भारतीय संस्कृति में परिचर्या परंपरा प्राचीन काल से आधुनिक नर्सिंग तक

सेवा, करुणा और परिचर्या केवल चिकित्सा विज्ञान के शब्द नहीं हैं, ये भारतीय जीवन दर्शन की आत्मा हैं। जब हम भारतीय संस्कृति में परिचर्या की परंपरा को ढूंढते हैं, तो पाते हैं कि यह परंपरा सहस्त्राब्दियों पुरानी है और वेदों के उद्घोष से लेकर आधुनिक नर्सिंग विज्ञान तक अनवरत प्रवाहित होती रही है। आज जब विश्व स्वास्थ्य संगठन नर्सिंग को स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ मानता है, तब यह जानना अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि भारत में यह चेतना कितनी गहरी और कितनी प्राचीन रही है।
परिचर्या शब्द संस्कृत की ‘परि’ और ‘चर्या’ धातुओं से बना है, जिसका अर्थ है चारों ओर से सेवा करना, चतुर्दिक देखभाल करना। यह केवल शारीरिक सहायता नहीं, बल्कि मानसिक, आत्मिक और सामाजिक समग्रता का भाव है। इसी समग्र दृष्टिकोण के कारण भारतीय परिचर्या परंपरा आज भी विश्व के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है।
वेदों को मानव ज्ञान का प्रथम लिखित स्रोत माना जाता है और इनमें स्वास्थ्य एवं परिचर्या की स्पष्ट अवधारणा उपलब्ध है। ऋग्वेद में अश्विनीकुमारों का उल्लेख मिलता है जो देवताओं के चिकित्सक थे। इन्हें ‘नासत्य’ अर्थात सत्य और ‘दस्र’ अर्थात कुशल कहा गया है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में रोगों से मुक्ति और आरोग्य की प्रार्थनाएं हैं, जो परिचर्या की प्राचीन भावना को व्यक्त करती हैं।
अथर्ववेद में तो चिकित्सा विज्ञान का एक पूरा संसार उपलब्ध है। इसमें भैषजी विद्या का विस्तार से वर्णन है। अथर्ववेद के ‘भैषज्य कांड’ में रोगी की सेवा करने वाले व्यक्ति के गुणों का उल्लेख है। रोगी को स्नेह, सहानुभूति और धैर्य के साथ देखने की बात कही गई है। यजुर्वेद में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ का उद्घोष परिचर्या की सार्वभौमिक भावना को दर्शाता है।
इस काल में वैद्य और परिचर्याकर्ता का भेद स्पष्ट नहीं था। ग्राम वैद्य ही रोगी के घर जाकर उसकी देखभाल करते थे। रोगी के पारिवारिक सदस्य भी इस कार्य में सहभागी होते थे। यह एक सामूहिक और सांस्कृतिक उत्तरदायित्व था।
भारतीय परिचर्या परंपरा का सबसे व्यवस्थित और वैज्ञानिक रूप आयुर्वेद में मिलता है। आचार्य चरक ने ‘चरक संहिता’ में चिकित्सा के चार आधारस्तंभों का उल्लेख किया है जिन्हें ‘चतुष्पाद’ कहा जाता है। ये हैं, वैद्य अर्थात चिकित्सक, द्रव्य अर्थात औषधि, उपस्थाता अर्थात परिचारक या नर्स, और रोगी। यह उल्लेखनीय है कि चरक ने नर्स को चिकित्सा के मूल स्तंभों में सम्मिलित किया।
चरक संहिता के ‘सूत्रस्थान’ में परिचारक के गुणों का विस्तार से वर्णन है। आचार्य चरक के अनुसार एक आदर्श परिचारक को शुचिता अर्थात स्वच्छता, दक्षता, रोगी के प्रति स्नेह और वैद्य के आदेशों का पालन करने की योग्यता होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त उसे शारीरिक और मानसिक दृढ़ता, बुद्धिमत्ता और कुशलता से कार्य करने की क्षमता होनी चाहिए। यह वर्णन आधुनिक नर्सिंग के मानकों से कितना साम्य रखता है, यह देखकर आश्चर्य होता है।
आचार्य सुश्रुत ने ‘सुश्रुत संहिता’ में शल्य चिकित्सा के साथ पश्चात्पाती देखभाल अर्थात पोस्टऑपरेटिव केयर का भी विस्तार से उल्लेख किया है। वे कहते हैं कि शल्यक्रिया के बाद रोगी की सूक्ष्म निगरानी, उचित आहार, घाव की सफाई और मनोबल बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी स्वयं शल्यक्रिया। यह विचार आज की पेरिऑपरेटिव नर्सिंग की आत्मा है। सुश्रुत संहिता में ‘वागभट्ट’ ने भी ‘अष्टांगहृदयम्’ में परिचर्या के सिद्धांतों को और परिष्कृत किया।
भगवान बुद्ध ने करुणा को अपने दर्शन का केंद्र बनाया। उनके जीवन में कई ऐसे प्रसंग हैं जहां उन्होंने स्वयं रोगियों की सेवा की। बौद्ध साहित्य में एक प्रसिद्ध आख्यान है कि एक बार बुद्ध ने एक उपेक्षित रोगी भिक्षु की स्वयं सेवा की और कहा था कि जो मेरी सेवा करना चाहता है, वह रोगियों की सेवा करे। यह वाक्य परिचर्या को एक आध्यात्मिक कर्म का दर्जा देता है।
