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पृथ्वी का हरा हृदय हैं वर्षावन : विश्व वर्षावन दिवस

आचार्य ललित मुनि

भारत के अलावा विश्व के कई देशों में वर्षावन हैं। हर वर्ष 22 जून को विश्व भर में ‘विश्व वर्षावन दिवस’ मनाया जाता है। यह दिवस हमें उन सघन, हरे-भरे और जीवनदायी वनों की याद दिलाता है जिन्हें हम वर्षावन कहते हैं। ये वन केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं हैं, बल्कि इस पृथ्वी की जीवन-रेखा हैं। इनकी जड़ें धरती की गहराई से जल खींचती हैं, इनकी पत्तियाँ आकाश को ऑक्सीजन देती हैं और इनकी छाया करोड़ों जीवों को आश्रय देती है। आज जब जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक संकट बन चुका है, तब वर्षावनों का महत्त्व और भी अधिक स्पष्ट हो गया है।

विश्व का सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षावन अमेज़न बेसिन में स्थित है जो ब्राज़ील, पेरू, कोलंबिया समेत नौ देशों में फैला हुआ है। इसका क्षेत्रफल लगभग 55 लाख वर्ग किलोमीटर है। इसके अलावा कांगो बेसिन (मध्य अफ्रीका) का वर्षावन, दक्षिण-पूर्व एशिया के इंडोनेशिया, मलेशिया और बोर्नियो के वन भी वैश्विक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। भारत में पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर राज्यों विशेषकर असम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में भी समृद्ध वर्षावन मिलते हैं।

संसार की कुल भूमि का केवल 6 प्रतिशत हिस्सा ही वर्षावनों से ढका है, फिर भी इनमें पृथ्वी की लगभग 50 प्रतिशत से अधिक जीव-प्रजातियाँ निवास करती हैं। यह संख्या चौंकाने वाली है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार अमेज़न वर्षावन अकेले 40,000 से अधिक पौधों की प्रजातियाँ, 1,300 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ, 3,000 से अधिक मछलियों की प्रजातियाँ और 400 से अधिक स्तनधारी प्रजातियों का घर है।

वर्षावनों में पाए जाने वाले असंख्य पौधों का उपयोग आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में किया जाता है। अनुमान है कि आज उपयोग में आने वाली लगभग 25 प्रतिशत औषधियाँ वर्षावन की वनस्पतियों से प्राप्त तत्त्वों पर आधारित हैं। कैंसर, मलेरिया और हृदय रोगों की कई दवाएँ इन्हीं वनों की देन हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्षावनों में अभी भी लाखों ऐसी प्रजातियाँ हैं जिनकी खोज होनी बाकी है और जो भविष्य में अनेक रोगों का उपचार दे सकती हैं।

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वर्षावनों को ‘पृथ्वी के फेफड़े’ कहा जाता है और यह उपमा अत्यंत सटीक है। ये वन प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल से अरबों टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं। अमेज़न वर्षावन अकेला प्रतिवर्ष लगभग 2 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करता है। इस प्रकार ये वन वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

नासा और विभिन्न जलवायु अनुसंधान संस्थानों के अध्ययन बताते हैं कि यदि अमेज़न वर्षावन का 20-25 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो जाए तो पूरा वन क्षेत्र एक ‘टिपिंग पॉइंट’ पर पहुँच सकता है जहाँ से वह स्वयं को पुनर्जीवित नहीं कर पाएगा और धीरे-धीरे एक शुष्क सवाना में बदल जाएगा। यह परिदृश्य न केवल ब्राज़ील बल्कि समूचे विश्व के लिए विनाशकारी होगा।

दुर्भाग्य से वर्षावन तेज़ी से घट रहे हैं। वनों की कटाई (Deforestation) इनके सामने सबसे बड़ा खतरा है। विश्व वन्यजीव कोष (WWF) के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग 1.5 करोड़ हेक्टेयर वन भूमि नष्ट हो जाती है जो कि प्रति मिनट लगभग 40 फुटबॉल मैदानों के बराबर है। वनों की कटाई के पीछे कृषि विस्तार, पशुपालन, खनन, लकड़ी उद्योग और बुनियादी ढाँचे का निर्माण जैसे कारण हैं।

