भक्ति, सेवा और समरसता की अमर गाथा : भक्त शिरोमणि माता कर्मा
भारतीय संस्कृति की विराट परंपरा में ऐसे अनेक दिव्य व्यक्तित्व हुए हैं, जिन्होंने अपने कर्म, त्याग, भक्ति और सेवा से समाज को दिशा दी। इन महान आत्माओं की स्मृति केवल इतिहास का हिस्सा नहीं होती, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा का स्रोत बनती है। साहू (तेली) समाज की आराध्य देवी भक्त शिरोमणि माता कर्मा का व्यक्तित्व भी इसी परंपरा का उज्ज्वल उदाहरण है। उनकी जीवनगाथा भक्ति, साहस, सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदना का ऐसा अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है, जो आज भी करोड़ों लोगों के जीवन को प्रेरित करता है।
साहू समाज, जिसे तेली या वैश्य समुदाय के रूप में जाना जाता है, अपनी मेहनत, ईमानदारी और व्यापारिक कुशलता के लिए प्रसिद्ध रहा है। इस समाज की सांस्कृतिक चेतना में माता कर्मा का स्थान सर्वोच्च है। वे केवल एक देवी नहीं, बल्कि समाज की चेतना, उसकी आस्था और उसकी सामूहिक स्मृति की प्रतीक हैं। उनके जीवन की कथा लोकगीतों, किवदंतियों और पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियों में सुरक्षित है।
लोकपरंपरा के अनुसार माता कर्मा का जन्म लगभग एक हजार वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के झांसी नगर में चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी, संवत 1073 (लगभग 1017 ईस्वी) को हुआ था। उनके पिता रामशाह प्रसिद्ध तेल व्यापारी थे और माता लीलावती अत्यंत धार्मिक, करुणामयी और सेवा-भाव से परिपूर्ण थीं। विवाह के कई वर्षों तक संतान न होने के कारण उन्होंने व्रत, तप और श्रीकृष्ण भक्ति का मार्ग अपनाया। बेतवा नदी में स्नान, साधु-संतों की सेवा और एकादशी व्रत के माध्यम से उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की। कहा जाता है कि एक तपस्वी साधु के आशीर्वाद से उन्हें एक दिव्य कन्या का वरदान मिला, जिसका नाम रखा गया — कर्मा।
बाल्यकाल से ही माता कर्मा का जीवन कृष्णभक्ति में रमा हुआ था। वे अपने पिता के साथ मंदिर में भजन गातीं और उनके मधुर स्वर सुनकर लोग भावविभोर हो जाते। उनकी भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके व्यवहार में भी झलकती थी। दस वर्ष की आयु की एक प्रसिद्ध घटना उनकी करुणा और साहस को दर्शाती है। सहेलियों के साथ स्नान करते समय एक बालिका डूबने लगी। सब घबरा गए, पर माता कर्मा ने साहस से उसे बाहर निकाला और श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए उसे जीवनदान दिलाया। यह घटना पूरे नगर में चर्चा का विषय बन गई और लोग उन्हें कृष्ण की अनन्य भक्त कहने लगे।
एक अन्य प्रसंग उनकी सेवा-भावना का परिचायक है। सहेली नंदिनी के माता-पिता बाहर गए थे और उसे दूध बेचने का कार्य सौंपा गया था। माता कर्मा ने उसे प्रोत्साहित किया और उस दिन उसे अप्रत्याशित लाभ हुआ। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि माता कर्मा का व्यक्तित्व बचपन से ही लोककल्याण और करुणा से ओत-प्रोत था।
युवावस्था में उनका विवाह नरवरगढ़ के प्रतिष्ठित साहूकार चतुर्भुज शाह (देवतादीन या पदमजी) से हुआ। पति व्यापार में व्यस्त रहते, परंतु माता कर्मा की भक्ति और सेवा में कभी बाधा नहीं बने। चतुर्भुज शाह स्वयं भी परोपकारी थे। उन्होंने धर्मशालाएं, कुएं, सराय और अन्य सार्वजनिक निर्माण कार्य कराए।
परंतु समाज में ईर्ष्या और षड्यंत्र भी थे। नरवरगढ़ के राजा के हाथी को असाध्य रोग हो गया। षड्यंत्रकारियों ने सुझाव दिया कि सभी तेली परिवार अपना तेल एक कुंड में डालें, ताकि हाथी स्नान कर सके। यह आदेश तेली समाज के लिए विनाशकारी था। तब समाज माता कर्मा के पास पहुंचा। उन्होंने कृष्ण से प्रार्थना की और अगले दिन कुंड में तेल डालते ही वह भर गया। इसे लोग ईश्वरकृपा और माता कर्मा के तप का फल मानते हैं।
इसके बाद उन्होंने समाज को अन्याय के विरुद्ध खड़ा किया और राजस्थान की ओर प्रवास का मार्ग सुझाया। वहां समाज ने परिश्रम से नई शुरुआत की। इसी बीच उनके जीवन में व्यक्तिगत दुख भी आया—पति की मृत्यु। शोक में उन्होंने सती होने का विचार किया, पर ईश्वरीय संकेत से उन्होंने जीवन को समाज सेवा के लिए समर्पित किया।
बाद में माता कर्मा जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर निकलीं। मार्ग में वे छत्तीसगढ़ के राजिम पहुंचीं। वहां उनका स्वागत हुआ और उन्होंने सत्संग का संदेश दिया। उन्होंने लोगों से कहा कि वे हर वर्ष करमसेनी वृक्ष की शाखा स्थापित कर पूजा करें। आज भी यह परंपरा राजिम में जीवित है।
पुरी पहुंचने पर उन्हें मंदिर में प्रवेश से रोका गया। उन्होंने समुद्र तट पर खिचड़ी बनाकर भगवान को अर्पित की। लोकमान्यता है कि भगवान बालक रूप में आकर खिचड़ी ग्रहण करते थे। चार वर्षों तक उन्होंने वहीं रहकर समरसता और समानता का संदेश दिया। अंततः चैत्र शुक्ल एकम संवत 1121 को उन्होंने देह त्याग किया।
माता कर्मा की गाथा साहू समाज के लिए प्रेरणा का अमर स्रोत है। उनकी जयंती चैत्र कृष्ण पापमोचनी एकादशी को धूमधाम से मनाई जाती है। सामाजिक सेवा, शिक्षा, रक्तदान और सामूहिक आयोजन उनके आदर्शों को जीवंत रखते हैं।
आज भी माता कर्मा हमें सिखाती हैं कि सच्चा जीवन वही है, जो सेवा, भक्ति और समर्पण से जुड़ा हो। उनकी स्मृति साहू समाज के लिए केवल आस्था नहीं, बल्कि आत्मगौरव और प्रेरणा का आधार है।
