भारतीय समाज की सामूहिक चेतना का उदय : 1857 की क्रांति
“मेरठ के सिपाहियों ने जब अपनी बेड़ियाँ तोड़ीं तो उनके मन में केवल धर्म की रक्षा नहीं, बल्कि वर्षों के अपमान का बदला भी था।”
— रुद्रांशु मुखर्जी, ‘Awadh in Revolt, 1857-58’
किन्तु यह केवल चर्बी का प्रश्न नहीं था। 1856 के ‘General Service Enlistment Act’ ने सिपाहियों को समुद्र पार सेवा के लिए बाध्य किया जो ब्राह्मण और उच्च जाति के सिपाहियों की धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध था। वेतन भत्तों में कटौती, यूरोपीय अधिकारियों का दुर्व्यवहार और पदोन्नति में भेदभाव, ये सब मिलकर एक विस्फोटक स्थिति बना रहे थे। मंगल पांडे का 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में किया गया प्रतिरोध उसी संचित क्रोध की पहली लौ थी।
1857 की क्रांति को केवल सैनिक विद्रोह तक सीमित करना एक बड़ी ऐतिहासिक भूल होगी। अवध, रुहेलखंड, बुन्देलखंड और मध्य भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान वर्ग अंग्रेज़ी भू-राजस्व प्रणाली से कराह रहा था। 1856 में अवध के अंग्रेज़ी साम्राज्य में विलय के बाद वहाँ की पारंपरिक ज़मींदारी व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई। हज़ारों तालुकदारों की ज़मीनें ज़ब्त की गईं और लाखों किसान बेकार हो गए।
1856 में अवध विलय के बाद अंग्रेज़ों ने 21,000 से अधिक ग्राम परगना तालुकदारों से छीन लिए। जब विद्रोह भड़का तो ये तालुकदार और उनके आश्रित किसान एकजुट हो गए और लखनऊ, फैज़ाबाद तथा सुलतानपुर में अंग्रेज़ सत्ता के विरुद्ध खड़े हो गए।
इतिहासकार एरिक स्टोक्स ने अपनी रचना ‘The Peasant Armed’ में यह स्थापित किया कि किसान समाज की भागीदारी स्थानीय परिस्थितियों से निर्धारित थी। जहाँ पारंपरिक ज़मींदारी व्यवस्था ध्वस्त हुई, वहाँ कृषक समाज ने विद्रोह में भाग लिया। अवध के किसानों ने न केवल विद्रोहियों को भोजन और आश्रय दिया, बल्कि हथियार उठाकर स्वयं भी लड़े। यह उनके लिए ज़मीन की लड़ाई थी, पहचान की लड़ाई थी।
अवध के तालुकदारों की भूमिका 1857 में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही। ये वे लोग थे जो पीढ़ियों से अपने इलाकों के स्वामी थे और अपने किसानों के संरक्षक भी। अंग्रेज़ों की ‘Summary Settlement’ नीति ने उन्हें रातोंरात भूमिहीन कर दिया। राजा बेनी माधव बख्श सिंह, राजा देवी बख्श सिंह, राजा हनुमन्त सिंह जैसे तालुकदारों ने विद्रोहियों का साथ देते हुए अपनी सेनाएँ खड़ी कीं।
बुन्देलखंड में भी यही स्थिति थी। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। 1853 में डलहौज़ी की ‘Doctrine of Lapse’ नीति के अन्तर्गत झाँसी को अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला लिया गया था। रानी लक्ष्मीबाई का वह प्रसिद्ध वाक्य “मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी” केवल एक रानी का आह्वान नहीं था, यह एक पूरे समाज की अस्मिता की आवाज़ थी।
“रानी लक्ष्मीबाई ने जब घोड़े पर सवार होकर अंग्रेज़ों का सामना किया, तो उनके पीछे केवल सैनिक नहीं, एक पूरी जनता थी।”
— जनरल ह्यू रोज़ (ब्रिटिश सैन्य अधिकारी), अपनी रिपोर्ट में
1857 की क्रांति में धर्म एक शक्तिशाली संगठनकारी तत्त्व था। हिन्दू साधु-सन्यासियों और मुस्लिम उलमाओं ने एक सामान्य शत्रु के विरुद्ध एक साथ खड़े होने का आह्वान किया। अंग्रेज़ों द्वारा भारतीय धर्म और संस्कृति में हस्तक्षेप करना जैसे 1813 का चार्टर एक्ट जिसने ईसाई मिशनरियों को भारत में काम करने की छूट दी, सती प्रथा निषेध, हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, इन सबने परंपरावादी समाज में असुरक्षा का भाव जगाया था।
बरेली के खान बहादुर खान, जो नजीबुल्लाह खान के पोते थे, ने रुहेलखंड में विद्रोह का नेतृत्व किया और अपने संदेशों में हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को एकजुट होने का आह्वान किया। दिल्ली में बहादुर शाह ज़फर को विद्रोहियों ने नाममात्र का नेतृत्व दिया था, किन्तु उनके होने से इस आंदोलन को एक प्रतीकात्मक वैधता मिली जो हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को स्वीकार्य थी।
1857 की क्रांति केवल ग्रामीण और सैन्य आंदोलन नहीं था। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर जैसे नगरों में भी समाज का एक बड़ा वर्ग इसमें सक्रिय था। अंग्रेज़ी व्यापार नीतियों ने भारतीय हस्तशिल्प और दस्तकारी उद्योग को तबाह कर दिया था। लंकाशायर के सस्ते कपड़ों ने भारतीय बुनकरों की रोज़ी छीन ली थी। ये बेरोज़गार दस्तकार और कारीगर विद्रोह में सहभागी बने।
