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महानदी घाटी सभ्यता का साक्षी : केंवटिन देऊल

केंवटिन देऊल महानदी घाटी सभ्यता की एक महत्वपूर्ण और अपेक्षाकृत कम चर्चित धरोहर है। यह आलेख न केवल इसके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करता है, बल्कि संरक्षण की आवश्यकता की ओर भी गंभीर संकेत देता है। स्थानीय जनसहभागिता सराहनीय है, किन्तु वैज्ञानिक संरक्षण और व्यवस्थित दस्तावेजीकरण समय की माँग है। ऐसी विरासतों के संरक्षण से ही हमारी सांस्कृतिक स्मृति सुरक्षित रह सकती है।- संपादक

स्वराज्य करुण
(ब्लॉगर एवं पत्रकार )

महानदी घाटी की सभ्यता अपने अनेक प्राचीन मंदिरों, पुरातात्विक स्मारकों और पुराअवशेषों के लिए देश और दुनिया में प्रसिद्ध है। महानदी छत्तीसगढ़ और ओड़िशा की जीवन रेखा भी है। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में विशाल गंगरेल बाँध (रविशंकर जलाशय) और ओड़िशा के सम्बलपुर जिले में विश्व प्रसिद्ध हीराकूद जलाशय इसी नदी पर स्थित हैं, जो लाखों एकड़ खेतों की प्यास बुझाकर देश के कृषि उत्पादन में सहयोगी बनते हैं। हीराकूद भारत का सबसे लंबा बाँध है, जिसकी लंबाई लगभग 26 किलोमीटर है।

महानदी घाटी सभ्यता का विस्तार छत्तीसगढ़ के पर्वतीय अंचल सिहावा से ओड़िशा में जगन्नाथपुरी के पास बंगाल की खाड़ी तक है। सिहावा में श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि के पास फरसिया (महानंदा) कुंड से निकलकर महानदी लगभग 885 किलोमीटर लंबी यात्रा के बाद बंगोपसागर में समाहित हो जाती है। छत्तीसगढ़ में उद्गम से लेकर इस नदी के यात्रा पथ में राजिम, सिरपुर और शिवरीनारायण जैसे कई प्रसिद्ध तीर्थ हैं, जो अपने प्राचीन मंदिरों की वजह से जनआस्था के प्रमुख केंद्र भी हैं। इनके अलावा महानदी के आसपास कई ऐसे भी प्राचीन मंदिर और पुरातात्विक स्मारक हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर अधिक चर्चित नहीं हैं।

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इन्हीं में छत्तीसगढ़ के ग्राम पंचधार और पुजेरीपाली (पुजारी पाली) के बीच स्थित छठवीं–सातवीं शताब्दी का शिव मंदिर भी शामिल है, जो केंवटिन देऊल के नाम से जाना जाता है। यह भी महानदी घाटी सभ्यता का साक्षी है। पाँच वर्ष पहले (वर्ष 2021 में) मुझे केंवटिन देऊल और उसके आसपास की कुछ जगहों को देखने का अवसर मिला था। यह आलेख उन दिनों की यथास्थिति पर आधारित है।

इतिहासकार इसे छठवीं–सातवीं शताब्दी का गुप्तकालीन मंदिर मानते हैं। यहाँ स्वयंभू शिव विराजमान हैं। यह स्थान इतिहास में शशिपुर के नाम से भी प्रसिद्ध रहा है। पंचधार और पुजेरीपाली परस्पर लगे हुए गाँव हैं, जो रायगढ़ जिले में बरमकेला विकासखंड के अंतर्गत ओड़िशा की सरहद से लगे सरिया कस्बे के पास स्थित हैं। पुजेरीपाली में एक प्राचीन विष्णु देवालय के भग्नावशेष भी हैं। यह देवालय भी छठवीं–सातवीं सदी का माना जाता है।

केंवटिन देऊल के बारे में इस अंचल में प्रचलित जनश्रुतियों के अनुसार, जब दुनिया में छह महीने की रात हुआ करती थी, उस युग में स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने इसका निर्माण किया था। एक जनश्रुति यह भी है कि भगवान विश्वकर्मा जब इसे बना रहे थे, तभी उस रात के अंतिम पहर में केंवटिन ढेंकी में धान कूटने लगी। चूँकि रात बीती नहीं थी और ढेंकी की आवाज़ से भगवान का ध्यान भंग हो गया, तो उन्होंने इसके गुम्बद को अधूरा छोड़ दिया। आज से करीब तीस साल पहले तक यह मंदिर अपने बेहतर रख-रखाव की बाट जोह रहा था।

