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दण्डकारण्य और दोरला जनजाति की राम भक्ति परंपरा

आचार्य ललित मुनि

दण्डकारण्य केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक तपोभूमि है। यह वही वनप्रदेश है, जहाँ अयोध्या के कुमार भगवान श्रीराम ने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण कालखण्ड व्यतीत किया। जिस रास्ते से भगवान सीता माता की खोज में गये, उसे आज राम वनगमन पथ के रूप में जाना जाता है। इस दण्डकारण्य का उल्लेख वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस तथा अन्य अनेक पुराणों में मिलता है। यह क्षेत्र आज के छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश के कुछ भागों में फैला हुआ माना जाता है। घने वनों, नदियों, पर्वतों और आश्रमों से युक्त यह भूमि ऋषियों की तपस्थली रही थी।

मैं पिछले दिनों दक्षिण बस्तर की यात्रा पर था, तो कई ग्रामों में जाने का अवसर मिला तथा वहाँ की संस्कृति, रीतिरिवाज, देवी-देवता तथा खान-पान से भी परिचित हुआ। सुकमा जिले में जिला मुख्यालय से लगभग आठ किलोमीटर दूर रामाराम नामक स्थान है। यहाँ रियासतकालीन भव्य मंदिर बना हुआ है, जिसमें चिटमिटिन माई विराजमान हैं। पूजारी से पूछने पर ज्ञात हुआ कि देवी वारंगल से आई हैं और अपने निवास के लिए उन्होंने इस स्थान को चुना है। यहाँ वार्षिक मेला-जातरा होती है। यहाँ कई स्थानों के नाम भगवान श्रीराम एवं रामायण के पात्रों से संबंधित दिखाई देते हैं। इस क्षेत्र में किस्ताराम, भीमाराम, इंजराम आदि गांवों के नाम मिलते हैं। ग्राम नाम पर रामनाम का प्रभाव दिखाई देता है।

रामाराम सुकमा का चिटमिटिन माता मन्दिर

सुकमा से आगे बढ़ने पर सत्तर किलोमीटर के बाद एक स्थान का नाम इंजराम है। यह दोरला जनजाति बहुल क्षेत्र है। इंजराम में भगवान राम से संबंधित देवगुड़ी है। इस स्थान पर दो वृक्षों के नीचे पुरातात्विक महत्व के कई भग्नावशेष स्थापित हैं, जिसमें तीन सिर वाली एक प्रतिमा है, जिसके हाथ में कमंडल है। इसे ब्रह्मा की प्रतिमा मान सकते हैं। अन्य प्रतिमाओं में सप्तमात्रिका, गणेश जी, महिषासुर मर्दनी, शिवजी का नंदी तथा एक प्रतिमा, जो वृक्ष के नीचे रखी है, उसमें एक स्थानक मुद्रा में पुरुष आकृति है। साथ ही इस शिलाखंड में एक स्त्री एवं पुरुष की आकृति भी उकेरी गई है। इसे ग्रामीण जन भगवान राम की प्रतिमा मानकर पूजा करते हैं तथा इस तरह यहाँ मूर्त एवं अमूर्त पूजा दोनों होती है।

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कोंटा से लगभग दस किलोमीटर उत्तर में एक गांव है, जिसका नाम बुरुगुड़ा है। यह गांव दोरला बहुल है। यहां दो गोत्र के दोरला समूह निवास करते हैं। एक समूह को सलवम परिवार कहा जाता है, जिसका गोत्र पेरमबोई है तथा दूसरे समूह को पण्डा परिवार कहा जाता है, जिसका गोत्र मुण्डगट्टावान है। इन दोनों गोत्रों में आपस में वैवाहिक संबंध होते हैं। मेरी मुलाकात ग्राम प्रमुख सलवम मुत्ता, ग्राम पुजारी सलवम राजा, ग्राम पण्डा राजलू से होती है। हम एक वृक्ष के नीचे चर्चा करते हुए बैठते हैं, तो ग्राम के अन्य लोग भी आ जाते हैं। चर्चा के दौरान मैं पूछता हूँ कि, “आपके गांव में गादी पण्डूम मना लिए?” तो सलवम मुत्ता का कहना था कि अभी महुआ झरने एवं इमली पकने में हफ्ता-दस दिन का समय है। इस हफ्ते ही एक दिन तय करके गादी पण्डुम मनाएंगे।

इंजरम सुकमा जिला की देवगुड़ी

मैं देवगुड़ी में स्थापित देवी-देवताओं के विषय में पूछता हूँ, तो पण्डा राजलू बताते हैं कि उनके गांव में दो गुड़ी हैं, जिन्हें गामम गुड़ी कहते हैं, जहाँ हम लोग अपनी पूजा-पाठ करते हैं। गांव के समीप वाली देवगुड़ी में भगवान राम का स्थान है। यह सुनकर मेरी जिज्ञासा बढ़ गई और जिज्ञासा बढ़ने का एक कारण भी था, क्योंकि मैंने अभी तक सुना और लोगों का लिखा पढ़ा था कि बस्तर के जनजातीय समाज में राम की पूजा नहीं होती। मैंने देवगुड़ी दर्शन की इच्छा व्यक्त की, तो हम सब गांव से बाहर बने देव स्थल की ओर पहुँचे। यहाँ महुआ के वृक्ष के नीचे देव स्थान है, जहाँ अमूर्त रूप से भगवान राम विराजमान हैं। साल में तीन बार पण्डुम में यहाँ जनजातीय विधान एवं परम्परा से पूजा होती है।

