वैदिक वाङ्मय में मां और मातृशक्ति का स्वरूप और आध्यात्मिक महत्व

भारतीय संस्कृति में शक्ति की अवधारणा केवल भौतिक बल तक सीमित नहीं रही। यहाँ शक्ति को सदा स्त्रीरूपा माना गया है, जो समस्त सृष्टि की जननी है, पालनकर्त्री है और संहारिका भी। वैदिक वाङ्मय के विशाल साहित्य में मातृशक्ति का जो स्वरूप उभरता है, वह अत्यंत गहन, बहुआयामी और दार्शनिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।
ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और उपनिषदों में देवी के विविध रूपों का वर्णन मिलता है। कहीं वे उषा के रूप में नवप्रभात की अग्रदूती हैं, कहीं अदिति के रूप में अनंत आकाश का आलिंगन करती हैं, कहीं सरस्वती के रूप में वाणी और विद्या की स्रोत हैं तो कहीं पृथ्वी देवी के रूप में समस्त जीवों की धारिणी हैं। वैदिक ऋषियों ने इस मातृशक्ति को केवल पूजनीय ही नहीं, बल्कि ब्रह्माण्ड की चालक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया।
ऋग्वेद, जो विश्व का प्राचीनतम उपलब्ध साहित्यिक ग्रंथ है, उसमें मातृशक्ति का प्रथम स्पष्ट उल्लेख अदिति के रूप में मिलता है। अदिति को समस्त देवताओं की माता माना गया है। वे बंधनरहित, असीम और अक्षय शक्ति की प्रतीक हैं।
अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः। विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥
अर्थात आकाश अदिति है, अंतरिक्ष अदिति है, अदिति ही माता है, वही पिता है और वही पुत्र है। समस्त विश्वदेव, पाँचों जन, उत्पन्न हुए सब और जो आगे उत्पन्न होंगे, वे सब अदिति ही हैं। (ऋग्वेद 1.89.10)
यह मंत्र स्पष्ट करता है कि अदिति केवल एक देवी नहीं, वरन् सम्पूर्ण अस्तित्व की समष्टि हैं। वे सर्वव्यापिनी हैं और उनमें समस्त रिश्ते, समस्त जीव और समस्त काल समाहित हैं। यह वैदिक दृष्टिकोण की विलक्षण विशेषता है कि यहाँ मातृत्व को ब्रह्माण्डीय स्तर पर परिभाषित किया गया है। ऋग्वेद के दसवें मण्डल में देवी अम्भृणी का प्रसिद्ध वाक्-सूक्त मिलता है। यह सूक्त देवी की वाणी में रचा गया है और इसमें शक्ति अपने परम स्वरूप का उद्घोष करती है।
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः। अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा॥
अर्थात: मैं रुद्रों और वसुओं के साथ विचरण करती हूँ, मैं आदित्यों तथा विश्वदेवों के साथ हूँ। मैं ही मित्र और वरुण दोनों को धारण करती हूँ, मैं ही इन्द्र, अग्नि और दोनों अश्विनीकुमारों को भी। (ऋग्वेद 10.125.1)
इस सूक्त में देवी स्वयं अपना परिचय देती हैं। इसे वाग्देवी का आत्मनिवेदन कहा जा सकता है। यह सूक्त यह सिद्ध करता है कि वैदिक ऋषि जानते थे कि सम्पूर्ण सृष्टि किसी एकल स्त्री शक्ति की अभिव्यक्ति है।
ऋग्वेद में उषा को विशेष महत्व दिया गया है। उषा के लिए लगभग बीस सूक्त समर्पित हैं जो उनकी महिमा का विस्तार से वर्णन करते हैं। उषा केवल प्रातःकाल की देवी नहीं हैं, वरन् वे नवचेतना, नवसंकल्प और जीवन की निरंतरता की प्रतीक हैं।
उषो ये ते प्र यामेषु यज्ञैर्विभावरि सुमतिं भिक्षमाणाः। ते स्याम देवगोपाः सुदंसो महि श्रवः प्रथमा धत्त नः॥
