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भगवान श्रीराम के जीवन से सीखें परिवार, कर्तव्य और समाज में मर्यादा की स्थापना

आचार्य ललित मुनि

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जीवन मानव सभ्यता के लिए अनुपम आदर्श है। रामायण और रामचरितमानस में वर्णित उनके चरित्र से हम परिवार की एकता कर्तव्य की निष्ठा और समाज में सदाचार की स्थापना कैसे करें यह सीख सकते हैं। आज के युग में जहां परिवार टूट रहे हैं कर्तव्य भुलाए जा रहे हैं और समाज में अराजकता बढ़ रही है वहां श्रीराम के आदर्श हमें मार्गदर्शन देते हैं। वाल्मीकि रामायण और गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस दोनों ग्रंथों में श्रीराम का चरित्र मर्यादा का प्रतीक है। वे पिता की आज्ञा का पालन करने वाले आदर्श पुत्र भाइयों के प्रति प्रेम करने वाले स्नेही भ्राता पत्नी के प्रति एकनिष्ठ पति और प्रजा के कल्याण में तत्पर राजा थे। इन गुणों से हम आज भी सीख सकते हैं कि परिवार में सम्मान कर्तव्य में निष्ठा और समाज में न्याय कैसे स्थापित किया जाए।

परिवार में मर्यादा की स्थापना श्रीराम के जीवन से सबसे पहले सीखी जा सकती है। श्रीराम ने परिवार को एक अखंड इकाई के रूप में देखा जहां प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य और सम्मान सर्वोपरि है। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में जब कैकेयी ने राम के वनवास की मांग की तब राम ने बिना किसी विरोध के पिता की आज्ञा स्वीकार की। उन्होंने पिता दशरथ से कहा-

न हि मे जीवितं प्राणा न च सीता न लक्ष्मणः । राज्यं चापि न मे किंचित् पितुर्वचनमेव हि ॥

अर्थात मेरे प्राण नहीं, मेरे लिए जीवन नहीं, सीता नहीं, लक्ष्मण नहीं और राज्य भी मेरे लिए कुछ नहीं है। मेरे लिए तो केवल पिता का वचन ही सर्वोपरि है। इस श्लोक से स्पष्ट है कि राम ने पिता की आज्ञा को अपने जीवन से भी ऊपर रखा और परिवार की एकता बनाए रखी। उन्होंने कभी कैकेयी के प्रति क्रोध नहीं किया बल्कि उन्हें भी उतना ही आदर दिया जितना अपनी माता कौसल्या को। रामचरितमानस के अयोध्या कांड में तुलसीदास जी इस घटना को भावपूर्ण ढंग से वर्णित करते हैं। जब राम पिता की आज्ञा सुनकर वन जाने के लिए तैयार होते हैं –

रामु लखनु सीता पितु आज्ञा सिर धरि बन को चले ।

अर्थात श्रीराम लक्ष्मण और सीता पिता की आज्ञा को सिर पर धारण करके वन की ओर चले। इससे पता चलता है कि राम ने परिवार की परंपरा और पिता के वचन को सर्वोच्च माना। आज के परिवारों में जहां छोटी छोटी बात पर विवाद और अलगाव होता है वहां राम का यह उदाहरण सिखाता है कि परिवार में मर्यादा का अर्थ है प्रत्येक सदस्य का सम्मान और एक दूसरे के कर्तव्य का पालन। राम ने लक्ष्मण और भरत के साथ भी भाईचारे का आदर्श प्रस्तुत किया। लक्ष्मण ने राम के साथ वनवास जाना चाहा तो राम ने उन्हें समझाया लेकिन जब लक्ष्मण अडिग रहे तब राम ने उन्हें साथ लिया। भरत ने जब राम को राजसिंहासन पर बिठाने के लिए वन में बुलाया तब राम ने भरत को समझाया कि पिता की आज्ञा का पालन सबसे बड़ा धर्म है। रामचरितमानस में भरत राम संवाद में तुलसीदास जी लिखते हैं कि राम भरत से कहते हैं- तुम अयोध्या में रहकर पिता की सेवा करो और प्रजा का पालन करो। वाल्मीकि रामायण के सुंदर कांड सर्ग 21 श्लोक 15 में सीता हनुमान जी से कहती हैं

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अनन्या राघवेणाहं भास्करेण प्रभा यथा ॥

अर्थात मैं राम से अलग नहीं हूं जैसे प्रकाश सूर्य से अलग नहीं होता। इस श्लोक से पता चलता है कि परिवार में पति पत्नी का संबंध मर्यादा और एकनिष्ठता पर आधारित होना चाहिए। राम ने जीवन भर एक पत्नी व्रत का पालन किया जो आज के भौतिकवादी युग में परिवार की पवित्रता बनाए रखने का संदेश देता है।