1840 के दशक तक भारत से ब्रिटेन को होने वाले सूती कपड़े के निर्यात में 95% की गिरावट आ चुकी थी। ढाका जो कभी अपनी मलमल के लिए विश्वप्रसिद्ध था, उसकी जनसंख्या 1800 के डेढ़ लाख से घटकर 1850 तक मात्र तीस हज़ार रह गई थी।
लखनऊ का तवायफ़ वर्ग भी इस संघर्ष से अछूता नहीं रहा। अवध दरबार की संस्कृति के विनाश से इस वर्ग की पूरी आजीविका और पहचान संकट में थी। हज़रतगंज और चौक के बाज़ारों में भी विद्रोह की आँच महसूस की गई।
1857 की क्रांति में भारतीय महिलाओं की भूमिका को इतिहास ने प्राय: कम आँका है। रानी लक्ष्मीबाई तो इस युग की प्रतीक बन गईं, किन्तु उनके अतिरिक्त भी अनेक साहसी महिलाओं ने इस संघर्ष में भाग लिया। झलकारी बाई, जो लक्ष्मीबाई की सेना में थीं, का शौर्य लोकगाथाओं में अमर है। अवध में बेगम हज़रत महल ने नाबालिग पुत्र बिरजिस क़द्र को गद्दी पर बिठाकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध लखनऊ की रक्षा का नेतृत्व किया।
“बेगम हज़रत महल एक साधारण महिला नहीं थीं। उन्होंने जिस दृढ़ता और बुद्धिमत्ता से लखनऊ का संचालन किया, वह किसी भी राजनेता को लज्जित कर सकती थी।”
— W.H. Russell, ‘My Diary in India’ (1860)
ग्रामीण महिलाओं ने भी अपने-अपने स्तर पर योगदान दिया। खाना बनाकर, घायलों की सेवा करके, शत्रु की गतिविधियों की सूचना देकर और आवश्यकता पड़ने पर हथियार उठाकर भी। 1857 की क्रांति ने समाज के उस वर्ग को भी राष्ट्रीय जीवन के केन्द्र में ला दिया जो अब तक परदे के पीछे था।
1857 की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें हिन्दुओं और मुसलमानों ने एक साथ अंग्रेज़ी सत्ता का विरोध किया। विद्रोहियों ने दिल्ली में बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में गाय की क़ुर्बानी पर पाबंदी लगाई ताकि हिन्दू सिपाही नाराज़ न हों। मंदिरों और मस्जिदों में साथ-साथ प्रार्थनाएँ हुईं। यह सांप्रदायिक सौहार्द भले ही अस्थायी था, किन्तु इसने यह सिद्ध किया कि भारतीय समाज में एकता की जड़ें गहरी थीं।
इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने अपनी पुस्तक ‘The Last Mughal’ में इस एकता का विस्तृत विवरण दिया है। उन्होंने लिखा कि दिल्ली में विद्रोह के दौरान हिन्दू सिपाहियों ने अपने मुस्लिम साथियों के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी और बहादुर शाह ज़फर ने स्वयं को सभी भारतीयों का प्रतिनिधि घोषित किया।
यद्यपि 1857 की क्रांति अंततः असफल रही, किन्तु इसकी असफलता के पीछे भी सामाजिक कारण थे। संगठन का अभाव, नेतृत्व की एकता का न होना, और भारतीय समाज के कुछ वर्गों का तटस्थ रहना या अंग्रेज़ों का साथ देना, ये सब महत्त्वपूर्ण कारण थे। पंजाब और दक्षिण भारत के अधिकांश क्षेत्रों में विद्रोह नहीं फैला। सिख सैनिकों और गोरखा सैनिकों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया। ग्वालियर के सिंधिया और हैदराबाद के निज़ाम ने भी ब्रिटिश सत्ता का समर्थन किया।
पंजाब में विद्रोह न फैलने का एक कारण यह भी था कि 1849 में पंजाब विलय के बाद से वहाँ ब्रिटिश प्रशासन अपेक्षाकृत नरम था। इसके अतिरिक्त सिख समुदाय के अंग्रेज़ों के साथ हाल के सैन्य गठजोड़ ने भी भूमिका निभाई।
1857 की क्रांति की विफलता के बावजूद इसने भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। ब्रिटिश संसद ने 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर लिया। बहादुर शाह ज़फर को रंगून निर्वासित कर दिया गया। किन्तु इससे भी महत्त्वपूर्ण यह था कि भारतीय जनमानस में एक नई चेतना जागृत हो चुकी थी।
वीर सावरकर ने 1909 में अपनी पुस्तक ‘The Indian War of Independence’ में इस घटना को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी। 1857 ने भारतीय समाज के अनेक वर्गों को पहली बार एक साझे मंच पर ला खड़ा किया। 1857 की क्रांति भारतीय समाज के सामूहिक चेतना का एक ऐसा विस्फोट थी जिसमें सिपाही और किसान, रानी और बेगम, तालुकदार और दस्तकार आदि सभी एक साथ थे। यह आंदोलन अपने लक्ष्य को पूर्णतः प्राप्त नहीं कर सका, किन्तु इसने जो बीज बोए वे आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महावृक्ष बने। इतिहासकार मानत हैं कि 1857 के बाद से भारत में “एक राष्ट्र” की अवधारणा धीरे-धीरे मूर्त रूप लेने लगी।
“1857 केवल एक विद्रोह नहीं था यह भारतीय समाज की उस आत्मा की पुकार थी जो सदियों की दासता के बाद भी जीवित थी।”


