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मौकों पर भारत के खिलाफ खड़ा रहा ईरान : भारत-ईरान संबंधों का सच

आचार्य ललित मुनि

आज ईरान – इजराइल और अमेरिका युद्ध में खुमैनी की मृत्यु को लेकर भारत में कुछ लोगों द्वारा हल्ला मचाया जा रहा है कि भारत ईरान का समर्थन क्यों नहीं कर रहा? भारत और ईरान के संबंधों को प्राचीन सभ्यताओं की मित्रता, सांस्कृतिक निकटता और रणनीतिक साझेदार होना बताया जा रहा है, लेकिन यदि इन संबंधों का गंभीर भू राजनीतिक विश्लेषण किया जाए तो एक अलग तस्वीर सामने आती है। यह तस्वीर बताती है कि भारत और ईरान के संबंध भावनात्मक या स्थायी विश्वास पर नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य हितों और सीमित व्यापारिक आवश्यकताओं पर आधारित रहे हैं।

इतिहास गवाह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। भारत और ईरान के संबंध इसी सिद्धांत का स्पष्ट उदाहरण हैं। कई अवसर ऐसे आए जब ईरान ने भारत के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विरोध का रास्ता चुना, जबकि भारत ने लगातार संतुलन बनाए रखने की नीति अपनाई।

प्राचीन भारत और फारस के बीच सांस्कृतिक संपर्क अवश्य रहे, लेकिन आधुनिक राष्ट्र राज्य की राजनीति में सांस्कृतिक विरासत का प्रभाव सीमित हो जाता है। मध्यकालीन फारसी प्रभाव, भाषा या पारसी समुदाय की उपस्थिति आधुनिक कूटनीतिक व्यवहार को निर्धारित नहीं करती। स्वतंत्रता के बाद भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई, जबकि ईरान ने स्वयं को अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था का प्रमुख सहयोगी बना लिया। यही वह मोड़ था जहां दोनों देशों के हित अलग दिशाओं में चले गए।

ईरान कभी भी भारत का स्थाई सहयोगी नहीं रहा। 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध ने स्पष्ट कर दिया कि ईरान दक्षिण एशिया में भारत की अपेक्षा पाकिस्तान के अधिक निकट था। शाह मोहम्मद रेजा पहलवी के नेतृत्व में ईरान ने पाकिस्तान को तेल, हथियार और सैन्य रसद सहायता प्रदान की। उस समय पाकिस्तान की सैन्य क्षमता बनाए रखने में ईरान की भूमिका महत्वपूर्ण थी। भारत के लिए यह केवल कूटनीतिक असहमति नहीं बल्कि सुरक्षा हितों के खिलाफ कदम था। भारत स्वयं को एक सभ्यतागत मित्र देश से समर्थन की उम्मीद करता था, लेकिन ईरान ने सामरिक गठबंधन को प्राथमिकता दी।

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इसके बाद 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भी ईरान ने पाकिस्तान का समर्थन जारी रखा। रिपोर्टों के अनुसार ईरान ने पाकिस्तानी सेना को सैन्य उपकरण और हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराए। यह वह समय था जब पाकिस्तान पूर्वी पाकिस्तान में गंभीर मानवीय संकट पैदा कर चुका था और अधिकांश वैश्विक जनमत भारत के पक्ष में झुक रहा था। इसके बावजूद ईरान का रुख पाकिस्तान समर्थक रहा। भारत के रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह चरण भारत ईरान संबंधों में विश्वासघात जैसा कदम था।

ईरान और पाकिस्तान दोनों सेंटो सैन्य गठबंधन का हिस्सा थे। यह संगठन औपचारिक रूप से साम्यवाद विरोधी था, लेकिन व्यवहार में दक्षिण एशिया में भारत को संतुलित करने वाले ढांचे के रूप में कार्य करता था। इस गठबंधन ने ईरान को पाकिस्तान की सुरक्षा नीति से जोड़ दिया, जिससे भारत के साथ राजनीतिक दूरी और बढ़ी। 1970 के दशक में पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में विद्रोह के दौरान ईरान ने पाकिस्तान को सैन्य हेलीकॉप्टर और सहायता प्रदान की। भारत के दृष्टिकोण से यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में पाकिस्तान को मजबूत करने वाला कदम था।

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद यह उम्मीद बनी कि ईरान पाकिस्तान से दूरी बनाएगा और भारत के साथ संबंध मजबूत करेगा। प्रारंभिक वर्षों में कुछ सकारात्मक संकेत मिले, लेकिन वास्तविकता यह नहीं थी। ईरान ने अपनी इस्लामी पहचान को विदेश नीति का आधार बनाया, जिसके कारण वह मुस्लिम मुद्दों पर सार्वजनिक रुख अपनाने लगा। यही प्रवृत्ति आगे चलकर भारत के लिए असहज स्थिति का कारण बनी।