इस प्रकार परिवार में मर्यादा स्थापित करने के लिए श्रीराम हमें सिखाते हैं कि माता पिता का सम्मान भाइयों में प्रेम पत्नी के प्रति निष्ठा और एक दूसरे के कर्तव्य का पालन ही परिवार की मजबूती है। राम के जीवन से प्रेरणा लेकर हम आज भी संयुक्त परिवारों को बचाए रख सकते हैं और छोटे छोटे विवादों को मर्यादा के साथ सुलझा सकते हैं।

कर्तव्य की मर्यादा में श्रीराम का चरित्र अनुपम है। वे पिता के प्रति कर्तव्य पालन करने वाले पुत्र राजा के प्रति प्रजा का कल्याण करने वाले शासक और धर्म के प्रति समर्पित व्यक्ति थे। वाल्मीकि रामायण अयोध्या कांड में राम कहते हैं

दण्डकारण्यमेषोऽहं गच्छाम्येव हि सत्वरः । अविचार्य पितुर्वाक्यं समा वस्तुं चतुर्दश ॥

अर्थात मैं बिना किसी विचार के पिता के वाक्य का पालन करते हुए तुरंत चौदह वर्ष तक दंडकारण्य में रहूंगा। इस श्लोक में राम का कर्तव्य बोध स्पष्ट है। उन्होंने राज्य सुख त्यागकर पिता की आज्ञा का पालन किया क्योंकि उनके लिए कर्तव्य ही सबसे बड़ा धर्म था। रामचरितमानस में तुलसीदास जी इस कर्तव्य को और गहराई से वर्णित करते हैं। अयोध्या कांड की एक चौपाई में राम पिता की आज्ञा पर वनवास जाते हुए कहते हैं-

पितु बचन सिर धरि राम चले बनवास ।

अर्थात पिता के वचन को सिर पर धारण करके राम वनवास के लिए चले। यह चौपाई राम के त्याग और कर्तव्य निष्ठा का प्रतीक है। वे जानते थे कि वनवास में कष्ट होंगे फिर भी पिता के वचन को तोड़ने का विचार भी उनके मन में नहीं आया। लक्ष्मण जब क्रोधित होकर कैकेयी के विरुद्ध बोलते हैं तब राम उन्हें समझाते हैं कि कर्तव्य का पालन करते हुए क्रोध नहीं करना चाहिए। राम ने कहा कि पिता की आज्ञा सबके लिए माननीय है। राम भरत से कहते हैं -तुम राजा बनकर प्रजा की सेवा करो।

इससे राम का कर्तव्य बोध दिखता है कि वे केवल व्यक्तिगत कर्तव्य ही नहीं बल्कि सामूहिक कर्तव्य भी समझते थे। जब वे राजा बने तब राम राज्य में प्रत्येक प्रजा का कल्याण किया। कर्तव्य पालन में राम कभी समझौता नहीं करते थे। उन्होंने रावण का वध कर सीता की रक्षा की लेकिन युद्ध के बाद भी रावण के अंतिम संस्कार का आदेश विभीषण को दिया क्योंकि वह भी कर्तव्य था। वाल्मीकि रामायण युद्ध कांड में राम का यह निर्णय कर्तव्य की मर्यादा दर्शाता है।

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आज के युग में जहां लोग व्यक्तिगत लाभ के लिए कर्तव्य भूल जाते हैं वहां राम का उदाहरण सिखाता है कि कर्तव्य निष्ठा से ही जीवन सार्थक होता है। नौकरी परिवार या समाज में जो भी भूमिका हो उसे राम की तरह निष्ठा से निभाएं। राम ने वनवास में भी अपने कर्तव्य का पालन किया जैसे शबरी को ज्ञान दिया और सुग्रीव की मदद की। रामचरितमानस अरण्य कांड शबरी प्रसंग में राम नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं जो समाज में भक्ति और सदाचार को बढ़ावा देता है। इस प्रकार कर्तव्य की मर्यादा से हम अपने जीवन को अनुशासित और सफल बना सकते हैं। समाज में मर्यादा की स्थापना श्रीराम के राम राज्य से सीखी जा सकती है। रामचरितमानस के उत्तर कांड में राम राज्य का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी लिखते हैं

सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ चारिउ चरन धर्म जग माहीं । पूरी रहा सपनेहुँ अघ नाहीं ॥

अर्थात राम राज्य में सभी लोग एक दूसरे से प्रेम करते थे। वे अपने स्वधर्म में निरत रहते थे और वेदों तथा नीति के अनुसार चलते थे। चारों चरणों वाला धर्म जगत में पूर्ण रूप से व्याप्त था और सपने में भी कोई पाप नहीं था। राम ने सभी वर्णों और जातियों का सम्मान किया। वे क्षत्रिय होने के बावजूद ब्राह्मणों का आदर करते थे और वनवासी वानरों को भी अपने समान मित्र बनाया।

