नदी के नाम पैगाम : समाज की सोई चेतना को झकझोरती कविताएँ
नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि मानव सभ्यता, संस्कृति और जीवन की आधारशिला हैं। इनके संरक्षण से ही पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित है। नदी पर उल्लेखनीय काव्य।
Read Moreनदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि मानव सभ्यता, संस्कृति और जीवन की आधारशिला हैं। इनके संरक्षण से ही पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित है। नदी पर उल्लेखनीय काव्य।
Read Moreप्रधानमंत्री सूर्यघर मुफ्त बिजली योजना से छत्तीसगढ़ में ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में क्रांतिकारी बदलाव हो रहा है। कोरबा के रंजीत कुमार जैसे परिवार अब सौर ऊर्जा से न केवल बिजली बिल से मुक्त हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे रहे हैं।
Read Moreविश्व बाँस दिवस पर जानिए बाँस का महत्व—वेदों और लोक परंपराओं से लेकर आज के पर्यावरणीय और सांस्कृतिक संदर्भ तक, यह पौधा क्यों कहलाता है हरा सोना।
Read Moreवैदिक ऋषियों के श्लोकों में प्रकृति संरक्षण और ओजोन परत जैसी सुरक्षा अवधारणा का उल्लेख मिलता है। जानें कैसे प्राचीन वैदिक सूत्र आधुनिक पर्यावरण संतुलन से जुड़े हैं।
Read Moreपितृपक्ष पूर्वजों के स्मरण, कुटुम्बीय एकता और प्रकृति से समन्वय का पर्व है। श्राद्ध, तर्पण और पाँच ग्रास परंपरा के माध्यम से यह व्यक्ति, परिवार और समाज को आंतरिक शक्ति और जीवन मूल्य प्रदान करता है।
Read Moreछत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ को केंद्र सरकार की हिंदी सलाहकार समिति में राष्ट्रीय सदस्य नामित किया गया है। यह नियुक्ति हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और तकनीकी शिक्षा में इसके समावेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई है।
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