अर्थात हे उषा देवी, जो लोग तुम्हारी प्रत्येक गति में यज्ञों द्वारा तुम्हारी कृपा चाहते हैं, हे दीप्तिमती, हम वे लोग हों जिनकी देव रक्षा करें। हे अद्भुत कर्म करनेवाली, हमें महान यश दो। (ऋग्वेद 1.92.15)
उषा देवी का वर्णन ऋग्वेद में एक युवती के रूप में मिलता है जो प्रतिदिन नई होकर आती है, किंतु कभी वृद्ध नहीं होती। यह वर्णन प्रकृति की उस शाश्वत माँ का प्रतीक है जो प्रत्येक क्षण नई सृष्टि करती है, प्रत्येक दिन जीवन को नया अवसर देती है।
अथर्ववेद का भूमि सूक्त विश्वसाहित्य में मातृशक्ति के सबसे भव्य स्तवनों में से एक है। यह सूक्त पृथ्वी को माँ के रूप में स्वीकार करते हुए उसके प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त करता है। इसमें बासठ मंत्र हैं जो एक अद्वितीय पर्यावरणीय और आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु॥
अर्थात पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। पर्जन्य (वर्षा के देवता) मेरे पिता हैं, वे हमारा पोषण करें। (अथर्ववेद 12.1.12)
इस एकल पंक्ति में भारतीय मातृभावना का सार समाहित है। पृथ्वी केवल भूखंड नहीं, वह साक्षात् माँ है। इस भावना का व्यावहारिक परिणाम यह था कि वैदिक समाज भूमि का अनावश्यक दोहन पाप मानता था।
यत्ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जस्तन्वस्तस्य विद्म। त्वां पृथिव्यमृतां स्वर्वतीं विश्वधायसीं धरणीं मनामहे॥
अर्थात हे पृथ्वी, तुम्हारा जो मध्य भाग है और जो नाभिस्वरूप केन्द्र है, जो तुम्हारी शक्तियाँ और ऊर्जाएँ हैं, उन्हें हम जानते हैं। हम तुम्हें अमृतमयी, प्रकाशवती, समस्त प्राणियों को धारण करनेवाली देवी के रूप में पूजते हैं। (अथर्ववेद 12.1.10)
पृथ्वी माँ का यह स्तवन केवल काव्यात्मक नहीं है। इसमें एक गहरी पारिस्थितिकीय जागरूकता है। वैदिक ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का मध्य और नाभि अर्थात् उसके संसाधन असीम नहीं हैं। उनका सम्मान आवश्यक है।
वैदिक मातृशक्ति के सबसे प्रकाशमान रूपों में देवी सरस्वती का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऋग्वेद में सरस्वती को एक नदी के रूप में भी वर्णित किया गया है और ज्ञान तथा वाणी की देवी के रूप में भी। यह दोनों रूप एक गहरे अर्थ को इंगित करते हैं। जैसे नदी सबको जीवन देती है, वैसे ही सरस्वती ज्ञान से सभी का पोषण करती हैं।
पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती। यज्ञं वष्टु धियावसुः॥
अर्थात पवित्र करनेवाली, अन्न से परिपूर्ण सरस्वती हमारे लिए बल और ज्ञान लाएं। यज्ञों की बुद्धिरूपी संपत्ति से युक्त देवी हमारे यज्ञ को स्वीकार करें। (ऋग्वेद 1.3.10)
सरस्वती का वर्णन न केवल देवी के रूप में, बल्कि वाणी की अधिष्ठात्री के रूप में होता है। यजुर्वेद में कहा गया है कि जो मंत्र उच्चारित होते हैं, वे सरस्वती की ही विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। इस प्रकार समस्त ज्ञान, भाषा और साहित्य एक मातृशक्ति की देन है।