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जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न लंबे सूखे और बढ़ते तापमान के कारण वर्षावनों में आग की घटनाएँ बढ़ रही हैं। 2019 में अमेज़न में लगी आग ने विश्व भर का ध्यान आकर्षित किया था। उस वर्ष जनवरी से अगस्त के बीच ब्राज़ील में 74,000 से अधिक आग की घटनाएँ दर्ज की गई थीं जो पिछले वर्ष की तुलना में 83 प्रतिशत अधिक थीं।

भारत में भी वर्षावनों की स्थिति चिंताजनक है। भारतीय वन सर्वेक्षण (Forest Survey of India) की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी घाट जो यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है, की अनेक प्रजातियाँ खतरे में हैं। केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र में इन वनों पर खनन, अतिक्रमण और जलवायु परिवर्तन का दबाव लगातार बढ़ रहा है। पूर्वोत्तर भारत में जनसंख्या वृद्धि और झूम खेती से वनों पर दबाव बना हुआ है।

हालांकि भारत सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम, राष्ट्रीय वन नीति और विभिन्न संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना जैसे कदम उठाए हैं। वैश्विक स्तर पर वर्षावनों के संरक्षण के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। 2021 में ग्लासगो में हुए COP26 जलवायु सम्मेलन में 100 से अधिक देशों के नेताओं ने 2030 तक वनों की कटाई रोकने का संकल्प लिया।

वर्षावनों का संरक्षण केवल सरकारों और बड़े संगठनों की जिम्मेदारी नहीं है। एक साधारण नागरिक भी इस दिशा में अपना योगदान दे सकता है। हमारे उपभोग की आदतें वर्षावनों को सीधे प्रभावित करती हैं। जब हम ऐसे उत्पाद खरीदते हैं जिनके उत्पादन में वनों की कटाई हुई हो जैसे कि कुछ प्रकार का पाम ऑयल, सोया या लकड़ी के उत्पाद तो हम उस विनाश के हिस्सेदार बन जाते हैं।

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‘सस्टेनेबल’ या ‘सर्टिफाइड’ उत्पाद चुनना, माँस की खपत कम करना (क्योंकि पशुपालन के लिए सर्वाधिक वनों की कटाई होती है), कागज़ का उपयोग घटाना और पुनर्चक्रण (Recycling) को अपनाना ये छोटे-छोटे कदम मिलकर बड़ा असर डाल सकते हैं। इसके अलावा वर्षावन संरक्षण में काम करने वाले विश्वसनीय संगठनों को समर्थन देना और जागरूकता फैलाना भी आवश्यक है।

विद्यालयों और महाविद्यालयों में वर्षावन दिवस के अवसर पर पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। बच्चों को यह समझाना ज़रूरी है कि वर्षावन केवल ‘दूर देश के जंगल’ नहीं हैं बल्कि उनकी सांस, उनका मौसम और उनका भविष्य इन वनों से जुड़ा है।

जब एक पेड़ कटता है तो केवल लकड़ी नहीं कटती। उस पेड़ पर रहने वाले पक्षी का घोंसला उजड़ता है, उस पेड़ की छाया में पलने वाली वनस्पतियाँ सूखती हैं, उस पेड़ की जड़ों से बंधी मिट्टी बिखरती है और उस पेड़ के होने से जो वर्षा होती थी वह भी धीरे-धीरे कम होती जाती है। यह एक अदृश्य शृंखला है जिसे तोड़ने के परिणाम दूरगामी और कभी-कभी अपरिवर्तनीय होते हैं।

पृथ्वी के इस हरे हृदय की धड़कन को बनाए रखना हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है। विश्व वर्षावन दिवस पर यह संकल्प लें कि हम न केवल इस दिन बल्कि वर्ष के प्रत्येक दिन इन वनों की रक्षा के लिए जागरूक रहेंगे और दूसरों को भी जागरूक करेंगे। क्योंकि यदि वर्षावन हैं तो जीवन है और यदि जीवन है तो भविष्य है।