पर्यावरण संरक्षण में भारत की भूमिका : पृथ्वी दिवस

माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः।’ — अथर्ववेद
भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। धरती को माता कहा जाता है। पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है, जिसमें जीवन संभव है। साँस लेने के लिए शुद्ध वायु, पीने के लिए शुद्ध जल, भोजन तथा रहने के लिए स्थान — सब कुछ हमें इसी धरती से प्राप्त होता है। पृथ्वी अपना प्राण-रस निचोड़कर हमारी उदरपूर्ति करती है। धरती की अनन्त जलराशि नदियाँ अपने में समेटे सागर और महासागरों तक सतत प्रवाहित होती रहती हैं। विशाल पर्वत तथा वृक्षों से आच्छादित विस्तृत वनांचल हमारी पृथ्वी के सौंदर्य में वृद्धि करने के साथ समस्त प्राणियों को जीवन प्रदान करते हैं।
असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उद्वतः प्रवतः समं बहु।
नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः॥ (अथर्ववेद, भूमि सूक्त 12.1.6)
यह मंत्र पृथ्वी की महिमा और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का वर्णन करता है कि पृथ्वी विभिन्न प्रकार की औषधियों को धारण करती है तथा हमारे लिए समृद्धि का आधार बनती है। पृथ्वी मनुष्य के लिए अनेक जैविक उत्पाद, प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन तथा जैविक अपशिष्टों के पुनर्चक्रण की व्यवस्था करती है। पृथ्वी की सतह पर आधारित पारिस्थितिकी तंत्र ऊपरी मृदा (मिट्टी) और जलस्रोतों पर निर्भर करता है, जबकि समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र भूमि से बहकर आए पोषक तत्वों पर निर्भर करता है। अतः पृथ्वी की संरचना, पर्यावरणीय विविधता और जैवविविधता के कारण ही इसे माता कहा गया है, क्योंकि इसके बिना मानव जीवन की कल्पना संभव नहीं है।
सन् 1970 में अमेरिकी सीनेटर जेरॉल्ड नेल्सन ने पर्यावरण शिक्षा के उद्देश्य से 22 अप्रैल को पर्यावरण संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने हेतु एक वार्षिक आयोजन प्रारंभ किया, जिसे पृथ्वी दिवस के रूप में मनाया गया। पर्यावरण प्रदूषण के विरोध में एक आंदोलन प्रारंभ हुआ, जिसमें लाखों लोगों ने भाग लिया। यह दिन तेजी से बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन तथा जैवविविधता की हानि जैसे खतरों के विरुद्ध सामूहिक जागरूकता का आह्वान करता है।
पर्यावरण के प्रति बढ़ते संकट को गंभीरता से लेते हुए पृथ्वी की रक्षा के उद्देश्य से यह एक वैश्विक आंदोलन बन गया है। विश्व स्तर पर लगभग 193 से अधिक देशों की भागीदारी सुनिश्चित होती है। 1970 से 1990 तक यह विश्वव्यापी हो गया तथा 1990 में इसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप मिला। सन् 2009 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस घोषित किया। यह विश्व का सबसे बड़ा नागरिक पर्यावरण आंदोलन है, जो वायु, महासागरों, मिट्टी, वन्य जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए प्रेरित करता है।
पृथ्वी की सतह के विशाल भाग जलवायु चक्र, जैसे चक्रवात और आँधी-तूफान, से प्रभावित होते हैं। भूकंप, भूस्खलन, सुनामी, ज्वालामुखी विस्फोट, बाढ़, सूखा, जंगल की आग तथा अन्य आपदाओं से जीवन अत्यधिक प्रभावित होता है। पृथ्वी दिवस वैश्विक तापवृद्धि और प्राकृतिक संसाधनों के क्षय जैसी समस्याओं पर ध्यान आकर्षित करता है, क्योंकि पृथ्वी जल, थल और नभचर सभी प्राणियों का घर है।
जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, वन्य जीवों की प्रजातियों का विलुप्त होना, मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, मृदा अपरदन और क्षरण, अम्ल वर्षा, वनों की कटाई, बढ़ता ग्लोबल वार्मिंग, पिघलते ग्लेशियर, औद्योगिकीकरण के कारण कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य जहरीली गैसों का उत्सर्जन, ध्वनि प्रदूषण आदि मानव गतिविधियों के दुष्परिणाम हैं। जनसंख्या वृद्धि के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक संसाधनों के उचित और सुरक्षित उपयोग के प्रति जागरूक होना आवश्यक है।
पृथ्वी दिवस हमें प्रकृति और पर्यावरण के साथ संतुलन बनाने की प्रेरणा देता है। विभिन्न विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक थीम पर आधारित कार्यक्रम तैयार किया जाता है। जैसे इस वर्ष ‘ग्रह में निवेश करें’ के माध्यम से जलवायु कार्रवाई पर जोर दिया जा रहा है।
भारत सतत विकास की दिशा में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उत्पादन में तेजी से वृद्धि कर रहा है, जो कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने का महत्वपूर्ण प्रयास है। स्वच्छता अभियान चलाकर अर्थ डे नेटवर्क इंडिया ट्रस्ट के सहयोग से गंगा जैसी प्रमुख नदियों की जलधाराओं की सफाई हेतु अभियान संचालित किए जाते हैं। भारत सरकार ने प्लास्टिक के उपयोग पर नियंत्रण तथा कचरा प्रबंधन के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया है।
वृक्षारोपण और वन संरक्षण के लिए देशभर में अनेक गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति द्वारा ‘एक पेड़ माँ के नाम’ लगाने का कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है, ताकि ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव को कम किया जा सके। ग्रीनहाउस गैसों को नियंत्रित करने तथा मृदा अपरदन रोकने में वृक्षों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वृक्ष हमारे सच्चे मित्र और जीवनदायी हैं।
प्रदूषण के कारण जल, वायु और भूमि के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों में विकृति उत्पन्न होती है। इससे उत्पन्न अवांछित तत्व वायुमंडल, जलमंडल और स्थलमंडल को दूषित करते हैं, जिसका कुप्रभाव समस्त प्राणियों और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है। पृथ्वी दिवस के अवसर पर भारत में पर्यावरण संरक्षण तथा लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
शहरों में रैलियाँ, सफाई अभियान, वृक्षारोपण, प्रकृति भ्रमण तथा विभिन्न प्रतियोगिताएँ, जैसे स्लोगन लेखन, निबंध लेखन, भाषण, पोस्टर और चित्रकला आदि आयोजित किए जाते हैं, जिससे लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़े।
लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार एवं हिन्दी व्याख्याता हैं।
अम्बिकापुर, जिला सरगुजा, छत्तीसगढ़
