बुंदेलखंड की मिट्टी से उठी एक अमर साहित्यिक ज्योति डॉक्टर वृंदावनलाल वर्मा

इतिहास को याद कर बेतवा नदी की लहरें आज भी वही स्वर छेड़ती हैं जिनमें कभी घोड़ों की टापों की गूंज घुली थी। ऐसे ही एक दिन, 23 फरवरी को, हम एक ऐसे साहित्यकार को याद करते हैं जिसने इस मिट्टी के इतिहास को शब्दों में ढालकर अमर कर दिया। डॉक्टर वृंदावनलाल वर्मा केवल एक लेखक नहीं थे, वे संवेदना के शिल्पी थे। उन्होंने इतिहास को शुष्क घटनाओं का संग्रह नहीं माना, बल्कि उसे मनुष्यों की धड़कनों, आँसुओं और सपनों के रूप में प्रस्तुत किया।
उनका जन्म 9 जनवरी 1889 को झाँसी जिले के मऊरानीपुर में एक सम्मानित कायस्थ परिवार में हुआ। पिता अयोध्या प्रसाद वर्मा के घर जन्मे इस बालक ने बचपन से ही उस वातावरण में सांस ली जहाँ वीरता और आत्मसम्मान की कहानियाँ हवा में तैरती थीं। उनके परदादा आनंदराव माधव 1857 के संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल होकर वीरगति को प्राप्त हुए थे। घर में जब दादी और परदादी उन दिनों की कथाएँ सुनातीं तो बालक वृंदावनलाल की आँखों में एक अलग चमक दिखाई देती। रानी की तलवार, किले की प्राचीरें, रणभूमि की धूल और स्वाभिमान की ज्वाला उनके भीतर धीरे धीरे आकार ले रही थी।
विद्यालय में पढ़ाई के दौरान जब उन्होंने अंग्रेजी लेखक मार्सडन की पुस्तक में यह पढ़ा कि गर्म देशों के लोग ठंडे देशों के आक्रमणकारियों से हार जाते हैं, तो उनके भीतर आक्रोश उमड़ पड़ा। उन्होंने उस पृष्ठ को फाड़ दिया। घर आकर उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह उनकी मिट्टी का अपमान है। यह घटना छोटी लग सकती है, पर इसी ने उनके भीतर इतिहास को सही रूप में प्रस्तुत करने का संकल्प जगा दिया। उन्होंने तय कर लिया कि वे अपनी धरती का इतिहास स्वयं लिखेंगे, उस दृष्टि से जो भारतीय आत्मा को समझती हो।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और आगरा कॉलेज से कानून की पढ़ाई की। वकालत उनका पेशा बना, लेकिन इतिहास उनका जुनून रहा। युवावस्था में ही उन्होंने लेखन प्रारंभ कर दिया। 1908 में ‘महात्मा बुद्ध का जीवन चरित्र’ उनकी पहली महत्वपूर्ण रचना थी। इसके बाद 1909 में ‘सेनापति ऊदल’ नामक नाटक लिखा, जिसमें बुंदेलखंड के वीर ऊदल की कथा थी। यह नाटक अंग्रेजी शासन को रास नहीं आया और जब्त कर लिया गया। पर इससे उनके हौसले नहीं टूटे।
झाँसी में वकालत करते हुए वे समाज की वास्तविकताओं से जुड़े रहे। वे केवल अदालत की बहसों तक सीमित नहीं थे। जिला बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कई सामाजिक कार्य किए। हैजे के प्रकोप के समय उन्होंने लोगों को टीका लगवाने के लिए स्वयं आगे बढ़कर प्रेरित किया। दवा की कमी होने पर उन्होंने दवाखाने का ताला खुलवाया ताकि लोगों की जान बचाई जा सके। जब इस पर शिकायत हुई तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि मानव जीवन नियमों से अधिक मूल्यवान है। यह साहस और करुणा उनके व्यक्तित्व की पहचान थी।
उनकी आत्मकथा ‘अपनी कहानी’ उनके जीवन का सजीव दस्तावेज है। उसमें उन्होंने अपने संघर्षों, स्वाभिमान और हास्यप्रियता का सहज चित्रण किया है। नौकरी के शुरुआती दिनों में जब उन्हें रिश्वत के पैसे दिए गए तो उन्होंने नौकरी छोड़ दी। जंगल विभाग में क्लर्क रहते हुए अनुचित व्यवहार पर उन्होंने पद त्याग दिया। उनके लिए आत्मसम्मान सर्वोपरि था। जीवन में सादगी थी, पर आत्मविश्वास अडिग।
साहित्य की ओर लौटें तो 1927 में प्रकाशित ‘गढ़ कुंडार’ ने उन्हें ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में स्थापित किया। बुंदेलखंड के दुर्गों और वीरों की कहानी को उन्होंने रोमांच और संवेदना के साथ प्रस्तुत किया। 1930 में ‘विराटा की पद्मिनी’ आई, जिसमें प्रेम और स्वाभिमान का अद्भुत संगम था। लोकगीतों से प्रेरणा लेकर उन्होंने कथा को जीवंत बनाया। वे केवल इतिहासकार नहीं थे, लोकजीवन के पारखी भी थे।
