उसका सफ़र

सांझ हो रही थी, कोई साढे पांच बज रहे थे। पश्चिम दिशा में घनघोर काले बादल छाने के कारण पानी बरसने का औसर नजर आ रहा है। काले बादल क्षितिज से मिले, बुंदा-बांदी शुरु हो गई। जिस सड़क पर हूँ, वह दक्षिण की ओर जा रही है। सोच रहा हूँ कि बरसात पश्चिम में हो रही है, मुझे तो दक्षिण की तरफ़ जाना है, होने दो बरसात। बाईक गति और बढाता हूँ। रास्ता सुनसान, दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा। ऐसे में बाईक पंचर हो जाए या बंद हो जाए तो क्या होगा? धकेल कर 15 किलो मीटर तक तो जाना मुश्किल है। बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाएगी। इसी उहापोह में निरंतर चला जा रहा हूँ। आसमान में बिजली चमकने लगी, रह रह कर गड़गड़ाहट हो रही है। बाईक पुरी गति से चलाकर मंजिल तक पहुंचने की जल्दी ने मुझे अधीर कर दिया, मंजिल तो 100 किलो मीटर दूर है, मेरे कोई पंख नहीं, जो उड़ कर पहुंच जाऊंगा, सड़क पर अपनी क्षमता के हिसाब से ही चलकर जाना है।
दो-चार छींटे गिरे, मैने आसमान की तरफ़ देखा, बादलों को छाए हुए, लेकिन बादल काले नहीं, धुंधिया रंग के हैं। लगा कि आगे का रास्ता तय करना आसान न होगा। काले बादल जब आसमान में छा कर गरजें और बिजली चमकने लगे हवा के साथ, तो समझ जाना चाहिए कि बरसात अधिक देर तक नहीं होगी। 5-10 मिनट की बौछारें आएगीं और बरस कर चली जाएगीं, फ़िर आसमान साफ़ हो जाएगा। परन्तु धुंधिया रंग के बादल जब आएं तथा बरसात शुरु हो तो अनुमान लगाना कठिन है, कितनी देर तक बरसात होगी? दो-चार घंटे या दो-चार दिन की झड़ी भी हो जाए, कोई बड़ी बात नहीं। आसमान का नजारा कुछ ऐसा ही दिखाई देने लगा। रास्ते में एक गाड़ीवान गाड़ी हांकता हुआ मिला। खेत से घर की ओर जाने की जल्दी दिख रही थी,  गाड़ी हांकते हुए मोबाईल से बात करते हुए शायद कह रहा होगा कि-“खेत से चल पड़ा हूँ, घर के लिए, बीज खेत में डालते ही बरसात होने लगी। बीज खेत में जम जाएं, खुशी की बात होगी। चिरई-चुरगुन के बचने से बीज जल्दी ही उग आएगें। मैं सर्रर्रर्रर्रर्र से उसके बगल से निकल जाता हूँ। वह अपने रस्ते मैं अपने रस्ते।
अंधेरा होने लगा और बारिश शुरु हो जाती है। बाईक की स्पीड में पानी की मोटी-मोटी बूंदे चेहरे पर वार करने लगी, एक हाथ से चेहरा ढक कर उसे बचाने की चेष्टा करता हूँ, बारिश की बूंदे भीगा रही हैं। चलते-चलते कहीं पनाह लेने की जगह तलाश करता हूँ, सड़क के दोनों ओर पेड़ ही पेड़, कहीं कोई मकान या छप्पर भी नहीं दिखता। भीगते हुए चलना जारी है, तभी दांई तरफ़ पेड़ों के बीच सफ़ेद सी छाया नजर आई, समीप पहुंचने पर जंगल विभाग की चौकी थी। मिल गयी पनाह, मैने बाईक उधर मोड़ ली, कुछ देर रुकुं तो चलुं। बाईक स्टैंड पर लगाकार भीतर भागा। यहाँ भी कोई नहीं, 8X8 की सीमेट चद्दर से छाई हुई झोपड़ी के दरवाजे खिड़की सब गायब हो चुके है। कोने में गंदगी का ढेर और उस पर किंगफ़िशर बीयर का टिन का डिब्बा। जैसे कोई उसे अभी ही खाली कर फ़ेंक गया हो। बरसात बढ गयी, मुसलाधार पानी बरसने लगा, खिड़की से सामने खुले में देखता हूँ धरती पर पानी की सफ़ेद चादर बिछ गयी। आधें घंटे की बारिश में गड्ढे लबालब भर गए। सड़क से पाई में पानी बहने से नालियाँ शुरु हो चुकी हैं। आसमान की तरफ़ देखता हूँ, कहीं बरसात रुकने के कुछ आसार नजर आएं, लेकिन निराश ही होना पड़ा। सहसा मोबाईल ने बजकर ध्यान अपनी ओर खींचा, नया नम्बर, आवाज ही सुनाई नहीं दी, कौन है? दोनों मोबाईल पानी में भीग कर धराशाई हुए।
