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सती प्रथा : भारतीय परंपरा का सत्य या भारत की विकृत छवि गढ़ने का प्रचार?

भारतीय सभ्यता को लेकर सबसे अधिक प्रचारित आरोपों में एक यह रहा कि “सती प्रथा हिंदू संस्कृति की मूल पहचान थी।” दशकों तक औपनिवेशिक इतिहासकारों, मिशनरी लेखकों और बाद में वामपंथी इतिहास विमर्श के एक हिस्से ने इस धारणा को इस तरह स्थापित किया मानो भारतीय दर्शन का स्त्री के प्रति मूल दृष्टिकोण ही अमानवीय रहा हो। जबकि वैदिक साहित्य, सामाजिक इतिहास और भारतीय परंपरा का गंभीर अध्ययन इस दावे की बुनियाद को ही चुनौती देता है। यदि सती वास्तव में भारतीय दर्शन का मूल और अनिवार्य अंग होती, तो ऋग्वेद विधवा स्त्री को मृत्यु नहीं, जीवन की ओर लौटने का संदेश क्यों देता? ऋग्वेद 10.18.7 कहता है—

“उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं
गतासुमेतमुप शेष एहि।”
अर्थ — हे नारी, उठो और जीवितों की दुनिया में लौटो; मृत व्यक्ति के पास मत पड़ी रहो।

यह मंत्र भारतीय दृष्टि की आत्मा है। यहाँ स्त्री को चिता पर चढ़ने नहीं, बल्कि “जीवलोक” में लौटने के लिए कहा जा रहा है। कई संस्कृत विद्वान “हस्तग्राभस्य” शब्द को पुनर्विवाह अथवा पुनः सामाजिक जीवन से भी जोड़ते हैं। स्पष्ट है कि वैदिक दर्शन का मूल आग्रह जीवन है, आत्मदाह नहीं।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि सती इतनी व्यापक, अनिवार्य और पूरे भारत की केंद्रीय सामाजिक परंपरा थी, तो उसके ठोस, व्यापक और व्यवस्थित आँकड़े कहाँ हैं?

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अंग्रेजी शासनकाल में भारत के लगभग हर विषय पर विस्तृत दस्तावेज तैयार किए गए। भूमि, कर, जाति, जनगणना, कृषि, व्यापार, अपराध, विवाह, मृत्यु, धार्मिक गतिविधियाँ— सबका रिकॉर्ड रखा गया। ब्रिटिश प्रशासन अपनी कागजी व्यवस्था और अभिलेखों के लिए प्रसिद्ध था। लेकिन जिस सती प्रथा को भारतीय संस्कृति का “मुख्य चेहरा” बनाकर दुनिया भर में प्रचारित किया गया, उसके संदर्भ में अखिल भारतीय स्तर पर कोई सर्वमान्य, व्यापक और व्यवस्थित आँकड़ा उपलब्ध नहीं मिलता।

यदि यह पूरे भारत की सामान्य सामाजिक व्यवस्था होती, तो उसके लाखों मामलों के स्पष्ट सरकारी रिकॉर्ड होने चाहिए थे। लेकिन वास्तविकता यह है कि इसके प्रमाण मुख्यतः कुछ सीमित क्षेत्रों और कुछ विशेष सामाजिक समूहों तक केंद्रित दिखाई देते हैं। दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर, अनेक जनजातीय समाजों तथा विशाल ग्रामीण क्षेत्रों में इसके प्रमाण अत्यंत कम या लगभग अनुपस्थित हैं। इससे यह प्रश्न और तीखा हो जाता है कि क्या कुछ सीमित घटनाओं को जानबूझकर पूरी भारतीय सभ्यता का चेहरा बना दिया गया?

औपनिवेशिक शासन को भारत में अपने “सभ्यता मिशन” को नैतिक आधार देना था। इसलिए भारतीय समाज की चुनिंदा कुरीतियों को बढ़ा-चढ़ाकर इस प्रकार प्रचारित किया गया मानो भारत केवल अंधकार, अंधविश्वास और स्त्री-दमन पर आधारित समाज हो।

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बाद में वामपंथी इतिहास लेखन के एक हिस्से ने भी भारतीय इतिहास को मुख्यतः संघर्ष, जाति, स्त्री उत्पीड़न और दमन की कहानी के रूप में प्रस्तुत किया। सामाजिक समस्याओं का अध्ययन आवश्यक था, लेकिन जब पूरी सभ्यता को केवल उन्हीं समस्याओं से परिभाषित किया जाने लगे, तब इतिहास विश्लेषण नहीं, वैचारिक अभियान बन जाता है।

प्रसिद्ध इतिहासकार आर.सी. मजूमदार ने लिखा था कि औपनिवेशिक इतिहासकारों ने भारत की कमजोरियों को असामान्य रूप से बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया और उसकी सांस्कृतिक उपलब्धियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। वहीं अरुण शौरी ने कई लेखों और पुस्तकों में आरोप लगाया कि भारतीय इतिहास लेखन के एक प्रभावशाली वर्ग ने औपनिवेशिक दृष्टिकोण को ही “प्रगतिशील इतिहास” के रूप में आगे बढ़ाया। सीता राम गोयल ने भी लिखा कि भारतीय सभ्यता को समझने के बजाय उसे “सामाजिक अपराधबोध” में बदलने का प्रयास किया गया।

विडंबना देखिए— जिस सभ्यता में गार्गी वाचक्नवी राजाओं और ऋषियों से शास्त्रार्थ करती हैं, मैत्रेयी ब्रह्मज्ञान पर प्रश्न उठाती हैं, और लोपामुद्रा वैदिक ऋचाओं की रचयिता हैं, उसी सभ्यता को एकरेखीय ढंग से “स्त्री-विरोधी संस्कृति” घोषित कर दिया गया।

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यह भी ध्यान देने योग्य है कि अंग्रेजी शासन में भारतीय महिलाओं पर हुए अत्याचारों, बलिदानों और प्रतिरोध की उतनी चर्चा नहीं हुई जितनी सती की हुई। रानी लक्ष्मीबाई से लेकर मातंगिनी हाजरा और कनकलता बरुआ तक हजारों महिलाओं ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष किया, जेल गईं, गोलियाँ खाईं और प्राण दिए। लेकिन उनका कोई समग्र राष्ट्रीय आँकड़ा आज भी उपलब्ध नहीं है। औपनिवेशिक अभिलेखों ने भारतीय स्त्री के प्रतिरोध से अधिक भारतीय समाज की कमजोरियों को दर्ज करने में रुचि दिखाई।

सच यही है कि सती की घटनाएँ हुईं और उनका विरोध होना चाहिए था, लेकिन उन्हें भारतीय संस्कृति की आत्मा बताना इतिहास का संतुलित अध्ययन नहीं कहा जा सकता। इतिहास का कार्य किसी सभ्यता को अपराधी सिद्ध करना नहीं, बल्कि उसकी जटिलताओं को समझना है।

ऋग्वेद का “जीवलोक” आज भी इस बात का सशक्त प्रमाण है कि भारतीय दर्शन का मूल आग्रह जीवन, पुनर्निर्माण और चेतना की ओर है — मृत्यु और आत्मदाह की ओर नहीं।

 

– रूमा सेनगुप्ता

( लेखिका पत्रकार हैं )