सम्राट अशोक के शासनकाल में तीसरी शताब्दी ईसापूर्व में भारत में सुव्यवस्थित औषधालयों और चिकित्सालयों की स्थापना हुई। अशोक के शिलालेखों में उल्लेख है कि उन्होंने मनुष्यों और पशुओं दोनों के लिए चिकित्सा केंद्र स्थापित किए। इन केंद्रों में परिचर्याकर्ताओं की व्यवस्था थी। बौद्ध मठों ने भी चिकित्सा सेवा और परिचर्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में आयुर्वेद और परिचर्या की शिक्षा दी जाती थी।
बौद्ध भिक्षुणियाँ भी परिचर्या में अग्रणी थीं। थेरीगाथा में ऐसी भिक्षुणियों का वर्णन है जो रोगियों की सेवा करती थीं। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत में स्त्रियाँ सदियों पहले से चिकित्सा परिचर्या के क्षेत्र में सक्रिय थीं।
मध्यकालीन भारत में परिचर्या की परंपरा मंदिरों, मठों और दरबारों से जुड़ी रही। चोल, पल्लव और विजयनगर साम्राज्य में मंदिर परिसरों के भीतर ‘वैद्यशालाएं’ स्थापित होती थीं। तंजौर के बृहदीश्वर मंदिर के अभिलेखों में चिकित्सकों और परिचारकों के वेतन का उल्लेख मिलता है, जो दर्शाता है कि यह एक संगठित व्यवस्था थी।
इस्लामिक चिकित्सा पद्धति के आगमन के साथ यूनानी चिकित्सा पद्धति भारत में आई। इब्न सीना की ‘किताब अल कानून’ और इसके भारतीय संस्करणों में परिचर्या के सिद्धांत उल्लिखित हैं। मुगलकाल में शाही दरबारों में ‘हकीम’ और उनके सहायक परिचारकों की व्यवस्था थी। बेगम और महारानियाँ अपने महलों में बीमार दासियों और नौकरों की देखभाल के लिए विशेष व्यवस्थाएं रखती थीं।
दक्षिण भारत में ‘अम्मा’ की अवधारणा मातृत्व और परिचर्या को एक करती है। घर की बड़ी स्त्री रोगियों की देखभाल करती, जड़ी-बूटियों से उपचार करती और मनोबल बनाए रखती। यह अनौपचारिक परिचर्या परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रही।
भारत में आधुनिक नर्सिंग शिक्षा का प्रारंभ औपनिवेशिक काल में हुआ। 1854 में क्रीमिया युद्ध के दौरान फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने जो क्रांतिकारी परिवर्तन नर्सिंग में किए, उसका प्रभाव भारत पर भी पड़ा। ब्रिटिश सरकार ने भारत में सैन्य अस्पतालों के लिए प्रशिक्षित नर्सों की आवश्यकता महसूस की। 1871 में मद्रास मेडिकल कॉलेज में नर्सिंग प्रशिक्षण की शुरुआत हुई, जो भारत में संगठित नर्सिंग शिक्षा की नींव थी।
1893 में ‘कलकत्ता नर्सिंग स्कूल’ की स्थापना हुई। इसके बाद अनेक मिशनरी अस्पतालों ने भी नर्सिंग प्रशिक्षण प्रारंभ किया। वेल्लोर में ईसाई चिकित्सा महाविद्यालय की डॉ. इडा स्कडर ने महिला नर्सों के प्रशिक्षण में उल्लेखनीय योगदान दिया। यह उल्लेखनीय है कि इस काल में भारतीय महिलाओं को नर्सिंग पेशे में आने के लिए प्रेरित करना एक सामाजिक चुनौती थी, क्योंकि उस समय सेवा कार्य को हीन माना जाता था।
1908 में ‘एसोसिएशन ऑफ नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट्स ऑफ इंडिया’ की स्थापना हुई, जो बाद में ‘तेनास’ बनी। 1946 में ‘इंडियन नर्सिंग काउंसिल’ की स्थापना हुई जिसने नर्सिंग शिक्षा को राष्ट्रीय स्तर पर नियमित किया। स्वतंत्रता के पश्चात यह संस्था और अधिक सक्रिय हो गई।
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी ने सेवा को राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया। गांधीजी ने स्वयं साबरमती आश्रम में रोगियों की सेवा की और नर्सिंग को एक उच्च नैतिक कार्य का दर्जा दिया। उन्होंने कहा था कि जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करता है, वह ईश्वर की सेवा करता है। उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी आश्रम में रोगियों की देखभाल में सक्रिय भूमिका निभाती थीं।
स्वामी विवेकानंद ने ‘शिव ज्ञान से जीव सेवा’ का नारा दिया। उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ने शिक्षा और चिकित्सा सेवा को एकसाथ चलाया। आज भी रामकृष्ण मिशन के अस्पतालों में सेवा की वही भावना जीवित है जो स्वामीजी ने जागृत की थी। इस प्रकार भारतीय परिचर्या परंपरा को एक नया आध्यात्मिक आयाम प्राप्त हुआ।
