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संत कवि पवन दीवान ने क्यों लिया था खुले बदन संन्यासी रहने का संकल्प? पुण्यतिथि विशेष

स्वराज्य करुण
(ब्लॉगर एवं पत्रकार )

आज 2 मार्च को छत्तीसगढ़ के संत कवि पवन दीवान की दसवीं पुण्यतिथि है। उनका जन्म 1 जनवरी 1945 को महानदी से लगे राजिम के पास ग्राम किरवई में हुआ था और 2 मार्च 2016 को गुड़गांव के एक अस्पताल में उनका निधन हुआ।

हमारी पीढ़ी के अधिकांश लोगों ने उन्हें एक संन्यासी के रूप में देखा, जो खड़ाऊँ पहनते थे और लगभग खुले बदन, घुटनों तक गेरुआ वस्त्र में रहा करते थे। उनकी उन्मुक्त हँसी उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी, लेकिन उनके हँसते चेहरे के पीछे देश और समाज के अनेक दुःख-दर्द छुपे रहते थे, जो अक्सर उनकी कविताओं में प्रकट हो जाते थे।

आइए जानते हैं, क्या था उनके खुले बदन संन्यासी जीवन का रहस्य।

आज़ादी से बहुत पहले जिस तरह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी देश के गाँवों में व्याप्त भयानक गरीबी और अधनंगे लोगों को देखकर स्वयं आधुनिक परिधानों का त्याग कर घुटनों तक धोती और खुले बदन रहने लगे थे, लगभग उसी संवेदनात्मक प्रेरणा की कहानी संत कवि पवन दीवान के जीवन में भी दिखाई देती है।

मुझे लगता है कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के दौर में प्रचलित नारा — “पवन नहीं यह आँधी है, छत्तीसगढ़ का गांधी है” — शायद इसी कारण लोकप्रिय हुआ।

उन्होंने दशकों पहले देवभोग और मैनपुर जैसे आदिवासी बहुल वन क्षेत्रों में घोर गरीबी और अभावों में जीवन जी रहे लोगों को देखा। वहाँ कई लोगों के शरीर पर ढंग के कपड़े तक नहीं थे। यह दृश्य उनके कवि हृदय को भीतर तक विचलित कर गया।

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वहीं से लौटकर उन्होंने आजीवन खुले बदन रहने का संकल्प लिया और उसे पूरी निष्ठा से निभाया। उन्होंने संन्यास धारण किया और गेरुआ वस्त्रों में जीवन व्यतीत किया।

पवन दीवान से संत कवि पवन दीवान और फिर स्वामी अमृतानंद सरस्वती बनने की यह कथा मुझे उनके निकटतम साहित्यिक मित्र श्री रवि श्रीवास्तव से सुनने को मिली। 31 जनवरी 2026 को भिलाई नगर स्थित उनके निवास पर सौजन्य भेंट के दौरान उन्होंने यह प्रसंग साझा किया।

स्मृतियों की गठरी खोलते हुए श्री श्रीवास्तव ने बताया कि लघु पत्रिकाओं के स्वर्णिम दौर में उन्होंने कृष्णा रंजन जी के साथ साइक्लोस्टाइल पत्रिका ‘बिम्ब’ का प्रकाशन शुरू किया, जबकि पवन दीवान ‘अंतरिक्ष’ नामक गीतों की लघु पत्रिका निकालते थे।

उन्होंने बताया कि दीवान जी प्रारंभिक जीवन में फुलपैंट-शर्ट या पायजामा-कुर्ता पहनते थे। एक बार वे अचानक बस से राजिम से लगभग 150 किलोमीटर दूर देवभोग चले गए। वहाँ से लौटते समय मैनपुर में भी रुके।

दोनों क्षेत्रों की गरीबी और अभाव ने उन्हें गहराई से झकझोर दिया। उसी क्षण उन्होंने परंपरागत आधुनिक वस्त्र त्यागने और साधु जीवन अपनाने का निर्णय लिया।

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संन्यास के बाद उनका आध्यात्मिक नाम स्वामी अमृतानंद सरस्वती हुआ, किंतु कवि के रूप में वे जीवनभर पवन दीवान ही बने रहे। वे लोकप्रिय भागवत प्रवचनकार, साथ ही राजिम के संस्कृत विद्यालय में शिक्षक और प्राचार्य भी रहे।

उनकी प्रतिमा ग्राम किरवई के शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल परिसर में स्थापित की गई है, जिसका अनावरण वर्ष 2023 में उनकी जयंती पर तत्कालीन कृषि मंत्री रविंद्र चौबे द्वारा किया गया।

वर्ष 1972 में भारत सरकार के आमंत्रण पर उन्होंने दिल्ली के लालकिले में आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में उसी गेरुआ वेश में काव्यपाठ किया। वे छत्तीसगढ़ के दूसरे कवि थे जिन्हें यह सम्मान मिला। उनसे पहले धमतरी के शायर मुकीम भारती और बाद में लक्ष्मण मस्तुरिया ने भी लालकिले में काव्य पाठ किया।

आज ये तीनों साहित्यिक विभूतियाँ हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ आज भी जीवित हैं।

पवन दीवान वर्ष 1977-78 में राजिम से विधायक बने और तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार में जेल मंत्री रहे। वर्ष 1991 में वे महासमुंद से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद उन्हें गौ सेवा आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।

राजनीति में सक्रिय रहने के बावजूद उनकी पहचान मुख्य रूप से आध्यात्मिक संत, विद्वान भागवताचार्य और हिन्दी तथा छत्तीसगढ़ी के जनकवि के रूप में बनी रही।

उनकी प्रमुख कृतियों में ‘मेरा हर स्वर इसका पूजन’ और ‘अम्बर का आशीष’ उल्लेखनीय हैं।

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संत कवि की पुण्य स्मृतियों को नमन करते हुए प्रस्तुत है उनका लगभग 52 वर्ष पुराना गीत, जिसमें किसानों, मजदूरों और गरीबों के संघर्ष के साथ गहरा जीवन दर्शन व्यक्त हुआ है।


गति ही आज लगाम हो गयी

सुबह चले थे किस पड़ाव से,
चलते-चलते शाम हो गयी,
माया की बस्ती में आकर
यह आत्मा बदनाम हो गयी।

जीवन का जहाज डूबा है
मगर भरे सागर में,
प्यास छलकती ही रहती है
माटी की गागर में।

ठहर गए साँसों के घोड़े,
गति ही आज लगाम हो गयी।
सुबह चले थे किस पड़ाव से,
चलते-चलते शाम हो गयी।

मेरे सपनों के कस्बे में
एक गरीब किसान रहता था,
अपनी नन्ही सी गुड़िया से
रोटी की भाषा कहता था।

उसका घर जल गया भूख से,
सब खेती नीलाम हो गयी,
सुबह चले थे किस पड़ाव से,
चलते-चलते शाम हो गयी।

बच्चों को बहलाने खातिर
केवल भाषण का बाजा है,
महल खंडहर के नक्शे हैं,
रानी है न राजा है।

कुछ मकान ही देश बन गए,
सब जनता गुमनाम हो गयी,
सुबह चले थे किस पड़ाव से,
चलते-चलते शाम हो गयी।

— पवन दीवान
(भाटापारा से 1974 में प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘अस्तित्व’ से साभार)


आलेख — स्वराज करुण