बाद के वर्षों में ग्रामीणों ने अपनी समिति बनाकर जन-सहयोग से इसका जीर्णोद्धार किया। यह समिति कपिलदेव बाबा शिव मंदिर समिति के नाम से गठित की गई है। ग्रामीणों ने कोशिश की है कि करीब 1300 या 1400 साल पहले लाल ईंटों से निर्मित यह मंदिर अपने मूल स्वरूप में दिखाई दे। इसीलिए इसका रंग-रोगन भी उसी के अनुरूप किया गया है।

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मंदिर में नियमित पूजा-पाठ के साथ-साथ समय-समय पर मुहूर्त देखकर धार्मिक रीति-रिवाज के अनुसार सादगीपूर्ण ढंग से विवाह समारोह भी आयोजित किए जाते हैं। इसके लिए मंदिर परिसर में जन-सहयोग से एक विवाह मंडप भी बनवाया गया है। अभिमन्यु गिरि इस मंदिर के मुख्य पुजारी हैं। उन्होंने बताया कि मंदिर में पूजा-पाठ का दायित्व संभाल रही यह उनकी सातवीं पीढ़ी है। अभिमन्यु गिरि कुछ किंवदंतियों के आधार पर इस मंदिर को त्रेता युग का बताते हैं। केंवटिन देऊल में हर साल महाशिवरात्रि का महापर्व भी उत्साह के साथ मनाया जाता है।

पंचधार में केंवटिन देऊल के सामने एक विशाल पीपल के पीछे एक विशाल बरगद भी है। गर्मियों में बरगद की घनी छाया श्रद्धालुओं को शीतलता प्रदान करती है। मंदिर परिसर में एक ऐसा कुआँ है, जिसका पानी कभी नहीं सूखता। गर्मी के दिनों में भी यह कुआँ लबालब रहता है। इस परिसर में मंदिर के सामने एक सरकारी स्कूल भी है। केंवटिन देऊल के मुख्य पुजारी के अनुसार पंचधार और पुजेरीपाली की धरती में अनेक पुरातात्विक अवशेष आज भी बिखरे हुए हैं, जिनके उचित संरक्षण की आवश्यकता है।

केंवटिन देऊल में गर्भगृह के सामने देवी-देवताओं की कुछ प्राचीन मूर्तियों को सुरक्षित रखकर उनकी भी पूजा-अर्चना की जा रही है। पंचधार के केंवटिन देऊल और पुजेरीपाली के खंडित विष्णु मंदिर के आसपास पुरातत्व विभाग को सूचना बोर्ड लगाकर इनके निर्माणकाल आदि के बारे में जानकारी प्रदर्शित करनी चाहिए। पाँच वर्ष पहले मुझे वहाँ ऐसा कोई बोर्ड नहीं दिखा, संभव है अब लगा दिया गया हो। पहले खंडित स्वरूप का प्राचीन विष्णु मंदिर दूर से ही नजर आ जाता था, लेकिन जनसंख्या के बढ़ते दबाव के कारण अब इसके आसपास ग्रामीणों के अनेक मकान बन गए हैं, जिससे इसे देखने एक सीमेंटेड गली से होकर वहाँ जाना पड़ता है।

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एक सकारात्मक पहल यह हुई है कि ग्रामीणों ने पंचायत के सहयोग से यहाँ एक संग्रहालय बनवाया है। यह संग्रहालय अभी अपूर्ण है, लेकिन मुख्य भवन बन चुका है, जहाँ कई पुरावशेषों को व्यवस्थित ढंग से रखा गया है। चूँकि गाँव के लोग पुरातत्वविद नहीं हैं, इसलिए इन प्राचीन मूर्तियों आदि के बारे में उन्होंने कोई विवरण अंकित नहीं किया है। उनमें से दो मूर्तियों की पूजा भी हो रही है। सिंदूर आदि के लेपन से उनका मूल स्वरूप कुछ समय बाद प्रभावित हो सकता है, जो चिंता का विषय है। संग्रहालय और विष्णु देवालय के सामने भी कई टूटी-फूटी प्राचीन प्रतिमाएँ चिंताजनक हालत में बिखरी पड़ी हैं। कुछ लोगों के अनुसार वर्षों पहले पंचधार और पुजेरीपाली की धरती पर प्राचीन मंदिरों के पत्थर इतनी बड़ी संख्या में बिखरे हुए थे कि कई लोगों ने अपने मकानों के निर्माण में उनका उपयोग कर लिया।