तभी एक बाईक आकर रुकी, दो लोग तेजी से दौड़कर झोंपड़ी में घुसे। मुझे देखकर उनके चेहरे के भाव बदले, एक के हाथ में बीयर की दो बोतलें थी, उसने गमछे में छिपाने प्रयास किया, मुझे पुलिसवाला समझ कर। लग रहा था कि कुछ देर में रात हो जाएगी। बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही। वे भी कोने में चुप खड़े हैं, मै भी दरवाजे पर मौन उन्हें देख रहा हूँ। उनसे आँखे मिलाने चाहता हूँ, परन्तु वे मुझसे बचना चाह रहे थे, आमने-सामने मुंह किए अनबोल। सांप और नेवले वाली स्थिति थी, पहले हमला कौन करे। दोनो डटे हुए थे मैदान में, खिड़की से झांकता हूँ, बगल में बांस के झुंड में बड़ी सारी बांबी दिखाई दी और उसके नजदीक से बहती नाली, थोड़ी देर में बांबी को भी अपनी घेरे में ले लेगी। फ़िर उसमें से सांप निकल आएगें, उन्हे भी तो बारिश से बचने के लिए शरण चाहिए। यह खाली कोठरी उनकी शरणस्थली ही तो है, जिसमें हमने पनाह ली। सोच रहा हूँ बारिश रुकने वाली नहीं और कोठरी के मालिक आ गए तो इतनी जगह नहीं कि सभी एक साथ इंतजार कर सकें। इस स्थिति में बरसते पानी में ही चलना श्रेय कर लगा। भीतर से आवाज आई, कुछ देर रुक कर देख लो, बारिश कम हो तो चलो। मैंने कहा-लम्बा सफ़र है, अभी ही चलु तो बात बने। आखिर चल पड़ता हूँ बरसते पानी में, जो होगा देखा जाएगा।
बाईक स्टार्ट कर चला, थोडी दूर जाने पर बंद हो गई, फ़िर किक लगाई तो आठ-दस किक में स्टार्ट हुई, थोड़ी दूर चल कर फ़िर बंद हो गयी। अब उमड़-घुमड़ कर आशंकाओं के बादल भी छाने लगे, पानी बरस कर सड़क पर भी बहने लगा, अंदाजा लगाया कि साईड स्टैंड पर एक घंटे बाईक खड़े रहने से प्लग में पानी भर गया होगा। फ़िर किक लगाई लगातार, बाईक स्टार्ट हुई, चल पड़ा, पानी से सराबोर हो चुका हूँ। जब घर से चला था तो बारिश की आशंका थी, परन्तु आते हुए बख्श दिया था इसने। चलते-चलते रुमाल से मुंह पोंछता हूँ, रुमाल भी गीला है। दचाक-दचाकSSSS- बाईक का चक्के गड्ढे में चले गए, सड़क पर पानी के कारण गड्ढ दिखाई नहीं दिए। गड्ढे में बाईक कूदी, तभी बिजली चमकी, जोर की गड़गड़ाहट के साथ कुछ देर तक चिंगारियाँ आकाश में दिखाई दी। मेरा ध्यान कहाँ है? सड़क पर या बिजलियों पर। दोनो ही देख रहा हूँ। फ़िर बिजली कड़क कर धरती पर चिंगारियाँ बरसाने लगी, बिजली कहीं आसपास ही गिरी, मुझे रुकना नहीं है, किसी पेड़ के नीचे रुक गया तो बिजली की चपेट में आ सकता हुँ। फ़िर इस सुनसान में कौन मेरी सुध लेने लगा बरसते पानी में। जब जीव जन्तु एवं जानवर तक जान बचाकर सुरक्षित जगह पर जाने की फ़िराक में लगे हैं। इस स्थिति में चलते रहना ही ठीक है, मैंने कभी सुना नहीं कि चलती हुई गाड़ी पर बिजली गिरी। पेड के नीचे एवं मैदान में खड़े लोगों पर बिजली गिरते ही रहती है। चलना ही ठीक है, चलते ही रहता हूँ।