1946 में प्रकाशित ‘झाँसी की रानी’ उनका सबसे चर्चित उपन्यास बना। इस कृति को लिखने में उन्होंने वर्षों तक शोध किया। गाँवों में घूमे, लोककथाएँ सुनीं, दस्तावेजों का अध्ययन किया। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई को केवल योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील स्त्री, एक माँ और एक दृढ़ व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया। उनके शब्दों में रानी की तलवार की चमक ही नहीं, उसकी आँखों की नमी भी दिखाई देती है।
1950 में ‘मृगनयनी’ प्रकाशित हुआ। यह ग्वालियर के राजा मान सिंह तोमर और उनकी प्रेयसी मृगनयनी की कथा है। इस उपन्यास में प्रेम, कला और इतिहास का अद्भुत संगम है। मृगनयनी का चरित्र स्त्री शक्ति और आत्मसम्मान का प्रतीक बनकर उभरता है। वर्मा जी ने स्त्रियों को अपने उपन्यासों में अत्यंत सम्मान और गरिमा के साथ चित्रित किया। वे मानते थे कि स्त्री यदि अपने भीतर की शक्ति पहचान ले तो उसे कोई पराजित नहीं कर सकता।
सामाजिक उपन्यासों में भी उनका दृष्टिकोण उतना ही संवेदनशील था। ‘संगम’, ‘लगन’, ‘टूटे काँटे’ जैसी रचनाओं में उन्होंने समाज की समस्याओं को उकेरा, पर निराशा नहीं फैलाई। वे समाधान को प्रेम और समझदारी में खोजते थे। उनकी भाषा सरल थी, पर प्रभावशाली। उसमें बुंदेली मिट्टी की गंध थी।
वर्मा जी का जीवन केवल लेखन तक सीमित नहीं रहा। वे क्रांतिकारी विचारों से जुड़े। गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति उनका सम्मान गहरा था। यदि आवश्यकता पड़ी तो उन्होंने सरकारी पद भी छोड़ दिया। उनके भीतर देशप्रेम और मानवीयता साथ साथ चलती थी।
पुरस्कारों और सम्मानों से उनका जीवन अलंकृत हुआ। उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। ‘झाँसी की रानी’ के लिए विशेष पुरस्कार मिला। आगरा विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की उपाधि दी। परंतु वे सम्मान से अधिक अपने पाठकों के प्रेम को महत्व देते थे।
उनके साहित्य की विशेषता यह थी कि उन्होंने इतिहास को जीवंत बना दिया। पाठक उनके उपन्यास पढ़ते हुए केवल घटनाएँ नहीं देखते, बल्कि पात्रों के साथ जीते हैं। उनकी लेखनी में प्रकृति और मनुष्य का सुंदर समन्वय है। नदी, पहाड़, किले, सब उनके शब्दों में बोलते हैं।
23 फरवरी 1969 को वे इस संसार से विदा हुए, पर उनकी रचनाएँ आज भी जीवित हैं। बुंदेलखंड की हवा में उनका नाम गूंजता है। उनकी कृतियाँ नई पीढ़ी को अपने अतीत से जोड़ती हैं। वे सिखाते हैं कि इतिहास केवल बीती बात नहीं, वह वर्तमान की आत्मा है।
उनकी स्मृति में सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही है कि हम उनकी रचनाओं को पढ़ें, समझें और उस मानवीय दृष्टि को अपनाएँ जिसे उन्होंने जीवन भर जिया। डॉक्टर वृंदावनलाल वर्मा ने सिद्ध किया कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शन भी है। उन्होंने इतिहास को प्रेम और करुणा के साथ प्रस्तुत किया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों को पहचान सकें।
आज जब हम उन्हें याद करते हैं तो यह अनुभव होता है कि वे कहीं गए नहीं हैं। वे अपने उपन्यासों के पन्नों में, बुंदेलखंड की धूल में और हर उस हृदय में जीवित हैं जो अपने अतीत पर गर्व करता है और भविष्य के लिए आशा रखता है। उनकी कलम की स्याही सूखी नहीं है, वह आज भी हमारी चेतना में बह रही है। डॉक्टर वृंदावनलाल वर्मा को विनम्र श्रद्धांजलि। उनकी साहित्यिक ज्योति हमें सदैव प्रेरित करती रहे।