वेदों की इस मातृशक्ति की भावना को उपनिषदों ने दार्शनिक ऊँचाइयों पर पहुँचाया। केनोपनिषद में एक अद्भुत आख्यान है जिसमें उमा हैमवती के रूप में देवी ब्रह्म के सत्य का ज्ञान देती हैं। यह प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ एक स्त्री देवी, इन्द्र जैसे देवताओं को ब्रह्मज्ञान का उपदेश दे रही है।
सा ब्रह्मेति होवाच। ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति। ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति।
अर्थात उमा ने कहा: यह ब्रह्म है। तुम ब्रह्म की ही इस विजय में गौरव का अनुभव कर रहे हो। इससे ही इन्द्र ने यह जाना कि वह ब्रह्म था। (केनोपनिषद 3.25)
यह प्रसंग यह सिद्ध करता है कि वैदिक परंपरा में ज्ञान की परंपरा का आरंभ और समापन एक देवी से होता है। श्वेताश्वतरोपनिषद में भी शक्ति को ब्रह्म से अभिन्न बताया गया है।
देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्।
अर्थात ईश्वर की आत्मशक्ति उसके गुणों में छिपी हुई है। (श्वेताश्वतरोपनिषद 1.3)
वेदों में बीजरूप में विद्यमान मातृशक्ति की अवधारणा पुराणों में पूर्णतः प्रस्फुटित हुई। मार्कण्डेय पुराण का देवीमाहात्म्य, जिसे दुर्गासप्तशती भी कहते हैं, मातृशक्ति के सबसे व्यापक, काव्यात्मक और दार्शनिक विवेचन का ग्रंथ है। इसमें देवी को ही जगत की एकमेव आद्याशक्ति बताया गया है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थात जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विराजमान हैं, उन्हें नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है। (देवीमाहात्म्य 5.19)
यह मंत्र वैदिक परंपरा की उस मूलभूत मान्यता को दोहराता है कि शक्ति केवल देवलोक में नहीं, प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है। पशु में, वनस्पति में, मनुष्य में, यहाँ तक कि शत्रु में भी जो ऊर्जा है, वह उसी मातृशक्ति का अंश है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में किसी भी प्राणी की हत्या को अनावश्यक रूप से उचित नहीं माना गया।
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥
अर्थात हे देवी, तुम अनंत शक्ति सम्पन्न वैष्णवी शक्ति हो, समस्त विश्व के बीज हो, परम माया हो। इस समग्र संसार को तुमने ही मोहित कर रखा है। जब तुम प्रसन्न होती हो तब मुक्ति का कारण बनती हो। (देवीमाहात्म्य 1.58)
इस मंत्र में शक्ति का द्वैत रूप स्पष्ट है। एक ओर वे माया हैं जो संसार में आसक्ति उत्पन्न करती हैं, दूसरी ओर वे मुक्तिदात्री भी हैं। यह भारतीय दर्शन का वह गहरा रहस्य है जिसे समझे बिना मातृशक्ति की अवधारणा अधूरी रहती है।
श्रीमद्भागवत पुराण में देवी दुर्गा के विविध रूपों का वर्णन मिलता है। अष्टम स्कंध में देवासुर संग्राम के प्रसंग में देवी का ऐसा रूप सामने आता है जहाँ वे समस्त देवताओं की संचित शक्ति से प्रकट होती हैं। यह प्रसंग सांकेतिक है। जब जगत में अधर्म का बोझ बढ़ जाता है, तब सभी शक्तियाँ मिलकर मातृशक्ति के रूप में प्रकट होती हैं। ब्रह्माण्डपुराण में संकलित ललितासहस्रनाम में देवी के एक हजार नाम हैं। प्रत्येक नाम उनके किसी गुण, रूप या कार्य का वर्णन करता है। इसमें उन्हें ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और इच्छाशक्ति की त्रिमूर्ति कहा गया है।
