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पुस्तक -संस्कृति को मिलना चाहिए नया जीवन

स्वराज्य करुण
(ब्लॉगर एवं पत्रकार )

आम तौर पर दुनिया के हर देश में साक्षरता और शिक्षा का प्रसार बढ़ा है, लेकिन स्कूल-कॉलेजों में पढ़ी और पढ़ाई जाने वाली किताबों के अलावा आज साहित्य, कला, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान की कितनी पुस्तकें खरीदी और पढ़ी जाती हैं? यह सवाल आज विचारणीय है। इसलिए भी विचारणीय है कि आज 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस है, जो संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा वर्ष 1995 से मनाया जा रहा है।

पुस्तकें तो बहुत छप रही हैं, लेकिन पढ़ने वालों की संख्या कम होती जा रही है। अन्य देशों का तो नहीं मालूम, लेकिन हमारे देश में अपने आस-पास नजर दौड़ाएँ तो आम तौर पर ऐसा ही माहौल मिलेगा। लगता है कि हमारे समाज से ‘पुस्तक-संस्कृति’ गायब होती जा रही है, जो वाकई चिंताजनक है। पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं की छोटी-बड़ी दुकानों में रौनक पहले जैसी नजर नहीं आती, क्योंकि वहाँ पुस्तक-प्रेमियों की चहल-पहल कम होती जा रही है। पहले तो मोहल्लों में गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के लिए रोचक पत्रिकाओं सहित कई तरह के सचित्र कथा-चित्र (कॉमिक्स) का छोटा-मोटा स्टॉल लगाकर बड़ी उम्र के बच्चे एक जगह बैठा करते थे। कई छोटे बच्चे इन पुस्तकों और कॉमिक्स आदि को नाम मात्र के किराये पर भी घर ले जाकर पढ़ा करते थे, लेकिन अब वह बात कहाँ?

पुस्तकें शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। अच्छी किताबें अपने पाठकों को और समाज को सही दिशा दे सकती हैं। लेकिन हमारे समाज से पुस्तक संस्कृति तेजी से गायब होते जाना साहित्यिक बिरादरी के लिए भी एक गंभीर चिंता, चिंतन और चुनौती का विषय है। फिर भी उम्मीद की हल्की-सी किरण कहीं न कहीं बाकी है।

मैंने सुना है कि केरल और बंगाल जैसे राज्यों में पुस्तक-संस्कृति आज भी जीवित है। वहाँ के साहित्यिक-सांस्कृतिक अभिरुचि सम्पन्न लोग विवाहोत्सव और जन्मोत्सव जैसे शुभ अवसरों पर उपहार में अच्छी पुस्तकें भेंट करते हैं। क्या देश के अन्य राज्यों में, जहाँ इस तरह की रचनात्मक परिपाटी नहीं है, वहाँ विलुप्त हो रही या मरणासन्न पुस्तक-संस्कृति को नया जीवन नहीं मिलना चाहिए? इस दौर में, जबकि टेलीविजन और मोबाइल फोन जैसे उपकरणों ने लगभग हर किसी को आत्मकेंद्रित बना दिया है, पुस्तक संस्कृति को फिर से विकसित करना एक बड़ी चुनौती है, फिर भी प्रयास तो होना ही चाहिए।

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वैज्ञानिक आविष्कारों को तो नहीं रोका जा सकता, लेकिन यह एक जमीनी सच्चाई है कि सूचना क्रांति के इस दौर में इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्मों ने लोगों में भौतिक रूप से पुस्तक पढ़ने की आदत को लगभग खत्म कर दिया है। यह एक बड़ा विरोधाभास है कि आज विश्व पुस्तक दिवस के मौके पर मैं भी यहाँ इस गंभीर समस्या की चर्चा सोशल मीडिया के इस प्लेटफॉर्म पर ही कर रहा हूँ।

हालांकि किसी भी पुस्तक को कम्प्यूटर के स्क्रीन पर आँखें गड़ाकर पढ़ने और छपी हुई पुस्तक को सामने रखकर पढ़ने में अनुभवों का बहुत अंतर होता है। कम्प्यूटर या मोबाइल फोन के स्क्रीन पर किताबें पढ़ना, समाचारों और विचारों को पढ़ना आसान जरूर है, लेकिन जो सरस अनुभव प्रकाशित सामग्री को (कम्प्यूटर की भाषा में कहें तो) हार्ड कॉपी के रूप में पढ़ने में है, वह चमकीले स्क्रीन पर नहीं। साहित्यिक पुस्तकों की बात करें तो अपनी नजरों के सामने किसी उपन्यास, किसी कहानी संग्रह, कविता संग्रह, यात्रा वृत्तांत, निबंध संग्रह को देखकर पढ़ने में जो अनुभव होता है, वह कम्प्यूटर के चमकदार पर्दे पर पढ़ने में कहाँ? फिर भी अधिकांश लोग केवल इंटरनेट पर ऑनलाइन पुस्तकें पढ़ते हैं। विशेष रूप से स्कूल-कॉलेजों के विद्यार्थियों में ऑनलाइन पढ़ने की अभिरुचि देखी जाती है। अकादमिक विषयों की कई पुस्तकें महँगी होने और अनुपलब्ध होने की वजह से शायद ऑनलाइन पढ़ना उनके लिए ज्यादा आसान होता है।

