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हिन्दू चेतना का उदय और तुष्टिकरण की पराजय : बंगाल 2026

पश्चिम बंगाल के मतगणना केन्द्रों से परिणाम 4 मई 2026 की सुबह जब आने लगे, तो भारतीय राजनीति के वे सारे समीकरण धराशायी होते दिखे जो दशकों से अटल माने जाते थे। भारतीय जनता पार्टी ने 292 में से 207 सीटें जीतकर प्रचण्ड बहुमत से तृणमूल कांग्रेस के 15 वर्षों के शासन का अन्त कर दिया। ममता बनर्जी स्वयं अपनी परम्परागत सीट भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी से पराजित हो गईं। यह केवल एक चुनावी उलटफेर नहीं था, यह भारतीय राजनीति के एक युग के समाप्त होने का संकेत था, उस युग का जो “वोट बैंक” की धुरी पर टिका था। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि पहली बार हिन्दूओं ने हिन्दू होकर वोट दिया।

स्वतन्त्रता के पश्चात भारतीय राजनीति में “वोट बैंक” की अवधारणा का उदय हुआ। कांग्रेस ने मुस्लिम समुदाय को अपने साथ बनाए रखने के लिए तुष्टिकरण की नीति अपनाई। हद तो तब हो गई जब 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वारा शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटने के लिए संसद में क़ानून पारित किया। यह मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा थी और यह सबसे विवादास्पद उदाहरण बना, जिसकी चर्चा आज भी होती है। उस निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाहबानो को गुजारा भत्ता दिए जाने का आदेश दिया था।

वामपंथी दलों ने बंगाल में 34 वर्षों तक (1977 से 2011) शासन करते हुए मुस्लिम मतदाताओं को अपने आधार स्तम्भ के रूप में संजोया। उनके बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने इसी नीति को और आगे बढ़ाया। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने भी मुस्लिम मतदाताओं को अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों में केन्द्रीय स्थान दिया, केजरीवाल ने भी दिल्ली में यही किया। राजनीतिक दलों के लिए एक अलिखित नियम बन गया कि मुस्लिम समुदाय अपने सामुदायिक हित के आधार पर एकजुट होकर मत देगा, यह स्वीकार्य है, जबकि बहुसंख्यक हिन्दू समाज से अपेक्षा की जाती थी कि वह सेक्युलर के रूप में मतदान करे।

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हिन्दूओं में यह असन्तोष अचानक नहीं उपजा। इसकी जड़ें कई दशकों की उस नीति में हैं जिसे अनेक विश्लेषक “असमान धर्मनिरपेक्षता” कहते हैं। हिन्दू धार्मिक संस्थाओं पर सरकारी नियन्त्रण बनाए रखा गया, जबकि मुस्लिम वक्फ बोर्ड और ईसाई चर्च स्वायत्त रहे। काशी विश्वनाथ और सोमनाथ मन्दिर जैसी अन्य धार्मिक सम्पदाओं के प्रबन्धन में सरकारी हस्तक्षेप रहा, जबकि मस्जिदों और चर्चों के प्रबन्धन में यह हस्तक्षेप नहीं था। हज सब्सिडी जैसी नीतियाँ जारी रहीं, हिन्दू तीर्थयात्रा पर लागू नहीं थीं।

पश्चिम बंगाल में यह असन्तोष विशेष रूप से तीव्र था। ममता बनर्जी सरकार पर आरोप लगते रहे कि उन्होंने इमामों को सरकारी भत्ता दिया, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पुलिस कार्रवाई में ढील दी और हिन्दू त्योहारों पर कभी-कभी अनावश्यक प्रतिबन्ध लगाए। 2017 में रामनवमी और हनुमान जयन्ती के जुलूसों पर प्रतिबन्ध की खबरें आईं जबकि मुहर्रम के जुलूसों पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं था। यह भेदभाव हिन्दू मतदाताओं को असह्य लगने लगा।

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2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम इस परिवर्तन की गहराई को स्पष्ट करते हैं। भारतीय जनता पार्टी ने 207 सीटें जीतीं और 92.93% की रिकॉर्ड मतदान प्रतिशत दर्ज हुई। चुनाव विश्लेषकों के अनुसार इसके पीछे दो मुख्य कारण थे। पहला, हिन्दू मतदाताओं का लगभग पूर्ण एकीकरण भाजपा के पक्ष में हुआ। दूसरा, मुस्लिम मत विभाजित हुए, जिनका एक हिस्सा वाम और कांग्रेस की ओर चला गया। हिन्दू मतदाताओं ने जागरुक  होकर मतदान किया

असम में मुख्यमन्त्री हेमन्त बिस्वा शर्मा ने एक नई राजनीतिक रणनीति अपनाई। उन्होंने खुलकर कहा कि उन्हें मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए और मैं बिना मुस्लिम मतों के भी सरकार बना सकता हूं।असम में मुस्लिम मतदाता लगभग एक तिहाई हैं।

संविधान निर्माता डॉ. अम्बेडकर ने भारतीय धर्मनिरपेक्षता को इस रूप में परिभाषित किया था कि ‘राज्य न किसी धर्म का पक्षपाती होगा और न ही किसी के साथ भेदभाव करेगा।’ किन्तु व्यवहार में यह सिद्धान्त चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ता रहा। यहाँ यह भी स्मरणीय है कि हिन्दू मतदाता के एकीकरण का अर्थ यह नहीं कि वह केवल धर्म के आधार पर मत दे रहा है बल्कि बेरोजगारी, महँगाई, कानून-व्यवस्था, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार के मुद्दे भी निर्णायक रहे। मुद्दा कोई भी हो पर यहां हिन्दू एकीकरण स्पष्ट दिखाई देता है।

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2026 के इन चुनावों ने भारतीय राजनीति में एक नई संरचना का संकेत दिया है। अब सरकारें केवल मुस्लिम मतों के आधार पर नहीं बनेंगी। हिन्दू बहुसंख्यक मतदाता यदि एकजुट होता है तो वह किसी भी राजनीतिक समीकरण को बदल सकता है। यह लोकतन्त्र में स्वाभाविक है और इसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता।

2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ हैं। वोट बैंक की राजनीति, जो दशकों से भारतीय लोकतन्त्र का अभिशाप रही है, उसके एकपक्षीय स्वरूप पर प्रश्नचिह्न लग गया है। हिन्दू मतदाता का यह जागरण एक स्वाभाविक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है।

वर्तमान में वोट बैंक की राजनीति करने वाले दलों को अब चिंतन करना होगा कि किसी एक समुदाय का तुष्टिकरण करके सत्ता के सिंहासन तक नहीं पहुंचा जा सकता है। बहुसंख्यक हिन्दूओं ने बंगाल में रास्ता दिखा दिया है। वहां बिना किसी जातीय और वर्ण के भेदभाव के हिन्दूओं ने एकजुट होकर मतदान किया है। किसी एक समुदाय का तुष्टिकरण जैसे अस्वीकार्य है, वैसे ही किसी एक समुदाय का अपमान या उपेक्षा भी अस्वीकार्य है। अब संभलकर चलना होगा।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।