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सलवम मुत्ता ने बताया कि उनके यहाँ नई फसल को पहले देवी-देवताओं को उत्सवपूर्वक अर्पित किया जाता है। उसके पश्चात ही गांव के लोग उस फसल का उपभोग करने के अधिकारी होते हैं। पहले सार्वजनिक रूप से देवगुड़ी में पूजा की जाती है। इसके पश्चात सभी अपने घरों में भी पूजा करते हैं। भगवान राम की गुड़ी में बीजा पण्डुम मई-जून में गांव के लोगों की सामूहिक सहमति से मनाया जाता है।

बुरुगुड़ा, जिला सुकमा के दोरला साथियों से जानकारी लेते हुए लेखक

दीवाली से पहले धान की फसल आने पर धान पण्डुम मनाया जाता है। इसके पश्चात सेमी आदि की फसल आने पर सेमी पण्डुम मनाया जाता है। इस पण्डुम को मनाने के लिए सभी परिवारों का योगदान होता है। मुर्गा, बकरा, वराह आदि की बलि भी दी जाती है तथा देवता को महुआ, नारियल, सिंदूर, अगरबत्ती, चना, धान आदि का तर्पण करके प्रसन्न किया जाता है। उसके पश्चात उपस्थित सभी महुआ, ताड़ी आदि का प्रसाद के रूप में सेवन करते हैं और पुरुष यहीं भोजन करके रात भर सपरिवार ढोल-बाजे के साथ नृत्य करते हैं।

स्त्रियों को देव स्थल में भोजन नहीं दिया जाता, उन्हें भोजन घर पर करना पड़ता है। कारण पूछने पर बताया कि अनिष्टकारी शक्तियाँ स्त्रियों की ओर अधिक और सहज आकर्षित होती हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। बैगा-गुनिया करना पड़ता है। इसलिए उन्हें भोजन घर में ही करना पड़ता है। बाकी अन्य सभी पूजा के कार्यक्रमों में वे सम्मिलित होती हैं। अभी महुआ और इमली की फसल आने वाली है, इसलिए अब गादी पण्डुम मनाया जाएगा। सलवम मुत्ता कहते हैं कि हमारी संस्कृति में देवताओं को अर्पण किए बिना किसी भी फसल का उपभोग नहीं किया जाता। जिस क्षेत्र में आम की फसल होती है, वहाँ आमा जोगानी, आमा पण्डुम मनाया जाता है।

दोरला जनजाति की बहनें रेलोपाटा गाते हुए

इंजरम शब्द दोरली भाषा का है। इसका अर्थ जानने की जिज्ञासा से मैंने पूछा, तो सलवम राजलू ने बताया कि “इंज” = अभी आए, “इंजरम” = राम अभी आए। जब भगवान राम यहाँ आए होंगे, तब लोगों ने कहा कि इंजरम, भगवान राम अभी आए, तो इस गांव का नाम इंजरम हो गया। वे मुझे दूसरी गुड़ी तक ले जाते हैं, वहाँ उन्होंने बताया कि दूसरी गुड़ी में हम एक जामुन के वृक्ष की शाखा गड़ाकर वहाँ पूजा करते हैं। वह देवी गंगान्म्मा तथा कोड़ानम्मा का स्थान है। यहाँ हम लोग कुरमी पण्डूम मनाते हैं। तीन साल में जामुन की लकड़ी के प्रतीक को बदलते हैं। पुराने प्रतीक को गांव की सीमा के बाहर छोड़ दिया जाता है तथा नए प्रतीक को लाने एवं स्थापित करने का काम एंडमर पंडा करता है। फिर परम्परा के अनुसार पूजा-पाठ किया जाता है, जहाँ सामूहिक भोजन एवं रेलो नृत्य आदि किया जाता है। पूछने पर बताते हैं कि भगवान राम की गुड़ी लगभग सभी दोरला गांवों में होती है। भगवान राम की पूजा हम कई पीढ़ियों से करते आ रहे हैं।

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दक्षिण बस्तर के बुरुगुड़ा और इंजराम जैसे ग्राम यह प्रमाणित करते हैं कि रामायण केवल ग्रंथों तक सीमित कथा नहीं है, बल्कि लोकजीवन में जीवित सांस्कृतिक परंपरा है। यहाँ राम किसी राजमहल के देवता नहीं, बल्कि वनवासी समाज के आराध्य, ग्राम संरक्षक और लोकविश्वास के केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित हैं। देवगुड़ी में मूर्त और अमूर्त दोनों रूपों में आस्था का समन्वय दिखाई देता है, जो भारतीय संस्कृति की सहिष्णुता और समावेशी दृष्टि को प्रकट करता है। दोरला समाज द्वारा पीढ़ियों से निभाई जा रही परम्पराएँ यह दर्शाती हैं कि प्रकृति, पूर्वज और ईश्वर एक ही सांस्कृतिक सूत्र में जुड़े हुए हैं। नई फसल को देवताओं को अर्पित करने की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है। दण्डकारण्य क्षेत्र में राम की स्मृति लोकविश्वास के माध्यम से निरंतर जीवित रही है और जीवित रहेगी।

आचार्य ललित मुनि

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।