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बलिदानी वनवासी महानायक टंट्या भील के संघर्ष, शौर्य की गाथा

स्वतंत्रता के जिस शुभ्र प्रकाश में हम आज स्वच्छंद श्वांस ले रहे हैं, यह साधारण नहीं है। इसके पीछे अगणित हुतात्माओं का बलिदान हुआ है। कुछ को हम जानते हैं, याद करते हैं, गीत गाते हैं, लेकिन कितने ऐसे हैं जिनके बारे में हम कुछ नहीं जानते। जिन्हें हम याद तक नहीं करते, जिनका उल्लेख इतिहास के पन्नों पर मिलता तो है, पर अत्यल्प। ऐसे योद्धा अनगिनत हैं जिन्होंने इस राष्ट्र के लिये, राष्ट्र की संस्कृति के लिये बलिदान दिया और समय की परतों में कहीं खो गये।

वनवासी महानायक टंट्या भील ऐसे ही बलिदानी हैं। जिन्हें अंग्रेजों ने अपराधी कहा और स्वतंत्रता के बाद की आरंभिक पीढ़ियों ने भी वही माना। लेकिन अब सच सामने आ रहा है, इतिहास की परतें खुल रही हैं, हम उनके बलिदान से अवगत हो रहे हैं और इस वर्ष मध्यप्रदेश सरकार और समाज दोनों उन्हें स्मरण कर रहे हैं। उन्होंने अपना जीवन, अपना परिवार ही नहीं, बल्कि पीढ़ियाँ कुर्बान कर दीं। वनवासी नायक टंट्या भील की संघर्ष गाथा से भी परतें उठ रही हैं और समाज उनके शौर्य, वीरता और संकल्पशीलता से अवगत हो रहा है। हालांकि वन अंचलों में उनकी किंवदंतियाँ आज भी जीवित हैं। वे कहानियों में अमर हैं, पर इतिहास के पृष्ठों पर उतना स्थान नहीं, पर्याप्त विवरण भी नहीं।

कोई कल्पना कर सकता है कि दो हजार सशस्त्र सिपाहियों की अंग्रेजी फौज उनके पीछे सालों तक लगी रही, लेकिन वे हाथ न आए। अंग्रेजों को छकाते रहे, न रुके, न थके। और अंत में अंग्रेजों ने एक चाल चली। जिन्हें शक्ति से न पकड़ पाए, उन्हें धोखे से पकड़ा। इसके लिये एक विश्वासघाती गणपत सामने आया, जिसकी पत्नी टंट्या भील को राखी बाँधती थी। टंट्या श्रावण की पूर्णिमा को राखी बंधवाने आए और राखी का यह बंधन उन्हें फाँसी के फंदे तक ले गया।

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उनका प्रभाव 1700 गांवों तक था। वे अंग्रेजों और उनके दलालों के सख्त दुश्मन थे। जब वे किशोर थे तब उन्होंने अंग्रेजी फौज और उनके दलालों द्वारा जन-सामान्य पर ढाए जा रहे अत्याचार देखे। वनवासियों और गाँवों में फैलाया गया कहर उन्होंने स्वयं देखा। यह अंग्रेजों द्वारा 1857 की क्रांति के दमन का दौर था। क्रांति की असफलता के बाद अंग्रेजों ने उन क्रांतिकारियों को खोज निकालना शुरू किया जो भूमिगत हो गए थे। इसी तलाश में गाँव के गाँव जला दिए गए। वनवासियों पर अत्याचार कर पूछताछ की गई। यह सब दृश्य टंट्या की आँखों में जीवन भर सजीव रहे। इसलिए उनके निशाने पर अंग्रेजी सिपाही और उनके मददगार व्यापारी, मालगुजार आ गए।

उन्होंने वनवासी युवकों की टोली बनाई। वे तात्या टोपे से मिले, मराठों की छापामार युद्ध-शैली सीखी और अंग्रेजों के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया।

बलिदानी टंट्या मामा का जन्म खंडवा जिले की पंधाना तहसील के अंतर्गत ग्राम बड़दा में हुआ था। उनके पिता भाऊसिंह एक सामान्य कृषक थे। माता का निधन बचपन में ही हो गया था। एक समय ऐसा आया जब पिता भी कुछ दिनों के लिये बंदी बना लिए गए। टंट्या का पालन मामा-मामी के यहाँ हुआ। उनका शरीर दुबला-पतला और लंबा था। उनमें फुर्ती अद्भुत थी, मनोबल इतना कि बिना रुके मीलों दौड़ सकते थे। वनवासियों की भाषा में जो पौधा पतला और लंबा होता है उसे ‘तंटा’ कहते हैं, और यही नाम आगे चलकर टंट्या हो गया।

उन्होंने बचपन में तीर-कमान, गोफन और लाठी बखूबी चलाना सीख लिया था। आगे चलकर उनका विवाह वनवासी युवती कागज बाई से हुआ। संतान भी हुई। आरंभिक जीवन एक सामान्य वनवासी की तरह बीता। वे लगभग तीस वर्ष के हुए, तभी दो महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं।