इसी सोच के दरमियान सड़क पर एक बड़ा सांप दिखाई दिया, सड़क पार करते हुए, मैं ब्रेक भी नहीं लगा सकता। दोनो पैर उपर उठा लेता हूँ और बाईक निकल गई, पीछे मुड़कर देखने का वक्त नहीं, वह दब गया कि बच गया। बाईक के टायर से भी लिपट सकता था। रीढ में सिरहन सी भर गई, सिर को झटकारता हुआ चलते रहता हूँ। वादा किया मैने हर हालत में पहुंचने का। वादा करके तोड़ना मेरी फ़ितरत नहीं । हां का अर्थ हां ही माना, चाहे उसके लिए कितना भी कष्ट उठाना पड़े। किसी के किया गया वादा कभी तोड़ा नहीं , अगर न कह दिया तो फ़िर किया भी नहीं। सिर पर फ़ालतु बोझ लेकर चलने वालों में से नहीं, बोझा इतना ही रखा, जितना संभाल संकु। घटाटोप अंधेरा में बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही। मानसून की बारिश के पहले दिन में ठंडी हवा के कारण कंपकंपी चढकर दांत बजने लगे, एक हाथ को समेटे हुए गरम रखने की कोशिश करने लगा। एक हाथ एक्सीलेटर पर है। दोनो हाथ अगर जेब में होते तो थोड़ी ठंड से राहत मिल सकती थी। असंभव! बाईक कैसे चलेगी? किसी तरह मुख्य मार्ग तक पहुंच जाऊं तो राहत मिले। वहाँ गाड़ी बंद होने के बाद भी जाने के लिए साधन मिल जाएगें। यहाँ सांप बिच्छु के अलावा कुछ नहीं।
मैदान में तेंदू की छोटी-छोटी झाड़ियाँ भी बारिश की मार झेल रही हैं, उसके पत्तों ने एक बार भी झुरझुरी नहीं ली। क्या उसे बरसाती ठंड नहीं लगती होगी? उसके और भी साथी तो हैं, कष्ट सहने के लिए। मैं तो अकेला हूँ, कहते हैं बांटने से कष्ट आधा और खुशी दुगनी हो जाती है। दुनिया में सभी अकेले आए और अकेले ही गए। नियति को समझो और चलते रहो, एक दिन पहुंच ही जाओगे मंजिल तक। आज बहुत बुरा फ़ंस गया, वादा करना भी चाहिए या नहीं? कुछ वादे ऐसे होते हैं जो मनुष्य के जीवन मरण से जुड़े होते हैं,  उन्हे तोड़ा नहीं जा सकता। यह ख्याल क्यों आया मेरे मन में, जब वादा करके तोड़ना मेरी फ़ितरत में ही नहीं। सामने से कैप्शुल आ गया, उसके हार्न की आवाज सुनकर चौंकता हुँ, गाड़ी चलाते हुए ख्यालों में खोना ठीक नहीं। हां! ये तो मुझे मालुम है, पर जब मैं अकेला होता हूँ तो कोई तो आ जाता है, बतियाने के लिए, सफ़र का साथी बनकर। चाहे खुदी ही क्यों न हो। सामने लिंक रोड़ दिखाई दिया, कानबाई जा रही है।लो मैं पहुंच गया यहाँ तक, मेरा सफ़र जारी है, पर आज तुमने सफ़र पुरा कर लिया। उस दिन जब तुमने कहा था-“मेरे मरने के वक्त तुझे जरुर आना होगा, कहीं ऐसा न हो मैं मर जाऊँ और तेरी बाट देखती रहूँ। भूलना नहीं! कोई बहाना नहीं चलेगा, तेरा इंतजार करुंगी। अरे बुआ हूँ तेरी, माँ-बाप नहीं, भाई-भाभी नहीं तो क्या हुआ, तू तो है मेरे खानदान का। तेरे हाथों से शाल ओढने के बाद ही जाउंगी अपने घर से उसके घर, क्यों आएगा कि नहीं, जवाब दे मुझे?” मैने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और वादा किया- “जरुर आऊंगा बुआ, मैं जरुर आऊंगा, चाहे किसी भी परिस्थिति में रहूँ, तेरे लिए सुंदर कढाई वाला शाल लाऊंगा।” मैने अपना वादा नहीं तोड़ा, पहुंच ही गया वक्त पर।
ललित शर्मा

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Posted by on Jun 30 2011. Filed under कहानियां. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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