ईरान द्वारा भारत के विरोध के सबसे स्पष्ट उदाहरण कश्मीर से जुड़े बयान रहे हैं। 2010 में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनी ने कश्मीर को मुस्लिम संघर्ष का मुद्दा बताते हुए भारत की आलोचना की। भारत सरकार ने इसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया। 2017 में फिर इसी प्रकार का बयान दिया गया, जिसमें कश्मीर के मुसलमानों के समर्थन की बात कही गई। 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद ईरान के कई राजनीतिक और धार्मिक नेताओं ने भारत की आलोचना की।

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2020 दिल्ली दंगों के दौरान भी ईरान की ओर से सार्वजनिक टिप्पणी की गई, जिसे भारत ने अस्वीकार्य बताया। सितंबर 2024 में अली खामेनी ने भारत में मुस्लिमों की स्थिति पर टिप्पणी की, जिसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे गलत सूचना पर आधारित बताया। इन घटनाओं ने स्पष्ट किया कि ईरान समय समय पर भारत के संवेदनशील आंतरिक मुद्दों पर सार्वजनिक रुख अपनाता रहा है।

हालांकि ईरान ने संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ प्रत्यक्ष मतदान बहुत कम किया, लेकिन उसका सार्वजनिक राजनीतिक विमर्श कई बार पाकिस्तान समर्थक दृष्टिकोण से मेल खाता रहा। भारत को बार बार कूटनीतिक स्पष्टीकरण देना पड़ा, जिससे संबंधों में विश्वास की कमी दिखाई देती है।

भारत और ईरान संबंधों का सबसे स्थायी आधार ऊर्जा व्यापार रहा है। ईरान भारत को तेल बेचता रहा और भारत उसके लिए बड़ा बाजार था। जब तक आर्थिक लाभ था, संबंध सक्रिय रहे। जैसे ही अमेरिकी प्रतिबंध लागू हुए, भारत ने 2019 में ईरानी तेल आयात लगभग समाप्त कर दिया। इस निर्णय ने यह स्पष्ट किया कि संबंध रणनीतिक मित्रता से अधिक व्यावसायिक आवश्यकता पर आधारित थे। यदि संबंध गहरे राजनीतिक विश्वास पर आधारित होते तो ऊर्जा सहयोग पूरी तरह समाप्त नहीं होता।

ईरान ने चीन के साथ दीर्घकालिक आर्थिक और सुरक्षा समझौता किया, जिसमें ऊर्जा और अवसंरचना निवेश शामिल हैं। इससे भारत की रणनीतिक भूमिका सीमित हुई। चाबहार परियोजना के समानांतर चीन द्वारा ग्वादर बंदरगाह का विकास भारत के लिए चुनौती बन गया। ईरान ने कई अवसरों पर चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ संतुलन बनाए रखा, जिससे भारत को विशेष प्राथमिकता नहीं मिली।

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चाबहार बंदरगाह को अक्सर भारत ईरान मित्रता का प्रतीक कहा जाता है, लेकिन इसकी प्रगति धीमी रही। प्रशासनिक बाधाएं, प्रतिबंध और ईरान की आंतरिक नीतियों ने परियोजना को प्रभावित किया। ईरान ने कई बार भारत पर निवेश गति बढ़ाने का दबाव डाला और वैकल्पिक साझेदारों की तलाश भी की। इससे स्पष्ट होता है कि परियोजना भी पारस्परिक लाभ का साधन है, न कि विशेष राजनीतिक विश्वास का परिणाम।

तालिबान विरोध के दौर में भारत और ईरान के हित मिले, लेकिन यह सहयोग स्थायी नहीं था। तालिबान की वापसी के बाद ईरान ने व्यावहारिक संबंध स्थापित कर लिए, जबकि भारत सावधानीपूर्ण रुख अपनाता रहा। यह भी दर्शाता है कि दोनों देशों की प्राथमिकताएं अलग हैं।

इस विश्लेषण से ज्ञात होता है कि ईरान ने कई महत्वपूर्ण अवसरों पर भारत के रणनीतिक हितों के विरुद्ध कदम उठाए। जैसे 1965 और 1971 युद्धों में पाकिस्तान समर्थन, कश्मीर मुद्दे पर बार बार सार्वजनिक आलोचना, भारत के आंतरिक मामलों पर राजनीतिक बयान, चीन और पाकिस्तान के साथ समानांतर रणनीतिक समीकरण आदि। इन घटनाओं ने संबंधों को सीमित विश्वास के दायरे में रखा।

भारत और ईरान संबंध भावनात्मक मित्रता की तुलना में व्यावहारिक कूटनीति का उदाहरण हैं। दोनों देशों ने एक दूसरे के साथ सहयोग किया, लेकिन यह सहयोग मुख्यतः व्यापार, ऊर्जा और क्षेत्रीय संतुलन तक सीमित रहा। ईरान ने कई ऐतिहासिक चरणों में भारत का खुला या परोक्ष विरोध किया, जबकि भारत ने संतुलित और संयमित नीति अपनाई। वास्तविकता यह है कि भारत ईरान संबंध न तो शत्रुतापूर्ण हैं और न ही पूर्ण विश्वास पर आधारित। यह संबंध परिस्थितियों से संचालित व्यावसायिक साझेदारी है जिसमें राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहते हैं।