यह वह समय था जब ब्रिटिश सरकार 1857 की क्रांति में हुए नुकसान की भरपाई के लिये लगान बढ़ाकर वसूली कर रही थी। वनोपज और कृषि उपज मानो बंदूक की ताकत से एकत्र की जा रही थी। यह 1872 का कालखंड था। इसी समय प्राकृतिक आपदा शुरू हुई, जो लगभग छह वर्षों तक चली। कृषि और वनोपज दोनों में भारी कमी आई। किसान अपने परिवार और पशुधन तक का पालन नहीं कर पा रहे थे। लेकिन वसूली में कोई कटौती नहीं हुई। भय और भूख से बेहाल लोगों ने पलायन शुरू कर दिया। हालात भुखमरी तक पहुँच गए।

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भूख से तड़पते लोगों की दशा टंट्या से न देखी गई। वर्ष 1876, तिथि 30 जून — टंट्या ने उस जमींदार से बात की जो अंग्रेजों के दबाव में अनाज कहीं और भेजने वाला था। टंट्या के साथ बड़ी संख्या में वनवासी और ग्रामवासी थे। सभी ने आग्रह किया कि यह अनाज भूख से मरते लोगों को दिया जाए, पर जमींदार तैयार नहीं हुआ। अंत में टंट्या ने गोदाम पर धावा बोल दिया। जमींदार के लठैत कुछ न कर सके।

इस घटना से अंग्रेज बौखला गए। टंट्या के साथ पूरे गाँव और अंचल के लोगों को गिरफ्तार किया गया, संख्या लगभग 80 बताई जाती है। लेकिन टंट्या बीस अन्य वनवासी साथियों के साथ जेल की दीवार फाँद कर भाग निकले। यहीं से टंट्या और अंग्रेजी सिपाहियों के बीच लुका-छिपी का संघर्ष शुरू हुआ।

पूरा नवांचल और ग्रामीण क्षेत्र टंट्या के साथ था। कोई उनका पता न बताता। टंट्या की टोली बढ़ती गई। हर गाँव में उनके साथी थे। टंट्या के दो ही लक्ष्य थे —

  1. जहाँ भी अंग्रेजी सिपाही दिखें, उन पर हमला करना।

  2. अंग्रेजों के दलालों, मालगुजारों और जमींदारों के गोदाम लूटकर अनाज जनता में बाँटना।

समय के साथ उनका दायरा बढ़ा। संपूर्ण निमाड़, इससे लगी महाराष्ट्र सीमा, खानदेश, विदर्भ, होशंगाबाद और बैतूल के पर्वतीय क्षेत्रों में उनका दबदबा था। इस इलाके में शायद ही कोई रेलगाड़ी सुरक्षित निकली हो जिस पर टंट्या की टोली ने धावा न बोला हो।

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उन्हें पकड़ने के लिये एक ओर अंग्रेजों ने भारी इनाम घोषित किए और दूसरी ओर दो हजार सिपाहियों की कुमक उनके पीछे लगा दी।

कहते हैं टंट्या पशु-पक्षियों की भाषा समझते थे। मिलिट्री मूवमेंट से भयभीत पशु-पक्षियों की आवाज़ों से वे दिशा का अनुमान लगा लेते थे और सतर्क हो जाते थे।

अंततः अंग्रेजों ने एक घातक योजना बनाई। वनेर गाँव में उनकी बहन रहती थी। वे राखी पर अक्सर वहाँ जाते थे। अंग्रेजों ने उसके पति से गुप्त संपर्क किया और इनाम का लालच देकर टंट्या को आत्मसमर्पण कराने की कोशिश की। टंट्या नहीं माने। अंत में 1889 में राखी का त्योहार आया। गणपत ने आग्रहपूर्वक बुलाया। टंट्या अपने बारह साथियों के साथ राखी बंधवाने पहुँचे और वहाँ पहले से वेश बदलकर मौजूद अंग्रेजी सिपाहियों ने उन्हें पकड़ लिया।

उन पर लूट, डकैती, सिपाहियों से मारपीट और हथियार छीनने के कुल 124 मामले दर्ज थे। इन्हीं मामलों के आधार पर 4 दिसंबर 1889 को उन्हें फाँसी दे दी गई। कहते हैं उन पर बहुत अत्याचार किए गए कि वे अपने साथियों के नाम बता दें, लेकिन टंट्या का मुँह न खुला। यह भी कहा जाता है कि टंट्या के प्राण यातनाओं और भूख-प्यास में ही निकल गए थे और फाँसी पर उनकी मृत देह को लटकाया गया।

आज बलिदानी टंट्या भील पूरे वन अंचल में मामा के रूप में पूजे जाते हैं। हर वनवासी महिला चाहती है कि उसका भाई टंट्या जैसा हो। टंट्या जितने प्रसिद्ध वन अंचल की लोकगाथाओं, कहानियों और किंवदंतियों में हैं, उतने ही इतिहास में कम।