वाल्मीकि रामायण में राम राज्य की कल्पना में कहा गया है कि समाज में कोई दुखी नहीं था कोई गरीब नहीं था और सभी न्याय पाते थे। राम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया क्योंकि उन्होंने धर्म का साथ दिया। इससे समाज में न्याय और मर्यादा का संदेश मिलता है कि अच्छाई का साथ देना और बुराई का त्याग करना समाज की मजबूती है। राम ने रावण जैसे शक्तिशाली शत्रु का भी सम्मान किया और उसके अंतिम संस्कार का प्रबंध किया। यह समाज में सहिष्णुता और मर्यादा का उदाहरण है। रामचरितमानस में राम राज्य की एक और चौपाई है जहां कहा गया है-

दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ॥

अर्थात राम राज्य में दैहिक दैविक और भौतिक कोई भी ताप किसी को नहीं व्याप्त करता था। सभी सुखी थे क्योंकि राजा स्वयं मर्यादा का पालन करते थे। राम ने कभी अपनी मर्यादा नहीं तोड़ी। उन्होंने एक पत्नी व्रत का पालन किया और प्रजा के सामने भी उदाहरण प्रस्तुत किया। समाज में मर्यादा स्थापित करने के लिए राम सिखाते हैं कि नेता या सामान्य व्यक्ति दोनों को अपने आचरण से उदाहरण बनना चाहिए। आज के समाज में जहां जातिवाद भ्रष्टाचार और असहिष्णुता बढ़ रही है वहां राम राज्य का आदर्श हमें सिखाता है कि न्याय समानता और प्रेम से ही समाज मजबूत होता है।

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राम ने वनवास में भी समाज की मर्यादा बनाए रखी। उन्होंने शबरी के बेर खाए और उन्हें मुक्ति दी। इससे पता चलता है कि समाज में किसी भी वर्ग का सम्मान करना मर्यादा है। रामचरितमानस अरण्य कांड शबरी प्रसंग में राम नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं जो समाज में भक्ति और सदाचार को बढ़ावा देता है। राम ने हनुमान जी को भी सम्मान दिया और उन्हें अपना भक्त और सेवक बनाया। यह दिखाता है कि समाज में योग्यता और भक्ति का स्थान है न कि जन्म का।

इस प्रकार श्रीराम के जीवन से हम सीखते हैं कि परिवार में माता पिता भाई बहन और पत्नी का सम्मान कर्तव्य में पिता राजा और धर्म का पालन तथा समाज में न्याय प्रेम और समानता से मर्यादा स्थापित की जा सकती है। वाल्मीकि रामायण के श्लोक और रामचरितमानस की चौपाइयां आज भी प्रासंगिक हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि मर्यादा का अर्थ सीमा का पालन नहीं बल्कि जीवन को उन्नत बनाने का मार्ग है।

आधुनिक समय में श्रीराम के इन आदर्शों को अपनाकर हम परिवार को मजबूत बना सकते हैं कर्तव्य को निभा सकते हैं और समाज को राम राज्य जैसा बना सकते हैं। राम नवमी के इस पावन अवसर पर हम सबको संकल्प करना चाहिए कि हम अपने दैनिक जीवन में राम की मर्यादा को अपनाएं। परिवार में छोटी छोटी बातों पर विवाद न करें बल्कि सम्मान दें। कर्तव्य में किसी भी स्थिति में समझौता न करें। समाज में दूसरों का सम्मान करें और न्याय का साथ दें। रामचरितमानस की एक प्रसिद्ध चौपाई है-

होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥

अर्थात जो राम ने रचा है वही होता है। इससे हमें विश्वास मिलता है कि मर्यादा का पालन करने वाले का कल्याण अवश्य होता है। श्रीराम के चरित्र से प्रेरित होकर हम अपने व्यक्तिगत परिवारिक और सामाजिक जीवन को बेहतर बना सकते हैं। उनके आदर्शों को अपनाने से ही भारत जैसे महान देश में सच्चा राम राज्य स्थापित होगा जहां हर व्यक्ति सुखी और मर्यादित होगा।

इस प्रकार भगवान श्रीराम का जीवन परिवार कर्तव्य और समाज तीनों क्षेत्रों में मर्यादा का अनुपम उदाहरण है। हम सबको इन सीखों को अपने जीवन में उतारना चाहिए ताकि हम भी मर्यादा पुरुषोत्तम के अनुयायी बन सकें। राम नवमी के इस पर्व पर राम नाम का जप और उनके चरित्र का चिंतन हमें इस मार्ग पर ले जाएगा। जय श्री राम।