अपनी रुचि के अनुसार हर दिन नहीं तो हर सप्ताह, हर सप्ताह नहीं तो हर महीने कला-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, कविता, कहानी, उपन्यास आदि में से किसी भी विषय और किसी भी विधा की कम से कम एक पुस्तक हमें जरूर पढ़नी चाहिए। दुनिया में लाखों-करोड़ों लेखक हैं और उनकी लिखी लाखों-करोड़ों पुस्तकें। उनमें से पढ़ने लायक पुस्तकों का चयन भी आज एक बड़ी चुनौती है।

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कम्प्यूटर तकनीक पर आधारित सोशल मीडिया के इस दौर में आज हर मनुष्य को अभिव्यक्ति का एक सर्वसुलभ मंच मिला है। ऐसे में समाज के सामने अपने विचार रखना बहुत आसान हो गया है। कई मायनों में यह अच्छा भी है और कई मायनों में बुरा भी। अच्छा इसलिए कि इससे मानव समाज में सूचनाओं और विचारों का आदान-प्रदान सरलता से और तेजी से किया जा सकता है, लेकिन बुरा इसलिए कि इसके अपने खतरे भी हैं। इंटरनेट आधारित यह सामाजिक माध्यम कई बार भ्रामक जानकारी भी फैलाता है। पढ़ने वाले को उस पर आ रहे संदेशों को पढ़ते समय अपने दिमाग का भी इस्तेमाल करना चाहिए। उन संदेशों को आँख मूँदकर सच नहीं मान लेना चाहिए। उनके बारे में गंभीरता से सोच-विचार कर ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए।

सूचना तकनीक के इस नये दौर में सोशल मीडिया पर तो जाने-अनजाने हर मनुष्य लेखक और पत्रकार की भूमिका में है, लेकिन क्या लिखना है, क्यों लिखना है, किसके लिए लिखना है, इसका ध्यान कम ही लोग रख पाते हैं। कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी के इस दौर में लेखकों की आबादी और उनकी पुस्तकों की संख्या भी बढ़ती जा रही है, वहीं ऐसा लगता है कि पाठकों की जनसंख्या लगातार कम होती जा रही है। दुनिया में आज समाचार पत्र-पत्रिकाओं की संख्या और उनमें लिखने वालों की संख्या भी बढ़ी है, पर उन्हें गंभीरता से और स्वविवेक-बुद्धि से पढ़ने वाले कितने हैं, यह व्यापक सर्वेक्षण और शोध का विषय है। फिर भी सरसरी तौर पर देखें तो निराशा होती है।

पुस्तकालयों और वाचनालयों की हालत भी निराशाजनक है। अब अधिकांश पाठक सिर्फ फेसबुक और वाट्सएप यूनिवर्सिटियों के छात्र हो गए हैं। वे अपने अधजल गगरी वाले प्रोफेसरों के अनुयायी बन जाते हैं। उन्हें सोशल मीडिया के इन मंचों के बाहर की दुनिया से कोई मतलब नहीं। वे लिखना खूब चाहते हैं, मोबाइल पर लिखते भी रहते हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश में भाषाओं और तथ्यों के सामान्य ज्ञान की कमी भी दिखाई देती है। उनमें वैचारिक संकट भी दिखाई पड़ता है। सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर भ्रामक सूचनाओं से प्रभावित होकर लोग आनन-फानन में अपनी धारणाएँ बना लेते हैं और तथ्यों की पुष्टि किए बिना कई बार अफवाहें फैलाने का माध्यम बन जाते हैं।

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फेसबुक और वाट्सएप विश्वविद्यालयों के ऐसे स्वनामधन्य छात्रों और उनके स्वनामधन्य प्रोफेसरों को सोशल मीडिया के अलावा उसके बाहर के समाज में उपलब्ध पुस्तकों पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। लेकिन पुस्तकों के प्रति उनकी घटती अभिरुचि चिंता का विषय है। एक दिक्कत यह भी है कि आज के अधिकांश कवि और लेखक स्वयं के लिखे हुए या छपे हुए के अलावा दूसरों का लिखा/छपा पढ़ते ही नहीं। यहाँ तक कि पत्र-पत्रिकाओं में छपी अपनी छोड़कर दूसरों की रचनाओं को पढ़ना भी वे उचित नहीं समझते। विद्वानों का कहना है कि अगर आप लेखक बनना चाहते हैं या लेखक, कवि हैं, तो दूसरों की लिखी पुस्तकों को भी अवश्य पढ़ें, क्योंकि अच्छा पढ़े बिना कुछ भी अच्छा नहीं लिखा जा सकता।

हम साहित्यिक पुस्तकें जरूर पढ़ें, लेकिन सिर्फ पाठक के रूप में नहीं, बल्कि नीर-क्षीर विवेक के साथ समीक्षात्मक दृष्टि से भी। हर पाठक को एक समीक्षक भी होना चाहिए। पुस्तकों में उन्हें क्या अच्छा लगा, क्यों अच्छा लगा, क्या ठीक नहीं लगा, क्यों ठीक नहीं लगा, पढ़ने के बाद इस पर भी उन्हें विचार करना चाहिए। जरूरी नहीं कि आप किसी पुस्तक की समीक्षा लिखें, लेकिन एक सजग पाठक के रूप में उनके पन्नों पर आपको समीक्षक जैसी दृष्टि जरूर दौड़ानी चाहिए।

बहरहाल, आप सभी को विश्व पुस्तक दिवस की हार्दिक बधाई।


— स्वराज्य करुण