स्वतंत्रता के पश्चात भारत में नर्सिंग शिक्षा और सेवाओं का तेजी से विस्तार हुआ। 1947 में देश में मात्र कुछ सौ प्रशिक्षित नर्सें थीं, जबकि आज लाखों नर्सें देश की स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत हैं। 1963 में ‘जनरल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी’ पाठ्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकृत किया गया। 1980 के दशक में ‘बी.एस.सी. नर्सिंग’ की शुरुआत ने नर्सिंग को विश्वविद्यालयी शिक्षा से जोड़ा।
राजीव गांधी सरकार के काल में ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 1983’ में नर्सों की भूमिका को महत्व दिया गया। 2001 में ‘भारतीय नर्सिंग परिषद अधिनियम’ में संशोधन हुआ। ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन’ के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में ‘एएनएम’ अर्थात सहायक नर्स एवं दाई की भूमिका ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांति ला दी। ‘आशा’ कार्यकर्ताओं की नियुक्ति ने परिचर्या को घर-घर तक पहुंचाया।
कोविड महामारी के दौरान 2020 और 2021 में भारत की नर्सों ने जो अतुलनीय साहस और सेवाभाव दिखाया, उसने समस्त विश्व को चकित कर दिया। उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना रात-दिन रोगियों की सेवा की। यह भारतीय परिचर्या की उसी प्राचीन परंपरा का आधुनिक अवतार था जिसकी चर्चा चरक और सुश्रुत ने की थी।
भारतीय नर्सें आज विश्व के लगभग हर देश में सेवारत हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, खाड़ी देशों और कनाडा में भारतीय नर्सें अपनी दक्षता, समर्पण और करुणा के लिए विख्यात हैं। केरल राज्य विशेष रूप से विश्व को सर्वाधिक नर्सें प्रदान करने वाला राज्य माना जाता है। ‘केरल नर्स’ शब्द वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में एक विश्वसनीय ब्रांड बन चुका है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में नर्सों की भारी कमी है और भारत इस कमी को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारतीय नर्सिंग परिषद के अनुसार देश में लगभग 34 लाख पंजीकृत नर्सें हैं। यह संख्या निरंतर बढ़ रही है। ‘एम.एस.सी. नर्सिंग’ और ‘पीएचडी नर्सिंग’ कार्यक्रमों के माध्यम से उच्च शिक्षित नर्सिंग नेतृत्व तैयार हो रहा है।
भारतीय परिचर्या परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल तकनीकी कौशल तक सीमित नहीं रही, इसमें हमेशा मानवीय संवेदना का पुट रहा है। आयुर्वेद का ‘हितकारी वचन’, बौद्ध धर्म की ‘करुणा’, गांधीजी की ‘निःस्वार्थ सेवा’ और आधुनिक नर्सिंग की ‘साक्ष्य आधारित देखभाल’ सब मिलकर एक ऐसी परंपरा का निर्माण करते हैं जो विश्व में अद्वितीय है।
आज योग और आयुर्वेद के साथ नर्सिंग का समन्वय हो रहा है। ‘इंटीग्रेटिव नर्सिंग’ की अवधारणा में भारतीय पद्धतियों को समावेश किया जा रहा है। प्राणायाम, ध्यान और स्पर्श चिकित्सा जैसी भारतीय तकनीकें आधुनिक नर्सिंग अभ्यास में सम्मिलित हो रही हैं। यह उस प्राचीन ज्ञान की पुनर्स्थापना है जो कभी भारत की पहचान था।
वेदों की ऋचाओं से लेकर आधुनिक अस्पतालों की आईसीयू तक, भारत की परिचर्या परंपरा एक अटूट सातत्य की गाथा है। यह परंपरा हमें बताती है कि सेवा कोई पेशा मात्र नहीं, यह एक जीवन दर्शन है। चरक ने जो ‘उपस्थाता’ के गुण बताए थे, फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने जो ‘लैंप की रोशनी’ जलाई, और आज की भारतीय नर्सें जो समर्पण से कार्य करती हैं, ये सब उसी मानवीय करुणा की अभिव्यक्ति हैं। अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस प्रतिवर्ष 12 मई को फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जन्मदिन पर मनाया जाता है, परंतु भारत को गर्व है कि उसकी अपनी परिचर्या परंपरा इससे भी सहस्त्रों वर्ष पुरानी है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

