोचने और ईश्वर से जुड़ने का अवसर देता है। यह आत्मावलोकन और आत्मशुद्धि की प्रक्रिया है।

एकादशी की सामूहिकता में एक गहरा लोकतांत्रिक भाव है। इस दिन राजा और रंक, अमीर और गरीब सब एक साथ मंदिर जाते हैं, एक साथ भजन करते हैं। ऊँच-नीच का भेद उस पल के लिए मिट जाता है। यह भारतीय संस्कृति की वह शक्ति है जो विभिन्न तबकों को एक सूत्र में पिरोती है।

दार्शनिक दृष्टि से एकादशी का व्रत ‘वैराग्य’ और ‘अभ्यास’ का संगम है। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में किया जा सकता है। एकादशी का उपवास इसी अभ्यास का व्यावहारिक रूप है। हर पंद्रहवें दिन इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास करने से मनुष्य की इच्छाशक्ति और आत्मसंयम धीरे-धीरे सुदृढ़ होते हैं।

अचला एकादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह भारतीय जीवनदर्शन की एक जीवंत अभिव्यक्ति है। व्रत में संयम है, दान में करुणा है और तप में साहस है। ये तीनों मिलकर मनुष्य को एक संपूर्ण और संतुलित व्यक्तित्व की ओर ले जाते हैं। ग्रामीण भारत की उस माँ के बारे में सोचिए जो ज्येष्ठ की तपती दोपहर में निर्जला बैठकर भगवान के नाम का जप कर रही है। उसकी उस श्रद्धा में हजारों साल की सांस्कृतिक स्मृति है।