भारतीय समाज

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संत रविदास का जीवन-संदेश और समरस भारत की दिशा

संत रविदास के 650वें प्राकट्य वर्ष के संदर्भ में यह आलेख उनके समता, श्रमसम्मान और सामाजिक समरसता के संदेश को रेखांकित करता है तथा समरस समाज निर्माण की दिशा में प्रेरणा देता है।

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पश्चिम द्वारा जनजातीय नरसंहार का दिवस है मूलनिवासी दिवस

यह लेख विश्व जनजातीय दिवस को पश्चिमी षड्यंत्र के रूप में उजागर करता है, जो औपनिवेशिक नरसंहारों की स्मृति मिटाने और भारतीय समाज को विभाजित करने का प्रयास करता है।

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जातीय जनगणना: ब्रिटिश नीति की छाया और भारतीय समाज का विखंडन

भारत में जातीय जनगणना का इतिहास एक औपनिवेशिक विरासत है, जिसकी जड़ें 1871 में ब्रिटिश शासन द्वारा कराई गई पहली जातिगत जनगणना में हैं। यह न केवल सामाजिक विभाजन का औजार बना, बल्कि भारतीय समाज की गतिशीलता और समरसता को भी बाधित किया। आज जरूरत इस बात की है कि जातीय पहचान को विभाजन के बजाय सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम बनाया जाए — ताकि इतिहास की गलतियों से सीख लेकर एक समतामूलक भविष्य की ओर बढ़ा जा सके।

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