ज्ञानशक्तिस्वरूपिण्यै क्रियाशक्तिस्वरूपिण्यै। इच्छाशक्तिस्वरूपिण्यै नमो देव्यै महौजसे॥
अर्थात ज्ञानशक्ति के स्वरूप में, क्रियाशक्ति के स्वरूप में और इच्छाशक्ति के स्वरूप में जो महाशक्ति विद्यमान हैं, उन महातेजस्विनी देवी को नमस्कार है। (ललितासहस्रनाम पर आधारित)
वैदिक साहित्य में मातृशक्ति की इस भव्य अवधारणा का समाज पर गहरा प्रभाव था। गृह्यसूत्रों और स्मृतिग्रंथों में माँ को उच्चतम सम्मान दिया गया। मनुस्मृति में कहा गया है कि माँ की महिमा पिता, गुरु और यहाँ तक कि ब्रह्म से भी अधिक है।
उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता। सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते॥
अर्थात दस उपाध्यायों से एक आचार्य श्रेष्ठ है, सौ आचार्यों से पिता श्रेष्ठ है, किंतु एक हजार पिताओं से माँ गौरव में बढ़कर है। (मनुस्मृति 2.145)
यह मंत्र वैदिक समाज में माँ की सामाजिक प्रतिष्ठा को प्रतिबिम्बित करता है। माँ केवल जन्म देनेवाली नहीं, बल्कि जीवन के संस्कारों की पहली शिक्षिका है। तैत्तिरीयोपनिषद का प्रसिद्ध वाक्य तो मातृशक्ति के प्रति समर्पण का चरमोत्कर्ष है।
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥
अर्थात माँ को देवता मानो, पिता को देवता मानो, आचार्य को देवता मानो, अतिथि को देवता मानो। (तैत्तिरीयोपनिषद 1.11.2)
यहाँ उल्लेखनीय है कि माँ का स्थान सबसे पहले है। यह क्रम आकस्मिक नहीं है। ऋषियों ने सोच समझकर इस क्रम को निर्धारित किया था।
वैदिक वाङ्मय में मातृशक्ति का स्वरूप बहुआयामी है। वे उषा की तरह प्रत्येक प्रातःकाल नई चेतना लेकर आती हैं। वे अदिति की तरह समस्त ब्रह्माण्ड को अपने आँचल में समेटे हैं। वे सरस्वती की तरह ज्ञान की अनंत धारा बहाती हैं। वे पृथ्वी माँ की तरह सभी का भार वहन करती हैं और सबको जीवन देती हैं।
ऋग्वेद के वाक्सूक्त से लेकर देवीमाहात्म्य तक, उपनिषदों की उमा से लेकर ललितासहस्रनाम तक एक निरंतर धारा प्रवाहित होती है जो यह घोषणा करती है कि शक्ति स्त्रीरूपिणी है, सृजनात्मक है और करुणामयी है। भारतीय दर्शन ने इस शक्ति को किसी एक मंदिर या एक ग्रंथ तक सीमित नहीं रखा, वरन् उसे ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण में, प्रत्येक जीव में, प्रत्येक क्षण में प्रवाहित देखा।
आज जब विश्व पर्यावरण संकट, सामाजिक असमानता और मानवीय संवेदनहीनता से जूझ रहा है, तब वैदिक मातृशक्ति की यह अवधारणा एक नई दिशा दे सकती है। माँ को देवी मानने का अर्थ है प्रकृति का सम्मान करना, स्त्री की गरिमा स्वीकार करना और जीवन की प्रत्येक अभिव्यक्ति को पवित्र मानना। वैदिक ऋषियों का यह सन्देश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सहस्रों वर्ष पूर्व था।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
अर्थात हे नारायणि, समस्त मंगलों में श्रेष्ठ, कल्याणकारिणी, सभी पुरुषार्थों को सिद्ध करनेवाली, शरण देनेवाली, त्रिनेत्री गौरी, आपको नमस्कार है। (देवीमाहात्म्य 11.10)
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

